खेड़ा अकेले नहीं, जब कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व की बयानबाजी बनी विवाद का पर्याय!
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में कार्य करना है। यह भूमिका तब और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है जब सत्ता पक्ष के निर्णयों पर सवाल उठाने की आवश्यकता होती है, लेकिन जब यह सवाल तथ्यों से परे जाकर आरोपों, अतिशयोक्ति और व्यक्तिगत हमलों में बदलने लगते हैं, तब लोकतांत्रिक विमर्श स्वभाविक है कि कमजोर पड़ता है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा से जुड़ा मामला भी कुछ ऐसा ही है, जोकि प्रवृत्ति की ओर इशारा करती है, जहां आखिरकार न्यायालय को हस्तक्षेप कर राजनीतिक बयानबाजी की सीमाएं तय करनी पड़ीं!
गौहाटी हाई कोर्ट द्वारा खेड़ा के बयान पर की गई टिप्पणी पूरे राजनीतिक संवाद के स्तर पर सवाल उठाने वाला संकेत माना जाए तो कुछ गलत न होगा। खेड़ा द्वारा हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को न्यायालय ने गंभीरता से लिया और स्पष्ट किया कि किसी गैर-राजनीतिक व्यक्ति को राजनीतिक आरोपों में घसीटना अनुचित होने के साथ ही कानूनी दृष्टि से भी आपत्तिजनक है। वस्तुत: यह टिप्पणी इस बात का प्रमाण है कि अब न्यायपालिका राजनीतिक बयानबाजी को ‘राजनीतिक भाषा’ मानकर नजरअंदाज करने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
पवन खेड़ा का यह तर्क कि उन्होंने सिर्फ “सवाल” उठाए थे, कोर्ट को संतुष्ट नहीं कर सका है। यह वही प्रवृत्ति है, जो पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस की राजनीति में बार-बार देखने को मिली है, जहां आरोपों को “प्रश्न” का रूप देकर प्रस्तुत किया जाता है, ताकि कानूनी जवाबदेही से बचा जा सके। पर सच्चायी यही है कि कांग्रेस की इस रणनीति का प्रभाव जनता की धारणा पर पड़ता है और आम जनता भ्रमित होती है।
यदि इस घटना को व्यापक संदर्भ में देखें, तब यह भी समझ आता है कि पवन खेड़ा इस तरह के बयान देनेवालों में अकेले नहीं है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी के बयानों का इतिहास भी इसी तरह के विवादों से भरा पड़ा है। “चौकीदार चोर है” जैसे नारे ने राजनीतिक माहौल को गर्माया जरूर था, किंतु जब मामला अदालत तक पहुंचा, तो राहुल गांधी को स्पष्टीकरण देना पड़ा और खेद भी व्यक्त करना पड़ा। इसी प्रकार राफेल सौदे को लेकर लगाए गए आरोप भी लंबे समय तक चर्चा में रहे, किंतु उन्हें भी न्यायालय में साबित नहीं किया जा सका।
कहना होगा कि राहुल गांधी का “मोदी सरनेम” वाला बयान भी इसी कड़ी का हिस्सा है, जिसने उन्हें मानहानि के मामले में सजा तक दिलाई। यह अलग बात है कि आगे इस मामले में उन्हें राहत मिल गई, किंतु इस पूरे प्रकरण ने यह तो स्पष्ट कर ही दिया कि राजनीतिक बयानबाजी की भी एक सीमा होती है, जिसे पार करने पर कानूनी परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
इसी तरह से समय-समय पर देश के बाहर विदेशों में दिए गए बयानों को लेकर भी राहुल गांधी विवादों में रहे हैं। ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीय लोकतंत्र पर उठाए गए उनके तमाम प्रश्नों ने राजनीतिक बहस को और तेज किया है। स्वभाविक है, एक नेता प्रतिपक्ष के इस तरह के बयानों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की छवि को प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दूसरी ओर, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की बयानबाजी भी कम विवादास्पद नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना “रावण” से करना या उन्हें “जहरीला” कहना, यहां तक कि आतंकवादी तक कह देना, फिर वो अलग बात है कि बाद में इसके लिए मांफी भी मांगी गई, किंतु ये सभी बयान निश्चित ही भारतीय राजनीतिक मर्यादा के स्तर पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं?
यदि इन सभी घटनाओं को एक साथ रखा जाए, तो एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है। कांग्रेस के नेता पहले तीखे और गंभीर आरोप लगाते हैं, फिर उन्हें राजनीतिक विमर्श में फैलाया जाता है और जब प्रमाण की मांग होती है, तो या तो पीछे हटना पड़ता है या मामला अदालत तक पहुंच जाता है। ऐसे में स्वभाविक है कि यहां न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। गुवाहाटी हाई कोर्ट की टिप्पणी इस बात का संकेत है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है। जब किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा दांव पर लगती है, विशेषकर वह व्यक्ति जो राजनीति में सक्रिय नहीं है, तब कानून हस्तक्षेप करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपों को साबित करना आवश्यक है, अन्यथा वे संभावित अपराध बन सकते हैं।
अब लगता है कि इस प्रकार के लगातार विवाद जैसे कांग्रेस की नियति बन गए हैं। । जब पार्टी के शीर्ष नेता ही बार-बार ऐसे बयान देते हैं, जिन पर न्यायालय सवाल उठाती है, तब फिर जनता के बीच भरोसा कम होना स्वाभाविक है। कहना होगा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार की आलोचना करना होने के साथ ही एक मजबूत और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना भी है। पवन खेड़ा का मामला आज याद दिला रहा है कि लोकतंत्र में शब्दों की जिम्मेदारी होती है। आरोप लगाना आसान है, लेकिन उन्हें साबित करना उतना ही कठिन और जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
अत: कहना यही है कि आज कांग्रेस के सामने एक अवसर आत्ममंथन का है। यदि पार्टी इस संकेत को गंभीरता से लेती है और अपनी राजनीतिक शैली में सुधार करती है, तब जरूर वह अपनी खोती हुई विश्वसनीयता को वापस पा सकती है और यदि यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा, तो न्यायालयों की सख्ती और जनता का अविश्वास दोनों ही बढ़ते जाएंगे। कहीं ऐसा न हो कि कांग्रेस एक अच्छा या बुरा विपक्ष छोड़ो, वह भविष्य में कुछ भी न रह जाए!
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

