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छत्तीसगढ़ के सुकमा में दोरला समाज का घर वापसी अभियान

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छत्तीसगढ़ के सुकमा में दोरला समाज का घर वापसी अभियान


- डाॅ. मयंक चतुर्वेदी

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में हाल ही में एक ऐतिहासिक घटना घटी, जहां 47 परिवारों ने ईसाइयत छोड़कर सनातन धर्म में घर वापसी की। दोरला आदिवासी समाज के पटेल-पुजारी परिचर्चा सम्मेलन के दौरान कोंटा विकासखंड के जान गोलापल्ली गांव में आयोजित किए गए सम्मेलन में इन बन्‍धुओं ने सनातन धर्म में वापसी की इच्‍छा जताई और कहा कि उन्‍हें ईसाइयत से अब मुक्‍ति चाहिए।

वस्‍तुत: जो छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है, ब्रिटिश काल से ही ईसाई मिशनरियों का केंद्र रहा है। 19वीं सदी में बस्तर और सुकमा जैसे क्षेत्रों में मिशनरियों ने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर धार्मिक प्रचार शुरू किया। 2011 की जनगणना के अनुसार, छत्तीसगढ़ की कुल आबादी 2.55 करोड़ थी, जिसमें ईसाई आबादी मात्र 1.92 लाख (0.76 प्रतिशत) दर्ज की गई। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है, क्योंकि कई कन्वर्टेड आदिवासी खुद को ईसाई होना नहीं बताते हैं।

बस्तर संभाग, जिसमें सुकमा शामिल है, सबसे प्रभावित क्षेत्र है। यहां गोंड, हल्बा, मुरिया और दोरला जैसे जनजाति समुदायों में कन्वर्जन की दर सबसे ऊंची रही। 2001 से 2011 के बीच ईसाई आबादी में 56 प्रतिशत की वृद्धि हुई। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) और विभिन्न एनजीओ रिपोर्ट्स के अनुसार, 2014-2023 के बीच बस्तर क्षेत्र में औसतन 5-7 हजार प्रति वर्ष कन्वर्जन के मामले दर्ज हुए। सुकमा जिले में ही 2020 तक अनुमानित 15-20 प्रतिशत आदिवासी परिवार ईसाई प्रभाव में आ चुके थे। मिशनरियों द्वारा आयोजित प्रार्थना सभाओं, मुफ्त चिकित्सा शिविरों और आर्थिक लालच के जरिए यह प्रक्रिया तेज हुई।

राज्य सरकार की 2022 की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कन्वर्जन को वित्तीय सहायता से जोड़ा गया। उदाहरण स्वरूप, सुकमा के कोंटा ब्लॉक में 40 गांवों में 30 प्रतिशत से अधिक परिवार ईसाई हो चुके थे। इसकी गंभीरता इससे भी समझी जा सकती है कि गृह विभाग की 2025 रिपोर्ट में 2,500 अवैध कन्वर्जन केस दर्ज हुए, जिनमें से 60 प्रतिशत बस्तर से थे।

दोरला समाज जोकि इस बस्तर की मूल जनजाति है, अपनी प्रकृति पूजा और परंपराओं से विमुख हो रहा था। इसके बाद यहां घर वापसी अभियान 2014 से तेज हुआ, जब राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ और स्थानीय हिंदू संगठनों ने इसे संगठित रूप दिया। विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी), बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं ने इन सभी जनजाति क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए। इनमें सांस्कृतिक सम्मेलन, धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक सहायता शामिल हैं। सुकमा का पटेल-पुजारी परिचर्चा सम्मेलन इसी श्रृंखला का हिस्सा था।

तथ्यों पर नजर डालें तो 2014 से 2025 तक छत्तीसगढ़ में कुल 1.2 लाख से अधिक लोगों ने घर वापसी की है। सुकमा जिले में ही पिछले तीन वर्षों के दौरान 500 से अधिक परिवार लौटे। जान गोलापल्ली सम्मेलन में 47 परिवारों की घर वापसी इसका जीवंत उदाहरण है। इनमें ज्यादातर दोरला समाज के सदस्य थे, जो ईसाइयत अपनाने के बाद लगातार मानसिक क्‍लश से जूझ रहे थे। हालांकि राज्य सरकार ने भी 2023 के धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम में बदलाव कर कन्वर्जन पर सख्ती बरती है। लेकिन इसका सबसे ज्‍यादा असर यहां नैतिक रूप से देखा जा रहा है।

दोरला समाज की सांस्कृतिक चुनौतियां और पुनरुत्थान

दोरला समाज बस्तर का प्राचीन आदिवासी समुदाय है, जो प्रकृति पूजा, डांसर नृत्य और गोत्र-आधारित विवाह प्रथा के लिए जाना जाता है। लेकिन कन्वर्जन ने इन परंपराओं को खतरे में डाल दिया। सम्मेलन में पदाधिकारियों ने चिंता जताई कि युवा पीढ़ी चर्च की ओर आकर्षित हो रही है, जिससे भाषा (हल्बी-गोंदी), लोकगीत और त्योहार जैसे मड़ई-मेला विलुप्त हो रहे हैं।

सम्मेलन के मुख्य वक्ता, समाज प्रमुख कमलेश दोरला ने सभी को यहां समझाया कि दोरला समाज कई जगह पर दूसरे ईसाई मत की संस्कृति पर निर्भर होता हुआ दिखता है। हमें अपनी रीति-रिवाजों को पुनर्जीवित करना होगा। जनजागरण अभ‍ियान हर घर चलाना होगा, घर वापसी के बाद इन परिवारों को सरना पूजा, यज्ञ और सामुदायिक भोज का प्रशिक्षण दिया जाना आज जरूरी हो गया है। यह भी एक तथ्‍य है कि पड़ोसी राज्यों जैसे ओडिशा और झारखंड में भी इसी तरह के प्रयास सफल रहे हैं, जहां 2024 में 10 हजार घर वापसी हुईं।

व्यापक प्रभाव और भविष्य की दिशा

बस्तर संभाग में ईसाई आबादी अब घटकर 12 प्रतिशत रह गई है, जबकि घर वापसी 20 प्रतिशत बढ़ी है, निश्‍चित ही आज के संदर्भ में इसे एक सार्थक पहल माना जाएगा। अच्‍छी बात इसमें यह भी है कि छत्‍तीसगढ़ की सरकार ने 2026 के बजट में सिर्फ आदिवासी सांस्कृतिक संरक्षण के लिए 500 करोड़ आवंटित किए हैं। वहीं, आज सुकमा सम्मेलन ने साबित कर दिया कि जागरूकता से जड़ें मजबूत की जा सकती हैं। कहना होगा कि इस प्रकार, दोरला समाज की घर वापसी छत्तीसगढ़ में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नई इबारत लिख रही है। आने वाले समय में ऐसे और अधिक अभियान राज्य को अपनी मूल पहचान से जोड़ेंगे, आज हमें यही आशा करना चाहिए।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी