क्या जाति हिंदू समाज की समस्या है या औपनिवेशिक व्याख्या की उपज?
दीपक कुमार द्विवेदी
कभी-कभी लगता है कि हम अपने ही इतिहास को किसी और की आंखों से पढ़ रहे हैं। जब आप अपनी सभ्यता को अपनी दृष्टि से नहीं, बल्कि अपने शासक की दृष्टि से देखते हैं, तब फिर ये तय है कि धीरे-धीरे आप अपने ही समाज को दोष की स्थायी कहानी में बदल देते हैं। जाति विमर्श के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है और हो रहा है ।
आज जो कथन सामान्य हो गया है, जैसे “3000 वर्षों तक कुछ जातियों ने कुछ जातियों का शोषण किया”, “ब्राह्मण शाश्वत शोषक हैं”, “सामान्य वर्ग ऐतिहासिक अपराधी है”, “जाति ही हिंदू समाज की सबसे बड़ी समस्या है”, इन वाक्यों की जड़ें सिर्फ समकालीन राजनीति में नहीं हैं। इनकी बौद्धिक पृष्ठभूमि औपनिवेशिक लेखन, मिशनरी रणनीति, एंग्लिसिस्ट इतिहास, जनगणना आधारित वर्गीकरण और आधुनिक वामपंथी बाइनरी सिद्धांतों में निहित है।
सबसे पहले उस तथ्य को समझें, जिसे प्रायः पीछे कर दिया जाता है। 1816 में फ्रांसीसी मिशनरी अब्बे जाँ आंत्वान डुबोआ ने अपनी पुस्तक Description of the Character, Manners and Customs of the People of India में लिखा कि जाति व्यवस्था हिंदू विधान की श्रेष्ठतम कृति है और इसी व्यवस्था के कारण भारत अराजकता में नहीं डूबा। उन्होंने माना कि जातिगत अनुशासन ने सामाजिक संगठन को स्थिर रखा। यह कथन किसी सनातनी दार्शनिक का नहीं, बल्कि एक यूरोपीय मिशनरी का था जो मतांतरण के उद्देश्य से भारत आया था। इसका अर्थ यह है कि प्रारंभिक बाहरी दृष्टि में जाति को केवल दमन तंत्र के रूप में नहीं देखा गया।फिर दृष्टि बदली और 1857 के बाद अंग्रेजों ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत को नियंत्रित करने के लिए केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं है, समाज को वर्गीकृत करना होगा। यहीं से तथाकथित नृवंशविज्ञानिक राज्य की अवधारणा जन्म लेती है।
1872 की पहली अखिल भारतीय जनगणना ने जाति को स्थायी प्रशासनिक श्रेणी बना दिया। हजारों स्थानीय और लचीली पहचानों को कठोर सांख्यिकीय खांचों में बाँध दिया गया। आगे चलकर एच एच रिस्ले ने 1901 की जनगणना में जाति को नस्लीय सिद्धांतों से जोड़ने का प्रयास किया। नाक की लंबाई और कपाल की बनावट तक को आधार बनाया गया। इस प्रकार जाति एक जीवंत सामाजिक संरचना से अधिक औपनिवेशिक नियंत्रण का उपकरण बनती चली गई।
इसी काल में मिशनरी विमर्श ने दूसरा आयाम जोड़ा। अनेक मिशनरियों ने कहा कि ब्राह्मण, ईसाई मतांतरण की सबसे बड़ी बाधा हैं। एम ए शेरिंग ने लिखा कि जाति ब्राह्मणों की रचना है। ब्राह्मण को योजनाबद्ध रूप से षड्यंत्रकारी और तानाशाही सिद्ध किया गया। यहाँ दानवीकरण की प्रक्रिया स्पष्ट दिखाई देती है। जब किसी एक समुदाय को समस्त सामाजिक दोष का प्रतीक बना दिया जाता है, तो समाज की नैतिक संरचना कमजोर होती है।
जेम्स मिल ने अपनी History of British India में मनुस्मृति को पूरे हिंदू समाज का प्रतिनिधि विधान मानकर यह स्थापित किया कि भारतीय समाज दमनकारी है और राजनीतिक रूप से दुर्बल है। इस कथा ने अंग्रेजी शासन को नैतिक औचित्य प्रदान किया कि वे भारत को सभ्य बनाने आए हैं। यहीं से अत्याचार साहित्य की धारा प्रबल हुई, जिसमें भारतीय समाज को सहस्राब्दियों से स्थायी अत्याचार तंत्र के रूप में चित्रित किया गया।
अब दार्शनिक पक्ष पर विचार करें। भारतीय चिंतन कहता है कि सृष्टि त्रिगुणात्मक है। सत्त्व, रजस और तमस के विविध अनुपात से व्यक्तियों के गुण और प्रवृत्तियाँ निर्मित होती हैं। जब सृष्टि ही विविध है, तब समाज को पूर्ण समानता के एकरूप साँचे में ढालने का आग्रह प्रकृति विरोधी माना गया। भिन्नता अपने आप में अन्याय नहीं है। अन्याय तब है जब गरिमा और अवसर छीन लिए जाएँ। भारतीय सामाजिक संगठन का मूल भाव कर्तव्य विभाजन और परस्पर निर्भरता था। यदि यह केवल दमन तंत्र होता, तो सहस्राब्दियों तक सांस्कृतिक निरंतरता संभव न होती।
आधुनिक सामाजिक न्याय की अवधारणा कहती है कि 3000 वर्षों का शोषण हुआ। प्रश्न है कि क्या इतिहास रेखीय और एकरूप होता है। क्या हर क्षेत्र, हर कालखंड, हर परिस्थिति में वही शक्ति संबंध रहे। जिनके साथ अन्याय हुआ, वे अब जीवित नहीं हैं। जिन्होंने अन्याय किया, वे भी नहीं हैं। यदि आज हम समुदायों को स्थायी दोषी और स्थायी पीड़ित घोषित करते हैं, तो हम व्यक्ति आधारित न्याय से हटकर सामूहिक दोषारोपण की ओर बढ़ते हैं। यही आधुनिक बाइनरी ढाँचे की विशेषता है, स्थायी शोषक बनाम स्थायी शोषित।
अमेरिका में नस्लीय इतिहास की विशिष्ट पृष्ठभूमि में विकसित क्रिटिकल रेस थ्योरी को भारतीय संदर्भ में लागू कर दिया गया। वहाँ श्वेत बनाम अश्वेत का ढाँचा था, यहाँ ब्राह्मण या सामान्य बनाम शेष का ढाँचा निर्मित हुआ। यहाँ एक असंभव लक्ष्य निर्धारित किया गया, ऐतिहासिक अन्याय का पूर्ण प्रतिशोधन। ऐतिहासिक अन्याय को पूर्णतः सुधारना असंभव है क्योंकि मूल पीड़ित और मूल दोषी दोनों अब इस संसार में नहीं हैं। जब लक्ष्य असंभव हो, तो संघर्ष स्थायी बन जाता है।
स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण ऐतिहासिक वंचनाओं की स्वीकृति था। परंतु अन्य पिछड़ा वर्ग की अवधारणा ने स्थिति को जटिल बनाया। केंद्रीय ओबीसी सूची में लगभग 2600 से अधिक प्रविष्टियाँ दर्ज हैं। यदि सभी राज्यों की सूचियों को समेकित किया जाए तो यह संख्या लगभग 5000 से 5500 के बीच पहुँचती है।
यह सूची स्थिर नहीं है। समय समय पर नए समुदाय सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर जोड़े जाते रहे हैं। ओबीसी श्रेणी केवल हिंदू जातियों तक सीमित नहीं है। विभिन्न राज्यों में मुस्लिम और ईसाई समुदायों की सामाजिक इकाइयाँ भी इसमें सम्मिलित हैं। सिद्धांततः यह वर्ग आधारित श्रेणी है, पर व्यवहार में जाति आधारित सूची के माध्यम से लागू होती है।
यदि हजारों जातियाँ पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित हों और वे मिलकर समाज की बहुसंख्यक आबादी का प्रतिनिधित्व करें, तो प्रश्न उठता है कि यह सामाजिक संरचना की वास्तविकता है या वर्गीकरण की राजनीति। दुनिया में दुर्लभ उदाहरण मिलते हैं जहाँ बहुसंख्यक आबादी स्वयं को पिछड़ा घोषित श्रेणी में रखे।
भारतीय दृष्टि विविधता को स्वाभाविक मानती है। सभी व्यक्ति समान गुण, समान स्वभाव और समान भूमिका लेकर नहीं आते। भिन्नता अन्याय नहीं है। परंतु आधुनिक राजनीति समाज को स्थायी श्रेणियों में बाँटती है। जब पिछड़ेपन की परिभाषा राजनीतिक पहचान बन जाती है, तब सामाजिक आर्थिक स्थिति से अधिक राजनीतिक लाभ केंद्र में आ जाता है।
कुछ लोग कहते हैं कि जाति समाप्त हो जाए तो हिंदू एक हो जाएँगे। यह कथन सरल है, पर दार्शनिक रूप से अधूरा है। विविधता को मिटाकर एकता नहीं आती। एकता तब आती है जब विविधता का सम्मान हो। किसी एक समुदाय को 3000 वर्षों के शोषण का प्रतीक घोषित कर देना न्याय नहीं, सामूहिक दोषारोपण है। और सामूहिक दोषारोपण समाज को संगठित नहीं करता, उसे विभाजित करता है।
सामाजिक विकृतियों का सुधार आवश्यक है। अस्पृश्यता अन्याय थी और उसका उन्मूलन धर्म और संविधान दोनों की दृष्टि से आवश्यक था। परंतु संपूर्ण सभ्यता को स्थायी अपराध कथा में बदल देना न तो सत्य है और न समाधान। हिंदू समाज की एकता जाति निषेध के नारे से नहीं, समरसता के अभ्यास से आएगी। इतिहास का संतुलित पुनर्पाठ आवश्यक है, न अंध निंदा, न अंध स्तुति।
सृष्टि त्रिगुणात्मक है। विविधता उसका स्वभाव है। समाज में भिन्न भूमिकाएँ होंगी, यह स्वाभाविक है। प्रश्न यह है कि क्या हम उस विविधता को संतुलन में बदलते हैं या संघर्ष में? यह सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है, और यही सत्य भी है कि समाधान संघर्ष की स्थायी कथा में नहीं, सत्य की संतुलित स्वीकृति में है।
(लेखक स्तम्भकार हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

