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ब्रिक्स में भारत के सामने अवसर, पर चुनौती व्यापार घाटा कम करने की

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ब्रिक्स में भारत के सामने अवसर, पर चुनौती व्यापार घाटा कम करने की


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

बारह वर्ष पहले जिस भारत को ब्रिक्स की कमजोर कड़ी बताया जा रहा था, आज वही भारत इस विस्तारित समूह की दिशा तय करने की कोशिश कर रहा है। वस्तुत: वित्त वर्ष 2025-26 में ब्रिक्स देशों को भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में 49.27 प्रतिशत की छलांग इसका प्रमाण है। दूसरी ओर एक अन्य पहलू भी है जो ब्रिक्स के साथ भारत का व्यापार घाटा 2025-26 में बढ़कर 226.1 अरब डॉलर हो जाना बता रहा है, इसलिए दिल्ली में हो रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए तालियां बटोरने का अवसर नहीं, अपनी आर्थिक रणनीति की परीक्षा है।

ब्रिक्स की कहानी में भारत की स्थिति सचमुच बदली है। वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने ‘ब्रिक’ शब्द गढ़ा था। तब यह चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आर्थिक संभावना का अनुमान था। आज यह 11 देशों का ऐसा समूह है, जो दुनिया की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी, 40 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी और 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है। भारत इस वर्ष इसकी अध्यक्षता कर रहा है और 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है।

वैसे यह परिवर्तन अपने आप नहीं आया। 2011-12 में भारत को लेकर जो आर्थिक चिंताएं व्यक्त की गई थीं, उनमें महंगाई, कमजोर मुद्रा, राजकोषीय घाटा, चालू खाते का घाटा, कमजोर बुनियादी ढांचा और धीमी निवेश गति प्रमुख थे। आज भारत के सामने समस्याएं खत्म नहीं हुई हैं, किंतु उसकी आर्थिक क्षमता, डिजिटल अवसंरचना, विनिर्माण महत्वाकांक्षा और वैश्विक कूटनीतिक स्वीकार्यता का पैमाना निश्चित रूप से बदल चुका है।

यहीं से इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का आंकड़ा विशेष महत्व ग्रहण करता है। ब्रिक्स देशों को भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में 49.27 प्रतिशत वृद्धि, कुल निर्यात की 26.53 प्रतिशत वृद्धि से कहीं आगे है। सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत के ब्रिक्स इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में चीन और संयुक्त अरब अमीरात की संयुक्त हिस्सेदारी 88.50 प्रतिशत है। दूरसंचार उपकरण 74.60 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा निर्यात खंड हैं। इसका अर्थ साफ है, जहां भारत और चीन के बीच रणनीतिक अविश्वास और सीमा संबंधी तनाव मौजूद हैं, वहीं आर्थिक क्षेत्र में अवसर और निर्भरता का एक जटिल रिश्ता भी कायम है।

भारत को इसी विरोधाभास के बीच अपनी आर्थिक सुरक्षा और निर्यात क्षमता दोनों को साधना होगा, भारत की शक्ति उसकी रणनीतिक स्वायत्तता में है। उसे अमेरिका और यूरोप के बाजारों से भी जुड़ना है, चीन और रूस से भी आर्थिक संबंध रखने हैं और ग्लोबल साउथ के देशों में अपने लिए नए बाजार भी बनाने हैं। ब्रिक्स भारत के लिए दुनिया में अपने हितों को आगे बढ़ाने का साधन होना चाहिए। यह अच्छा है कि भारत इस वर्ष ब्रिक्स में उभरती तकनीकों पर शोध सहयोग और अंतर-सरकारी साझेदारी को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।

भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर यह है कि वह अपनी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और तकनीकी क्षमताओं को ब्रिक्स बाजारों से जोड़े। डिजिटल भुगतान, व्यापार दस्तावेज, प्रमाणन, सीमा-पार भुगतान और आपूर्ति शृंखला को डिजिटल बनाने में यदि सदस्य देश साझा व्यवस्था विकसित करते हैं तो व्यापार की लागत घट सकती है। स्वभाविक है, इसका बड़ा लाभ भारत को होगा।

वैसे भी पांच वर्षों में ब्रिक्स के साथ भारत का व्यापार दोगुने से अधिक हुआ, मगर इसी अवधि में व्यापार घाटा 74.5 अरब डॉलर से बढ़कर 226.1 अरब डॉलर हो गया। चीन, संयुक्त अरब अमीरात और रूस इस असंतुलन के प्रमुख स्रोत हैं, इसलिए यहां लगता है कि ‘ब्रिक्स में भारत की बढ़ती ताकत’ का उत्सव अधूरा होगा। भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ब्रिक्स का विस्तार भारतीय बाजार में आयात बढ़ाने का माध्यम भर न बन जाए। वास्तविक सफलता तब होगी जब भारतीय मशीनें, इलेक्ट्रॉनिक्स, औषधियां, इंजीनियरिंग उत्पाद, डिजिटल सेवाएं, कृषि-तकनीक और नवाचार इन बाजारों में अधिक जगह बनाएंगे।

यही कारण है कि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का बाजार खोलने, नियामकीय प्रक्रियाएं सरल करने और खेपों की तेज मंजूरी पर जोर है। यह भारत के निर्यात भविष्य की बुनियादी शर्त है। ब्रिक्स की विशाल जनसंख्या भारत के लिए तभी बाजार बनेगी, जब भारतीय कंपनियों के लिए वहां प्रवेश की लागत और बाधाएं कम होंगी।

एमएसएमई के संदर्भ में यह और महत्वपूर्ण हो जाता है। बड़ी कंपनियां किसी तरह अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बना लेती हैं, लेकिन छोटे उद्योगों के सामने वित्त, प्रमाणन, भुगतान, लॉजिस्टिक्स और बाजार की जानकारी जैसी बाधाएं होती हैं। प्रस्तावित एमएसएमई सहयोग तंत्र और इनवॉइस डिस्काउंटिंग व्यवस्था यदि जमीन पर उतरती है तो ब्रिक्स भारत के छोटे उद्यमों के लिए वैश्विक आपूर्ति शृंखला का प्रवेशद्वार बन सकता है। भारत की रोजगार क्षमता और निर्यात क्षमता को साथ बढ़ाने का यही रास्ता है।

इस दृष्टि से ब्रिक्स ट्रेड मंत्रियों की बैठक में एमएसएमई ऋण अंतर को कम करने और वैश्विक बाजारों तक छोटे व्यवसायों की पहुंच बढ़ाने के लिए सहमति भी महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ी जरूरत घोषणाओं को परिणाम में बदलने की है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस ने भी स्पष्ट किया है कि ब्रिक्स को रणनीतिक संवाद से आगे बढ़कर निर्यात, निवेश, तकनीक, आपूर्ति शृंखला और भुगतान व्यवस्था में मापने योग्य परिणाम देने होंगे।

आज ब्रिक्स के सामने अपनी एकता की भी परीक्षा है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि, चीन और भारत के बीच अविश्वास और वैश्विक व्यापार में बढ़ते भू-राजनीतिक टकराव इसे आसान मंच नहीं बनाते। ऐसे में भारत की अध्यक्षता की असली सफलता यह होगी कि वह अलग-अलग हितों वाले देशों को कम-से-कम आर्थिक सहयोग के साझा एजेंडे पर साथ ला सके।

भारत के लिए यह क्षण आत्ममुग्ध हो जाने का बिल्कुल नहीं है, वस्तुत: आत्मविश्वास के साथ आत्मपरीक्षण करने का है। ‘ब्रिक्स में भारत कमजोर कड़ी है’ से ‘ब्रिक्स में भारत महत्वपूर्ण कड़ी है’ तक की यात्रा निश्चित रूप से उल्लेखनीय है, किंतु अगला पड़ाव इससे कहीं कठिन है, क्योंकि यहीं से भारत को महत्वपूर्ण कड़ी से निर्णायक आर्थिक शक्ति बनना है।

इसके लिए ब्रिक्स की मेज पर भारत को तीन बातें लगातार रखनी होंगी, एक- बाजार तक आसान पहुंच, दो- तकनीक में साझेदारी और अंतिम- व्यापार में संतुलन। चौथी बात अपने आप निकलती है, वह है भारतीय उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धा।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का सूत्र ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता’ है। अब इस सूत्र को नारे से नीति और नीति से परिणाम में बदलने का समय है। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात की 49.27 प्रतिशत वृद्धि ने संभावनाओं का दरवाजा खोल दिया है, किंतु 226.1 अरब डॉलर का व्यापार घाटा चेतावनी भी दे रहा है, इसलिए इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं होगी कि दुनिया के बड़े नेता दिल्ली में एक साथ दिखाई दिए। असली उपलब्धि तब होगी जब ब्रिक्स की बैठक से लौटते समय भारतीय उद्यमी के सामने नए बाजार हों, भारतीय एमएसएमई वैश्विक मूल्य शृंखला में हों और भारत का निर्यात आयात की रफ्तार को पीछे छोड़ रहा हो। ब्रिक्स में ‘आई’ यानी इंडिया की वापसी हो चुकी है। अब सवाल यह है कि क्या यह ‘आई’ भारत की आर्थिक शक्ति का नया प्रतीक बनेगा?

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी