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(पुस्तक समीक्षा) मेरा मुन्नूः डॉग लवर्स बनाम बाकी दुनिया

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(पुस्तक समीक्षा) मेरा मुन्नूः डॉग लवर्स बनाम बाकी दुनिया


(पुस्तक समीक्षा) मेरा मुन्नूः डॉग लवर्स बनाम बाकी दुनिया


-विवेक शुक्ला

अब शायद ही कोई दिन गुजरता हो जब आप सोशल मीडिया पर डॉग लवर्स को उन लोगों से जूझते हुए न देखते हों, जिन्हें कुत्तों से परेशानी है। उनका सवाल होता है कि आप कुत्तों को पार्क में क्यों घुमा रहे हैं या हमारे घरों के सामने उन्हें दूध और भोजन क्यों दे रहे हैं? ये काटेंगे, बच्चों और बुजुर्गों के लिए खतरा बनेंगे। दूसरी ओर, कुत्ता प्रेमियों का तर्क है कि इन बेजुबानों को भोजन और आश्रय देने का अधिकार उनसे कोई नहीं छीन सकता। इस टकराव में दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं। मामला अदालतों तक पहुंच चुका है। दिल्ली और दूसरे शहरों में कुत्तों को लेकर विवाद कई बार उग्र रूप ले चुका है। इस पृष्ठभूमि में कुत्तों के पक्ष में शोधपरक पुस्तक का आना महत्वपूर्ण है।

कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन होता है। वे हमारे जीवन की दिनचर्या, भावनाओं और स्मृतियों में इस कदर रच-बस जाते हैं कि उनके चले जाने के बाद भी उनकी उपस्थिति बनी रहती है। हजारों लोगों के जीवन में उनका पेट डॉग इसी तरह की भूमिका निभाता है। वह केवल पालतू पशु नहीं, परिवार का सदस्य और अकेलेपन का साथी बन जाता है।

प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार पुष्परंजन ने कुत्तों को लेकर ‘मेरा मुन्नू’ नाम से बेहद जरूरी किताब लिखी है। यह मनुष्य और कुत्ते के बीच हजारों वर्षों से चले आ रहे आत्मीय संबंधों, विश्वास, सह-अस्तित्व और संवेदना की पड़ताल करती है।

सामान्यतः कुत्तों के प्रति प्रेम की चर्चा करते समय उनकी वफादारी, सुरक्षा और मनुष्य के प्रति समर्पण का उल्लेख होता है। लेकिन पुष्परंजन इस रिश्ते को और गहराई से समझने की कोशिश करते हैं।

आखिर कुत्ते मनुष्य के इतने निकट कैसे आए? किस ऐतिहासिक प्रक्रिया से वे मानव सभ्यता का हिस्सा बने? मनुष्य ने उन्हें साथी क्यों बनाया और उन्होंने मनुष्य के साथ कैसा भावनात्मक रिश्ता विकसित किया?

इस संदर्भ में कुत्तों की नस्लों का संसार भी दिलचस्प है। जर्मन शेफर्ड, लैब्राडोर, गोल्डन रिट्रीवर, बीगल और बुलडॉग जैसी नस्लों की अपनी विशेषताएं हैं। कोई सुरक्षा और पुलिस के काम में दक्ष है, कोई सूंघने की असाधारण क्षमता के लिए जाना जाता है और कोई अपने मिलनसार स्वभाव के लिए। भारत में देसी कुत्ते, जिन्हें इंडियन पैरियाह भी कहा जाता है, सदियों से स्थानीय जलवायु में रहकर विकसित हुए हैं।

नस्लों की विविधता बताती है कि मनुष्य ने अपनी अलग-अलग जरूरतों के अनुसार कुत्तों को प्रशिक्षित और विकसित किया है।

कुत्तों की उपयोगिता का एक अद्भुत उदाहरण जर्मनी में मिलता है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद दृष्टिबाधित सैनिकों की सहायता के लिए वहां कुत्तों को मार्गदर्शक बनाने का व्यवस्थित प्रशिक्षण शुरू हुआ। वर्ष 1916 में ओल्डेनबर्ग में दृष्टिबाधित लोगों के लिए दुनिया का पहला गाइड डॉग स्कूल स्थापित किया गया। प्रशिक्षित कुत्ते अपने मालिकों को सड़कों, रास्तों और बाधाओं से सुरक्षित निकालने लगे। आज गाइड डॉग दृष्टिबाधित लोगों की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के प्रतीक हैं। यह मनुष्य और पशु के बीच विश्वास की अनूठी मिसाल है।

किताब के संदर्भ में महात्मा गांधी के कुत्तों को लेकर विचारों का उल्लेख भी जरूरी है। सामान्यतः गांधी को अहिंसा और जीवदया का सबसे बड़ा समर्थक माना जाता है। लेकिन 1926 में उन्होंने आवारा और पागल कुत्तों के सवाल पर ऐसा मत रखा, जिस पर काफी विवाद हुआ। उनका मानना था कि यदि किसी कुत्ते से समाज को गंभीर खतरा हो और उसे बचाने या नियंत्रित करने का कोई उपाय न बचे तो उसकी पीड़ा समाप्त करने के लिए उसे मारना भी अहिंसा की व्यापक भावना के अंतर्गत उचित हो सकता है।

गांधी के इस विचार से स्पष्ट है कि पशु-करुणा और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन का प्रश्न नया नहीं है।

पड़ोसी पाकिस्तान में कुत्तों को लेकर एक और भयावह तस्वीर देखने को मिलती है। वहां पंजाब के कुछ ग्रामीण इलाकों में कुत्तों की लड़ाइयां आयोजित की जाती रही हैं। बुली कुट्टा जैसी ताकतवर नस्लों के कुत्तों को लड़ाया जाता है और दर्शक इन मुकाबलों पर सट्टा भी लगाते हैं। इसे मर्दानगी और प्रतिष्ठा से जोड़ने की प्रवृत्ति भी रही है। हालांकि वहां ऐसी लड़ाइयां प्रतिबंधित हैं, फिर भी कानून के कमजोर क्रियान्वयन के कारण ये गतिविधियां जारी रहने की खबरें आती हैं।

यह विडंबना है कि एक तरफ कुत्ते मनुष्य के सबसे भरोसेमंद साथी हैं, दूसरी तरफ मनोरंजन के लिए उन्हें हिंसा का माध्यम बनाया जाता है।

हमारे समाज में भी कुत्तों को लेकर अनेक धारणाएं और पूर्वाग्रह हैं। एक ओर लोग उन्हें परिवार का सदस्य मानते हैं, दूसरी ओर आवारा कुत्तों के प्रति भय, उपेक्षा और क्रूरता दिखाई देती है। बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा, कुत्तों के काटने की घटनाएं और सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता वास्तविक चिंताएं हैं। लेकिन इनका समाधान पशुओं के प्रति हिंसा नहीं बल्कि नसबंदी, टीकाकरण, जिम्मेदार भोजन व्यवस्था और प्रभावी प्रशासनिक प्रबंधन है।

‘मेरा मुन्नू’ जैसी पुस्तक इन सवालों पर पुनर्विचार का अवसर देती है। यह बताती है कि पशु भी अपने ढंग से प्रेम, लगाव, भय, दुख और बिछोह का अनुभव करते हैं। उनके प्रति हमारा व्यवहार हमारी मानवीय संवेदना की कसौटी है।

दरअसल, कुत्तों के प्रति हमारा व्यवहार केवल पशु प्रेम का सवाल नहीं है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि हम अपने से कमजोर और असहाय जीवों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं। ‘मेरा मुन्नू’ इसी संवेदनशील सवाल को हमारे सामने रखती है।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश