बदलते बंगाल की नई इबारत: वाम से ममता और अब भाजपा!
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से विचारधाराओं, आंदोलनों और सत्ता संघर्षों की प्रयोगशाला रही है। 1977 से 2011 तक वामपंथ का लंबा शासन, उसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस का उदय और अब 2026 में भारतीय जनता पार्टी का स्पष्ट बहुमत- ये तीनों चरण वास्तव में इस राज्य के लिए जनमानस के बदलते विश्वास का प्रतिबिंब हैं।
1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में आया और अगले 34 वर्षों तक उसने राज्य की राजनीति पर एकछत्र राज किया। शुरुआती वर्षों में भूमि सुधार और पंचायत सशक्तिकरण जैसे कदमों ने ग्रामीण समाज को नई दिशा दी, लेकिन समय के साथ यही शासन तंत्र जड़ता का शिकार हो गया। सत्ता का केंद्रीकरण, राजनीतिक हिंसा और औद्योगिक विकास की कमी, हिन्दू अत्याचार, मुस्लिम तुष्टिकरण से जैसे राज्य की सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक गति को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था।
नंदीग्राम और सिंगूर: बदलाव की चेतना
2007 के नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलनों ने वामपंथी शासन की नींव को हिला दिया। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ उठे इन जनआंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि जनता अब विकास के नाम पर जबरदस्ती स्वीकार करने को तैयार नहीं है। इन घटनाओं ने जनता के भीतर परिवर्तन की इच्छा को मजबूत किया।
ममता बनर्जी का उदय और उम्मीदों का नया दौर
2011 में ममता बनर्जी ने “मां, माटी, मानुष” के नारे के साथ सत्ता संभाली। ममता बनर्जी ने खुद को गरीबों, किसानों और आम लोगों की नेता के रूप में स्थापित किया। शुरुआती वर्षों में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी और लगा कि बंगाल एक नई दिशा में आगे बढ़ेगा। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता चला, लोगों के ध्यान में आया कि ममता बनर्जी भी उसी राह पर चल पड़ी हैं, जिसके चलते वामपंथी शासन का किला यहां की जनता ने ढहाया था। समय के साथ ममता सरकार पर भी वही आरोप लगने लगे जो कभी वामपंथ पर लगते थे। “कट मनी”, राहत घोटाले और प्रशासनिक पक्षपात जैसे मुद्दों ने सरकार की विश्वसनीयता को कमजोर किया। स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं का बढ़ता प्रभाव और प्रशासन पर राजनीतिक दबाव ने शासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए।
राजनीतिक हिंसा: एक स्थायी चुनौती
पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा एक गंभीर समस्या रही है। 2021 के चुनावों के बाद हुई हिंसा ने पूरे देश का ध्यान खींचा। आरोप लगे कि विपक्षी कार्यकर्ताओं विशेष तौर पर बीजेपी के कार्यकर्ता और पार्टी पदाधिकारियों को निशाना बनाया गया। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठे और जनता के भीतर असुरक्षा की भावना बढ़ी।
महिला सुरक्षा और सामाजिक असंतोष
महिला सुरक्षा से जुड़े मामलों, विशेष रूप से आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं ने सरकार की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाया। जिस “मां, माटी, मानुष” के नारे के साथ ममता बनर्जी ने सत्ता संभाली थी, ध्यान में आया कि उनके शासन में लगातार महिलाओं पर हिंसा बढ़ी है, बलात्कार के अनेक मामले एक के बाद एक यहां सामने आए हैं। जिसके परिणाम स्वरूप महिलाओं का एक बड़ा वर्ग सरकार से निराश होता गया। यह असंतोष धीरे-धीरे राजनीतिक रूप लेने लगा और चुनावी परिणामों में आज इसका असर स्पष्ट दिखाई दिया है।
भाजपा का प्रवेश: विकल्प की तलाश का उत्तर
भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में धीरे-धीरे अपनी जड़ें मजबूत कीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में 42 में से 18 सीटें जीतकर पार्टी ने यह संकेत दे दिया था कि वह अब एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और उनकी छवि ने पार्टी को विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यहां देखने में आता है कि भाजपा ने केवल चुनावी रणनीति पर ही नहीं, बल्कि संगठनात्मक विस्तार पर भी जोर दिया। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता, सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति और लगातार जनसंपर्क ने पार्टी को मजबूत आधार दिया। यह विस्तार सामाजिक स्तर पर भी प्रभावी साबित हुआ और आज भाजपा यहां निर्णायक सत्ताधारी दल के रूप में स्थापित होने जा रही है।
जनादेश का निर्णायक संदेश
अब तक के सामने आए विधानसभा चुनाव में बढ़त को देखकर लगता है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। यहां हुआ 92 प्रतिशत से अधिक मतदान यह दर्शाता है कि जनता ने इस बार निर्णायक बदलाव का मन बना लिया था। जोकि शासन के प्रति जनता के असंतोष का स्पष्ट संदेश है। कहना होगा कि भाजपा की जीत आज उस व्यापक जनभावना का परिणाम है जो बदलाव चाहती थी। लोगों ने भाजपा को एक ऐसे विकल्प के रूप में देखा जो स्थिरता, विकास और मजबूत शासन दे सकता है। भाजपा के सत्ता में आने से केवल सरकार नहीं बदलेगी, बल्कि राजनीतिक संस्कृति में भी बदलाव की उम्मीद की जा रही है। हिंसा मुक्त चुनाव, पारदर्शी प्रशासन और विकास केंद्रित राजनीति, ये वे अपेक्षाएं हैं जो जनता भाजपा से कर रही है।
आर्थिक विकास की नई उम्मीदें
बंगाल लंबे समय से औद्योगिक विकास में पिछड़ता रहा है। भाजपा के नेतृत्व में निवेश, उद्योग और रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। केंद्र और राज्य के बेहतर समन्वय से विकास को गति मिल सकती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति का यह सफर दर्शाता है कि जनता हमेशा बदलाव की तलाश में रहती है। 34 वर्षों का वाम शासन, 15 वर्षों का तृणमूल शासन और अब भाजपा का उदय, आज ये सभी उस लोकतांत्रिक चेतना के प्रतीक हैं जो समय-समय पर खुद को अभिव्यक्त करती है। 2026 का जनादेश पश्चिम बंगाल के लिए एक नई दिशा की शुरुआत है, जिसमें भाजपा के नेतृत्व में बंगाल एक नए अध्याय की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

