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भाजपा, संकल्प और राष्ट्रवाद

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भाजपा, संकल्प और राष्ट्रवाद


मृत्युंजय दीक्षित

वर्ष 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद से लेकर अब तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देशन में भाजपा अपने सभी संकल्पों को गंभीरता के साथ पूर्णता की ओर ले जाने के लिए अग्रसर है। भाजपा ने अपनी स्थापना से लेकर अब तक किए गए कई संकल्प पूर्ण किए हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि स्थल पर दिव्य व भव्य राम मंदिर का निर्माण कराना। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाया जाना। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के समय से चल रहा महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक भी कानून बन चुका है। भाजपा के सभी संकल्पों में राष्ट्रवाद की झलक है।

सामान नागरिक संहिता भी भारतीय जनता पार्टी का एक संकल्प है, जो चरणबद्ध रूप से सिद्धि की दिशा में बढ़ रहा है। पहले समान नागरिक संहिता कानून भाजपा शासित राज्य उत्तराखंड में सफलतापूर्वक लागू हुआ अब उसकी सफलता का गहन अध्ययन करने के बाद गुजरात भी ऐसा दूसरा राज्य बन गया है जहां सामान नागरिक संहिता लागू की गई है। विगत विधानसभा चुनाव से पूर्व गुजरात भाजपा के संकल्प पत्र में सामान नागरिक संहिता लागू करने का वादा किया गया था और इसके लिए एक समिति भी बना दी गई थी।

प्रधानमंत्री मोदी लाल किले के संबोधन से भारतीय जनमानस के लिए समान नागरिक संहिता की बात कर चुके हैं। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अगर मुस्लिम महिलाओं को भी समान अधिकार प्राप्त करने हैं तो अब समय आ गया है कि देश की संसद समान नागरिक संहिता पर विचार करे और कानून बनाए। गुजरात विधानसभा में सात घंटे की लंबी चर्चा के बाद यह विधेयक पारित हुआ। इस पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सदस्यों ने इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी करार देते हुए कहा कि भाजपा यह विधेयक जानबूझ कर चुनाव से पहले जल्दबाजी में लेकर आई है ।

इस विधेयक के पारित हो जाने के बाद गुजरात में विभिन्न जातियों, धर्मों और सम्प्रदायों के लिए लोगों के लिए विवाह, तलाक, पिता की संपत्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी और लिव -इन रिलेशनशिप को लेकर समान नागरिक संहिता कानून लागू हो जाएगा।विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक प्रस्तुत करते समय मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न वर्गों और धर्मों के बीच कानूनी भेदभाव को समाप्त करना है। उन्होंने बताया कि अनुसूचित जनजातियों के पुरुषों और महिलाओं पर यह कानून लागू नहीं होगा लेकिन मुस्लिम समुदाय के लिए पर्सनल लॉ को समाप्त किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की समान नागरिक संहिता कानून की आवश्यकता पर दिए गए बयान का उल्लेख करते हुए सदन में कहा कि आजादी के 75 वर्ष बाद भी विभिन्न धर्मों और समाजों के लोगों के नागरिक अधिकारों के साथ भेदभाव हो रहा है। इस कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, पिता की संपत्ति, भरण पोषण और लिव इन रिलेशनशिप के कानूनों में एकरूपता लाना है। इस विधेयक में विवाह, तलाक और लिव इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। इस विधेयक में पहचान छिपाकर धोखे से विवाह करने पर सात वर्ष की सजा का प्रावधान किया गया है ताकि किसी बेटी को धोखा देकर उसका जीवन खराब न किया जा सके।

समान नागरिक संहिता कानून के पक्ष में कहा जा रहा हे कि इससे महिला सशक्तिकरण के प्रयासों को मजबूती प्राप्त होगी। यह मुस्लिम महिलाओं को कानूनी सुरक्षा देगा। कानून लागू हो जाने के बाद इसके लागू होने के दिन से लिव -इन में रहने वाली महिलाओं को भी पहचान मिल सकेगी। सरकार यह स्पष्ट रूप से कह रही है कि यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं अपितु नागरिक अधिकारों को समान बनाने के लिए है। एक प्रश्न यह उठाया जा रहा है कि जब यह समान नागरिक संहिता कानून है तो फिर इसमें आदिवासी समाज को क्यों अलग किया गया है? समान नागरिक संहिता का कांग्रेस विरोध कर रही है। रही बात कांग्रेस और विपक्ष के विरोध की तो वह तो पूरी तरह से मुस्लिम लीगी माओवादी हो चुका है। विपक्ष का कोई भी वक्तव्य सिर्फ वोट बैंक और तुष्टिकरण के लिए ही होता है ।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद