सचिवालय से संगठन तक सुशासन की नई रेस में देश में सबसे आगे भाजपा शासित राज्य
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारतीय राजनीति में सत्ता के केंद्र बदल रहे हैं। कभी आम नागरिक की शिकायत का रास्ता गांव से तहसील, जिला और फिर सचिवालय तक जाता था, अब भाजपा शासित राज्यों में सरकार को संगठन के दरवाजे तक लाने का प्रयोग तेजी से आकार ले रहा है। प्रदेश भाजपा कार्यालयों में मंत्रियों की मौजूदगी, सीधे शिकायत सुनना, अधिकारियों को मौके पर फोन और डिजिटल पोर्टल पर शिकायत की निगरानी ने जनसुनवाई को राजनीतिक कार्यक्रम से आगे शासन के नए औजार में बदल दिया है।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान इस प्रयोग में अलग-अलग मॉडल लेकर सामने हैं। कहीं समय की सीमा टूट रही है, कहीं तकनीक शिकायत का पीछा कर रही है, कहीं संगठन मंत्री के साथ बैठ रहा है और कहीं राजधानी से बाहर जाकर सरकार जनता तक पहुंच रही है। इस प्रतिस्पर्धा का सीधा असर नौकरशाही की जवाबदेही और आम नागरिक की सरकार तक पहुंच पर पड़ रहा है।
दरअसल, इस संबंध में ‘स्वदेश’ की पड़ताल ने भाजपा बनाम अन्य राज्यों की तुलना में एक अलग ही तस्वीर भारत के राज्यों की पेश की है। लोकतंत्र में सरकार चुनने के बाद नागरिक की सबसे बड़ी परेशानी अक्सर अपनी समस्या को सही अधिकारी तक पहुंचाना होती है। फाइलों की लंबी प्रक्रिया, दफ्तरों के चक्कर और स्थानीय स्तर पर सुनवाई में देरी इस दूरी को और बढ़ाती है। भाजपा शासित राज्यों में पार्टी कार्यालयों में मंत्रियों की नियमित जनसुनवाई ने इस पारंपरिक व्यवस्था के समानांतर एक सीधा राजनीतिक संपर्क तंत्र खड़ा किया है।
मंत्री सचिवालय की औपचारिक व्यवस्था से बाहर निकलकर संगठन कार्यालय में बैठते हैं और आम नागरिक, कार्यकर्ता, किसान या जरूरतमंद व्यक्ति सीधे अपनी शिकायत सामने रखता है। इससे सरकार और संगठन के बीच संवाद भी बढ़ता है और जमीनी स्तर से आने वाली समस्याओं का फीडबैक सीधे सत्ता के शीर्ष तक पहुंचता है।
दूसरी ओर गैर भाजपा शासित राज्य हैं, इन राज्यों में मंत्रियों के नियमित रूप से पार्टी दफ्तरों में बैठने का चलन नहीं है। यहाँ की व्यवस्था मुख्य रूप से सचिवालय, मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) और सरकारी पोर्टलों पर केंद्रित है।आम आदमी पार्टी (पंजाब-दिल्ली): 'आप' का मुख्य ध्यान 'सरकार आपके द्वार' या 'जनता मिलनी' जैसे कार्यक्रमों पर रहता है। कांग्रेस शासित राज्य (कर्नाटक-हिमाचल), यहाँ पारंपरिक व्यवस्था लागू है, जिसमें मुख्यमंत्री और मंत्री अपने सरकारी आवास या सचिवालय में जनता दरबार लगाते हैं।
दक्षिण व वामपंथी राज्य (केरल-तमिल नाडु) में पंचायती राज व्यवस्था है, पर भाजपा जैसा तकनीकि मॉडल अब तक विकसित नहीं हुआ है। तमिल नाडु में 'आपके निर्वाचन क्षेत्र में मुख्यमंत्री' अभियान के तहत सीधे जिलों में शिकायत शिविर लगाए जाते हैं।
उधर तकनीकि का भरपूर उपयोग करने के कारण मध्य प्रदेश (जैसे डिजिटल लिंकेज) और उत्तर प्रदेश (ऑन-द-स्पॉट फोन कॉल्स) के मॉडलों में शिकायतों के निपटारे की दर अधिक है। चूंकि यहाँ आवेदन सीधे सरकारी तंत्र (जैसे सीएम हेल्पलाइन) में दर्ज हो जाते हैं, इसलिए अधिकारियों के पास निश्चित समय-सीमा होती है। इस पैमाने पर भाजपा शासित राज्यों का 'सहयोग सेल' मॉडल अधिक परिणामोन्मुखी दिखाई देता है।
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश ने इस व्यवस्था को बड़े पैमाने पर जनसंपर्क का माध्यम बनाया है। लखनऊ स्थित भाजपा प्रदेश मुख्यालय में मंत्रियों के बैठने का निर्धारित समय सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक है। मगर बड़ी संख्या में फरियादियों के पहुंचने पर यह समय सीमा लगातार चार से छह घंटे तक पहुंच जाती है। संदेश यह है कि राजधानी तक पहुंचे किसी भी यूपी वासी को समय पूरा होने का हवाला देकर वापस नहीं लौटाया जाता। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में इस जनसुनवाई के दौरान प्रति माह करीब 4,500 से 5,000 लोग पहुंचते हैं। ऑन-द-स्पॉट निवारण दर यूपी की 75 प्रतिशत तक सामने आई है।
उत्तर प्रदेश मॉडल की सबसे प्रभावी तस्वीर तब दिखाई देती है जब मंत्री शिकायत सुनने के बाद संबंधित जिले के जिलाधिकारी या पुलिस अधीक्षक से सीधे फोन पर बात करते हैं। जमीन पर कब्जे, भूमि विवाद, पुलिस में सुनवाई न होने अथवा प्रशासनिक लापरवाही जैसी शिकायतों पर तत्काल निर्देश देने की कोशिश की जाती है। इस व्यवस्था ने शिकायतकर्ता और जिला प्रशासन के बीच राजनीतिक जवाबदेही की सीधी कड़ी बनाई है। पार्टी कार्यालय से निकला फोन जिला प्रशासन तक पहुंचते ही शिकायत को प्राथमिकता मिलने की संभावना बढ़ जाती है। यही ‘असीमित समय और त्वरित कार्रवाई’ वाला मॉडल यूपी को इस प्रतिस्पर्धा में अलग पहचान देता है।
मध्य प्रदेश ने जनसुनवाई को तकनीक से जोड़कर इसका दूसरा मॉडल सामने रखा है। भोपाल स्थित सहयोग केंद्र में आने वाली शिकायतों को सीएम हेल्पलाइन से जोड़े जाने के कारण पार्टी कार्यालय में दी गई अर्जी सरकारी डिजिटल तंत्र में दर्ज हो जाती है। शिकायत दर्ज होने के बाद उसकी निगरानी और प्रगति का पता लगाया जा सकता है। मंत्री के निर्देश के साथ आवेदन संबंधित सरकारी प्रणाली तक पहुंचता है और विभागीय स्तर पर उसके निस्तारण की समय-सीमा निर्धारित होती है। यानी यहां मॉडल का जोर इस बात पर है कि शिकायत सुनने के बाद वह फाइलों के ढेर में खो न जाए। डिजिटल ट्रैकिंग उसे लगातार निगरानी के दायरे में रखती है।
उपलब्ध तुलनात्मक आंकड़ों में मध्य प्रदेश का सहयोग सेल 82 प्रतिशत निवारण दर के साथ सबसे है। प्रति माह यहां करीब 3,500 से 4,000 आवेदक पहुंचते हैं। पूर्ण डिजिटल पोर्टल लिंक इसकी प्रमुख विशेषता है। यूपी जहां मानवीय हस्तक्षेप और तत्काल राजनीतिक कार्रवाई को ताकत बना रहा है, वहीं मध्य प्रदेश ने शिकायत के समाधान को तकनीकी निगरानी से जोड़ने की कोशिश की है। दोनों मॉडल की दिशा एक ही है, शिकायतकर्ता को यह भरोसा दिलाना कि उसकी अर्जी दर्ज होने के बाद उसका पीछा भी किया जाएगा।
छत्तीसगढ़ ने इस दौड़ में सरकार और संगठन के बीच संतुलन को अपना आधार बनाया है। रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में होने वाली जनसुनवाई में मंत्री के साथ संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों की मौजूदगी को महत्व दिया गया है। यहां ऐसा माना जाता है कि हर समस्या का जवाब सिर्फ प्रशासनिक आदेश नहीं है। यदि मामला सरकार से जुड़ा है, पर सामाजिक हस्तक्षेप से समाप्त हो सकता है तो मंत्री के साथ संगठनात्मक रूप से भी पार्टी पदाधिकारी उसे संभालते हैं। इससे सत्ता और संगठन के बीच संवाद की दोहरी व्यवस्था बनती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में प्रति माह करीब 2,000 से 2,500 आवेदक पहुंचते हैं और निवारण दर लगभग 70 प्रतिशत है।
राजस्थान ने इस व्यवस्था में सबसे बड़ा जोर विकेंद्रीकरण पर दिया है। विशाल भौगोलिक विस्तार वाले राज्य में हर नागरिक के लिए जयपुर पहुंचना आसान नहीं। इसलिए जयपुर मुख्यालय की जनसुनवाई के साथ संभाग और जिला स्तर पर इसे ले जाने की कोशिश की जा रही है। जयपुर में सोमवार, मंगलवार और बुधवार को जनसुनवाई का रोस्टर निर्धारित है। वरिष्ठ मंत्रियों और उपमुख्यमंत्रियों की ड्यूटी रोटेशन से लगती है। इसके अलावा प्रभारी जिलों और संभाग मुख्यालयों में स्थानीय पार्टी कार्यालयों पर ‘मिनी जनसुनवाई’ की व्यवस्था विकसित की जा रही है। इस मॉडल का लक्ष्य सीधा है, जैसलमेर या बाड़मेर के नागरिक को छोटी प्रशासनिक समस्या लेकर सैकड़ों किलोमीटर दूर जयपुर आने की जरूरत न पड़े।
आंकड़े बता रहे हैं किसकी क्या ताकत
राज्य - मॉडल - सक्रियता - मासिक आवेदक - निवारण दर
उत्तर प्रदेश - मानवीय जुड़ाव और त्वरित कार्रवाई - 5 दिन - 4,500–5,000 - 75 फीसद
मध्य प्रदेश - डिजिटल ट्रैकिंग और सीएम हेल्पलाइन - 5 दिन - 3,500–4,000 - 82 फीसद
छत्तीसगढ़ - सत्ता-संगठन समन्वय - 5 दिन - 2,000–2,500 - 70 फीसद
राजस्थान - संभागीय विकेंद्रीकरण - 3 दिन - 2,500–3,000 - 68 फीसद
बिहार - भाजपा कोटा आधारित सुनवाई - 3–4 दिन - 1,500–1,800 - 60 फीसद
महाराष्ट्र - क्षेत्रीय प्रभार आधारित मॉडल - 2–3 दिन - 1,200–1,500 - 55 फीसद
उपलब्ध तुलनात्मक सूचकांक में मध्य प्रदेश निवारण दर में सबसे आगे है, जबकि आवेदकों की संख्या और जनसुनवाई के समय के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे व्यापक मॉडल के रूप में सामने आता है।
पूर्ण बहुमत बनाम गठबंधन की अलग तस्वीर
इस प्रयोग का एक राजनीतिक पहलू भी है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा की अपने दम पर सरकार होने से संगठन और सरकार के बीच समन्वय अपेक्षाकृत सीधा है। वहीं बिहार और महाराष्ट्र जैसे गठबंधन वाले राज्यों में पार्टी कोटे के मंत्री अपनी जनसुनवाई करते हैं। यहां जनसुनवाई सरकार के सामूहिक कामकाज के साथ-साथ भाजपा के संगठनात्मक जनाधार को मजबूत रखने का माध्यम भी बनती है। उपलब्ध सामग्री के अनुसार गठबंधन वाले राज्यों में भी भाजपा मंत्रियों के बीच जनता और कार्यकर्ताओं तक पहुंच बनाने की प्रतिस्पर्धा मौजूद है।
नौकरशाही के लिए सीधा संदेश: अब जवाब देना होगा
इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा दबाव प्रशासनिक तंत्र पर पड़ता है। जब कोई मंत्री पार्टी कार्यालय से ही जिलाधिकारी या पुलिस अधीक्षक को फोन कर शिकायत की स्थिति पूछता है, तो स्थानीय स्तर पर मामले को लंबित रखने की गुंजाइश कम होती है। शिकायतकर्ता के सामने अधिकारी से सीधा संपर्क उसे यह संकेत देता है कि उसकी समस्या सत्ता के संज्ञान में आ चुकी है।
भाजपा शासित राज्यों में शुरू हुई यह प्रतिस्पर्धा आने वाले समय में शासन की राजनीतिक कसौटी बदल सकती है। चुनावी राजनीति में अब यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि सरकार ने कितनी योजनाएं घोषित कीं, इसके साथ यह भी कि आम आदमी की शिकायत कितनी जल्दी सुनी और सुलझाई गई।
उत्तर प्रदेश ने समय और तत्काल कार्रवाई का रास्ता चुना है। मध्य प्रदेश ने डिजिटल निगरानी को अपनी ताकत बनाया है। छत्तीसगढ़ ने सत्ता और संगठन को एक मंच पर खड़ा किया है। राजस्थान राजधानी से शासन को संभागों और जिलों तक ले जाने की कोशिश कर रहा है। एक तरह से देखें तो चारों मॉडल अलग हैं, लेकिन राजनीतिक संदेश एक है, वह यही है कि सत्ता की दूरी घटानी होगी और शिकायत के समाधान की गति बढ़ानी होगी। यही श्रम बार-बार सत्ता में आने एवं सतत बने रहने का मूल मंत्र हैं, जिसे अब भाजपा सिर्फ समझ ही नहीं चुकी है, इसका सफल प्रयोग भी अपने शासित राज्यों में कर रही है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

