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'मिसाइल मैन जो महिला सशक्तीकरण को मजबूत राष्ट्र का आधार मानते थे

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'मिसाइल मैन जो महिला सशक्तीकरण को मजबूत राष्ट्र का आधार मानते थे


-पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जयंती (15 अक्टूबर, 1931) पर विशेष -डॉ. लोकेश कुमार चन्देल

एपीजे अब्दुल कलाम को 'भारत का मिसाइल मैन और 'जनता का राष्ट्रपति कहा जाता है। वे कहते थे कि सपने वो नहीं, जो सोने के बाद देखते हैं, सपने वो हैं, जो आपको सोने नहीं देते। यदि आप सूरज की तरह चमकना चाहते हैं तो पहले सूरज की तरह जलना सीखना होगा।' उनका जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। उनको भारत के 11वें राष्ट्रपति, महान एयरस्पेस वैज्ञानिक और युवाओं के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत के रूप में जा जाता है। उन्हें एक ऐसे शिक्षक के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने जीवन का अंतिम क्षण भी छात्रों को पढ़ाते हुए बिताया।

उनका पूरा नाम अवुल पाकिर जैनुलआबदीन अब्दुल कलाम है। उन्हें बच्चों और छात्रों से बेहद लगाव था इसलिए उनकी जयंती को 'विश्व छात्र दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। वे इसरो और डीआरडीओ में रहकर देश के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएलवी- 3 वी) समेत कई मिसाइल कार्यक्रमों में अहम योगदान दिया। उन्हें 1997 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

उन्होंने रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन में रहते हुए ‘अग्नि’ और ‘पृथ्वी’ जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास में अहम भूमिका निभाई, जिससे उन्हें यह उपाधि मिली। उनका कार्यकाल 2002 से 2007 तक राष्ट्रपति रहने के दौरान उनका सरल स्वभाव, बच्चों और युवाओं से जुड़ाव और सादा जीवन उन्हें ‘जनता का राष्ट्रपति’ बनाता है।

उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में कार्य करते हुए भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपास्त्र का नेतृत्व किया और 1998 के पोखरण-द्वितीय परमाणु परीक्षण में मुख्य भूमिका निभाई। ‘इंडिया 2020’ और प्रौद्योगिकी विजन 2020 के माध्यम से भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का रोडमैप तैयार किया। ‘विंग्स ऑफ फायर’ और ‘इग्नाइटेड माइंड्स’ जैसी प्रेरणादायक पुस्तकें लिखीं और युवाओं को प्रेरित करने के लिए अपना पूरा जीवन शिक्षक के रूप में समर्पित कर दिया। उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न (1997) के अलावा पद्म विभूषण (1990) और पद्म भूषण (1981) से भी सम्मानित किया गया था।

उनका मानना था कि किसी भी देश के भविष्य की नींव उसके क्लासरूम में होती है। प्राथमिक शिक्षा में रचनात्मकता और ज्ञान को बढ़ावा मिलना बहुत आवश्यक है। असफलता से कभी घबराना नहीं चाहिए क्योंकि असफलताएं ही आगे चलकर सफल होने के नए आइडिया देती हैं। एक सुंदर और भ्रष्टाचार मुक्त समाज के निर्माण में परिवार की मुख्य भूमिका होती है, इसमें माता-पिता और शिक्षक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों में सही संस्कार डालें। खुश रहने का सबसे बड़ा मंत्र है कि उम्मीद हमेशा खुद से रखें, किसी और इंसान से नहीं। उनका कहना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना या डिग्री हासिल करना नहीं है बल्कि एक अच्छे और संवेदनशील इंसान का निर्माण करना है। उनका कहना था कि सच्ची शिक्षा वही है, जो छात्रों में मानवीय मूल्य, अनुशासन, सत्यनिष्ठा और चरित्र का विकास करे। उनका विचार था कि किसी भी देश के भविष्य की नींव बोर्डरूम में नहीं बल्कि क्लासरूम (कक्षाओं) में रखी जाती है। एक अच्छी शिक्षा प्रणाली वह है, जो बच्चों में नई चीजें सीखने की जिज्ञासा, प्रश्न पूछने की क्षमता और रचनात्मकता को बढ़ावा दे। वे चाहते थे कि शिक्षा ऐसी हो, जो युवाओं को केवल ‘नौकरी खोजने वाला’ न बनाए बल्कि उन्हें ‘नौकरी देने वाला’ और 'उद्यमी तैयार करे।

वे स्वयं को एक शिक्षक कहलाना पसंद करते थे। उनके अनुसार शिक्षक का काम बच्चों में क्षमताएं खोजने और उन्हें प्रेरित करने का होना चाहिए। उन्होंने बचपन से ही बच्चों में वैज्ञानिक सोच, कौशल विकास और तकनीकी समझ को मजबूत करने पर जोर दिया। उनका मानना था कि कॉलेज या यूनिवर्सिटी की डिग्री से ज्यादा महत्वपूर्ण वह बुनियादी और मूल्य-आधारित शिक्षा है, जो बच्चे को उसके बचपन में मिलती है।

डॉ . कलाम का कहना था कि धर्म और अध्यात्म पर विचार अत्यंत उदार, समावेशी और मानवतावादी थे। वे एक सच्चे मुसलमान थे, जो नियमित रूप से नमाज पढ़ते, रोजा रखते थे और कुरान का अध्ययन करते थे लेकिन इसके साथ ही वे सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान भी करते थे। उनका मानना था कि व्यक्तिगत आस्था और धर्म अपनी जगह हैं लेकिन जब देश की बात आती है, तो सबसे बड़ी पहचान ‘भारतीय’ होनी चाहिए। उन्होंने ‘इग्नाइटेड माइंड्स’ जैसी पुस्तकों में लिखा कि जब तक हम धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर राष्ट्र को प्राथमिकता नहीं देंगे, विकसित भारत का सपना पूरा नहीं हो सकता। वे धर्म को जोड़ने का माध्यम मानते थे, बांटने का नहीं। उनका विचार था कि ‘महान लोग धर्म को दोस्त बनाने का जरिया मानते हैं, जबकि छोटे लोग इसे लड़ने का हथियार बना लेते हैं। वे केवल इस्लाम तक सीमित नहीं थे, उन्होंने भगवद्गीता का अध्ययन किया, वीणा बजाई और प्रमुख स्वामी महाराज जैसे आध्यात्मिक गुरुओं से गहरे जुड़े रहे। वैज्ञानिक कार्यों के दौरान वे तिरुपति मंदिर भी जाते थे। उनके लिए विज्ञान और अध्यात्म एक ही सिक्के के दो पहलू थे। उनका मानना है कि पूरी मानवता और ब्रह्मांड एक ही सर्वोच्च शक्ति की व्यवस्थाएं हैं। उन्होंने हमेशा यही सिखाया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।

महिला सशक्तीकरण के हिमायती

वे महिला सशक्तीकरण के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि किसी भी देश और समाज के तीव्र विकास के लिए महिलाओं का सशक्त होना सबसे पहली शर्त है। वे हमेशा कहा करते थे कि जब महिलाओं को सशक्त बनाया जाता है, तो एक स्थिर, सुरक्षित और शांतिपूर्ण समाज सुनिश्चित होता है। महिलाओं का सशक्तीकरण एक अच्छे परिवार, अच्छे समाज और अंततः एक मजबूत राष्ट्र के तीव्र विकास की ओर ले जाता है। उनका कहना था कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, क्योंकि उनकी कार्यशैली और मूल्य प्रणाली देश को सही दिशा दे सकती है। महिलाओं को शिक्षित करने से न केवल उनका जीवन सुधरता है बल्कि समाज में जागरूकता आती है और जनसंख्या वृद्धि को भी नियंत्रित करने में मदद मिलती है। उन्होंने हमेशा कृषि, हस्तशिल्प और उद्योगों में महिला उद्यमियों को बढ़ावा देने की बात कही, ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें। नारी को ईश्वर की सबसे सुंदर रचना मानते थे। उन्होंने अपने जीवन में दो महिलाओं को अपना सबसे बड़ा मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत बताया था। उन्होंने सरलता, सादगी और निःस्वार्थ प्रेम सीखा। बहरहाल हम कह सकते हैं कि एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन बच्चों, महिलाओं और वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणापुंज हैं।

(लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं )

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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित