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बांग्लादेश में चीन का बढ़ता प्रभाव: भारत के लिए चुनौती, अवसर और बदलता सामरिक समीकरण

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बांग्लादेश में चीन का बढ़ता प्रभाव: भारत के लिए चुनौती, अवसर और बदलता सामरिक समीकरण


ओम पराशर

विश्व राजनीति का शक्ति संतुलन तेजी से हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हो रहा है। इस बदलते परिदृश्य में दक्षिण एशिया का सामरिक महत्व अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है और इस परिवर्तन के केंद्र में बांग्लादेश उभरकर सामने आया है। कभी भारत की पूर्वी सीमा स्थित एक पड़ोसी देश के रूप में देखा जाने वाला बांग्लादेश आज हिंद-प्रशांत रणनीति, वैश्विक समुद्री व्यापार, क्षेत्रीय संपर्क और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बन चुका है।

पिछले एक दशक में चीन ने जिस गति से बांग्लादेश में आर्थिक, तकनीकी, औद्योगिक और सामरिक निवेश बढ़ाया है, उसने पूरे क्षेत्र की भू-राजनीतिक दिशा बदल दी है। यह केवल दो देशों के बीच बढ़ते आर्थिक संबंधों की कहानी नहीं बल्कि दक्षिण एशिया में प्रभाव, समुद्री सुरक्षा और भविष्य की शक्ति संरचना को लेकर चल रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण अध्याय भी है।

चीन ने बांग्लादेश को अपनी बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई) का महत्वपूर्ण भाग बनाया है। सड़क, पुल, रेलवे, बंदरगाह, बिजली संयंत्र, औद्योगिक पार्क और आर्थिक क्षेत्रों में अरबों डॉलर का निवेश कर उसने बांग्लादेश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदारों में से एक है। चीनी कंपनियां अवसंरचना निर्माण, ऊर्जा, दूरसंचार, डिजिटल तकनीक और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में सक्रिय हैं। चीन का उद्देश्य केवल व्यापार बढ़ाना नहीं बल्कि ऐसे दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक संबंध विकसित करना है, जो भविष्य में उसके क्षेत्रीय प्रभाव को मजबूत करें।

तारिक रहमान की चीन यात्राजून 2026 में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बीजिंग यात्रा ने स्पष्ट कर दिया कि नई सरकार चीन के साथ संबंधों को और व्यापक बनाना चाहती है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली च्यांग के साथ हुई बैठकों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा, औद्योगिक आधुनिकीकरण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आधारभूत ढांचे सहित अनेक क्षेत्रों में समझौते हुए।सबसे महत्वपूर्ण घोषणा चीन-म्यांमार-बांग्लादेश आर्थिक गलियारे (सीएमबीसी) को आगे बढ़ाने की रही। यदि यह परियोजना पूरी होती है तो दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच व्यापार और संपर्क का नया मार्ग विकसित हो सकता है। बीजिंग यात्रा के दौरान तीस्ता नदी के व्यापक प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना पर चीन की रुचि विशेष रूप से चर्चा का विषय बनी। तीस्ता जल बंटवारा वर्षों से भारत और बांग्लादेश के बीच लंबित मुद्दा है। ऐसे में यदि चीन इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तो यह केवल एक विकास परियोजना नहीं रहेगी बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों के सामरिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकती है। भारत के लिए यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सीमा से जुड़े जल संसाधन भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

बंगाल की खाड़ी: इक्कीसवीं सदी का नया रणनीतिक केंद्रबंगाल की खाड़ी आज केवल समुद्र नहीं बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री शक्ति संतुलन का केंद्र बन चुकी है। मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले व्यापारिक मार्गों का बड़ा हिस्सा बंगाल की खाड़ी से जुड़ा है। भारत के पूर्वी तट, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, पूर्वोत्तर राज्यों की संपर्क व्यवस्था तथा एक्ट ईस्ट नीति की सफलता इसी क्षेत्र पर निर्भर करती है। बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति उसे इस पूरे क्षेत्र का प्राकृतिक प्रवेश द्वार बनाती है। यही कारण है कि चीन, भारत, अमेरिका, जापान और अन्य प्रमुख शक्तियां यहां अपनी रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करने में लगी हैं।

भारत के लिए वास्तविक चुनौतीचीन की बढ़ती मौजूदगी को केवल प्रतिस्पर्धा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल भूगोल पर आधारित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच साझा इतिहास, सांस्कृतिक विरासत, भाषा, सामाजिक संबंध और 1971 के मुक्ति संग्राम की स्मृतियां आज भी विश्वास की मजबूत नींव प्रदान करती हैं।पिछले वर्षों में बिजली व्यापार, सीमा पार रेलवे, अंतर्देशीय जलमार्ग, पेट्रोलियम पाइपलाइन, बंदरगाह उपयोग, डिजिटल संपर्क और ऊर्जा सहयोग ने दोनों देशों को पहले की तुलना में कहीं अधिक निकट ला दिया है। यही भारत की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति है, जिसे कोई बाहरी देश आसानी से प्रतिस्थापित नहीं कर सकता। यदि भारत केवल चीन के निवेश का मुकाबला करने की नीति अपनाता है तो वह सीमित परिणाम ही प्राप्त कर पाएगा। लेकिन यदि वह विश्वसनीय, समयबद्ध और दीर्घकालिक विकास साझेदार की भूमिका निभाता है तो उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से मजबूत होगा। भारत को अवसंरचना परियोजनाओं को समय पर पूरा करना होगा, व्यापारिक बाधाओं को कम करना होगा, निवेश बढ़ाना होगा तथा सेमीकंडक्टर, डिजिटल तकनीक, हरित ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा जैसे भविष्य के क्षेत्रों में बांग्लादेश के साथ साझेदारी का विस्तार करना होगा।

बांग्लादेश की विकास आकांक्षाएं पूरी तरह वैध हैं और उसके लिए विदेशी निवेश आवश्यक है। लेकिन उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आर्थिक सहयोग किसी प्रकार की रणनीतिक निर्भरता में न बदल जाए। श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह, पाकिस्तान के कुछ बीआरआई परियोजनाओं तथा जाम्बिया जैसे देशों के अनुभव यह संकेत देते हैं कि बड़े विदेशी ऋण, अपारदर्शी वित्त पोषण और एक ही साझेदार पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में आर्थिक और सामरिक जोखिम पैदा कर सकती है। इसीलिए संतुलित विदेश नीति, पारदर्शी निवेश व्यवस्था और विविध अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां बांग्लादेश के दीर्घकालिक हित में होंगी।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता केवल सैन्य शक्ति से नहीं आएगी। आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय संपर्क, समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और ब्लू इकोनॉमी जैसे क्षेत्रों में भारत और बांग्लादेश की साझेदारी पूरे क्षेत्र के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकती है। यदि दोनों देश साझा हितों को प्राथमिकता देते हुए सहयोग को और गहरा करते हैं तो बंगाल की खाड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा का मैदान बनने के बजाय क्षेत्रीय समृद्धि का केंद्र बन सकती है।(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर