अयोध्या मंदिर चढ़ावा चोरी मामला : विरोधियों का नया शोर या चोरी का कुचक्र
- रमेश शर्मा
अयोध्या के विश्व प्रसिद्ध श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की चोरी के नित नए आरोप सामने आ रहे हैं। चार ट्रस्ट पदाधिकारियों के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट भी थाने में दर्ज कराई गई है। ट्रस्ट की पहल पर उत्तर प्रदेश सरकार ने जांच के लिए एसआईटी गठित कर दी है। जांच के बाद ही पता चलेगा कि वास्तव में चढ़ावे में चोरी हुई है अथवा यह श्रद्धालुओं की आस्था पर आघात करने का कोई कुचक्र है। इस कथित चढ़ावा चोरी का आरोप लगाने वालों में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के वे नेता सबसे अधिक मुखर हैं, जो मंदिर निर्माण अभियान के कभी समर्थक नहीं रहे।
सामान्यतः ग्रहणकाल कुछ घंटों का होता है। शनिदेव की महादशा अधिकतम साढ़े सात वर्ष और राहु की महादशा अठारह वर्ष तक चलती है। लेकिन अयोध्या के श्रीराम जन्मस्थान मंदिर पर जो ग्रहण लगभग नौ सौ वर्ष पहले लगा था, उसकी पूर्ण मुक्ति आज भी नहीं हो पाई है। युग बदले, सत्ताएँ बदलीं, सल्तनत और अंग्रेजी शासन भी समाप्त हो गया लेकिन अयोध्या जन्मस्थान मंदिर को निशाने पर लेने की मानसिकता नहीं बदली। पहले सतत सैन्य आक्रमण हुए, लूटपाट और विध्वंस हुआ, फिर पुनर्निर्माण का संघर्ष चला। पीढ़ियाँ बीत गईं लेकिन रामभक्तों की जिजीविषा बनी रही। समय के साथ संघर्ष की शैली अवश्य बदली, किंतु रामजन्मभूमि मुक्ति का आंदोलन कभी रुका नहीं।
सन् 1949 में इस संघर्ष का एक नया अध्याय जुड़ा। अपने जन्मस्थान पर रामलला स्वयं प्रकट हुए लेकिन तत्कालीन शासन का दृष्टिकोण प्रतिकूल रहा और मंदिर में विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो सकी। संघर्ष ने नया स्वरूप धारण किया। न्यायालयों में याचिकाएँ दायर हुईं और देशभर से श्रद्धालु कारसेवक के रूप में अयोध्या पहुँचने लगे। गोलियाँ चलीं, रामभक्तों ने बलिदान दिए, विवादित ढाँचा ध्वस्त हुआ। अंततः 9 नवम्बर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय आया। 5 फरवरी 2020 को संसद की अनुमति से भारत सरकार द्वारा स्वतंत्र श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास का गठन किया गया। 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में भूमि-पूजन हुआ और 22 जनवरी 2024 को श्रीरामलला अपने जन्मस्थान पर विराजमान हो गए।
जब यह प्रकरण न्यायालय में था, तब सभी पक्षों ने न्यायालय के निर्णय को स्वीकार करने की घोषणा की थी। रामभक्तों को आशा थी कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद स्थिति सामान्य होगी और पूरा देश अपने आराध्य के निर्विवाद दर्शन कर सकेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जिस प्रकार भगवान राम का जीवन वनवास समाप्त होने के बाद भी पूर्णतः निरापद नहीं रहा, कुछ वैसी ही स्थिति इस जन्मस्थान मंदिर की भी रही।
सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान बार-बार नए-नए मुद्दे उठाए गए, जिससे निर्णय तक पहुँचने में वर्षों लग गए। संभवतः भारत के न्यायिक इतिहास में यह पहला ऐसा प्रकरण था, जिसमें निर्णय को विलंबित करने की याचिकाएँ भी दायर की गईं। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने के बाद भी विवादों का क्रम थमा नहीं। राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया पर प्रश्न उठाए गए। ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया और चयनित नामों पर भी विवाद खड़ा करने का प्रयास हुआ। फिर भूमि-पूजन की विधि और मुख्य यजमान को लेकर प्रश्न उठाए गए। एक ओर भूमि-पूजन चल रहा था और दूसरी ओर मीडिया में मुहूर्त से लेकर मुख्य यजमान तक पर सवाल खड़े किए जा रहे थे।
विवाद का अगला मुद्दा श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर कुछ शंकराचार्यों की अनुपस्थिति तथा तिथि-मुहूर्त को लेकर बनाया गया। इसके बाद ट्रस्ट द्वारा क्रय की गई भूमि के मूल्य को लेकर आरोप लगाए गए। लेकिन इन सब विवादों का रामभक्तों की श्रद्धा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। देश-विदेश से श्रद्धालुओं का ताँता लग गया। प्रतिदिन लाखों लोग अयोध्या पहुँचने लगे। अब तक 45 करोड़ से अधिक श्रद्धालु अयोध्या जाकर श्रीरामलला के दर्शन कर चुके हैं।
लेकिन कथित चढ़ावा चोरी का यह आरोप दोहरा प्रहार प्रतीत होता है- एक ओर मंदिर प्रबंधन की साख पर और दूसरी ओर श्रद्धालुओं की भावनाओं पर। आरोप है कि मंदिर में आने वाले चढ़ावे और श्रद्धालुओं की दानराशि में करोड़ों रुपये की चोरी हुई है। चढ़ावे में प्राप्त आभूषणों में भी अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। केवल आरोप ही नहीं लगाए गए बल्कि राम मंदिर न्यास के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा, मंदिर के व्यवस्थापक गोपाल राव तथा चंपत राय के पूर्व चालक रामशंकर दयाल उर्फ टिन्नू यादव के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई है।
इन आरोपों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी संज्ञान लिया है और मंदिर प्रबंधन ने भी गंभीरता दिखाई है। मंदिर प्रशासन की पहल पर उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया। एसआईटी ने मंदिर परिसर में दानपेटियों के प्रबंधन, कर्मचारियों की आवाजाही, चढ़ावा प्रक्रिया तथा दान के अभिलेखों की लगातार तीन दिनों तक जांच की। एसआईटी अब उन लगभग पचास कर्मचारियों की संपत्ति की भी जांच कर रही है, जिन पर नोटों की चोरी का आरोप है। एसआईटी को सात दिनों में प्रारंभिक तथा पंद्रह दिनों में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है। यदि आरोप सही पाए गए तो चढ़ावे की चोरी के वास्तविक चेहरे सामने आएँगे और एसआईटी का प्रतिवेदन एफआईआर की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
आरोपों की सच्चाई तो एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट से ही स्पष्ट होगी लेकिन आरोपों की शैली और शिकायत का विवरण स्वयं कई प्रश्न खड़े करता है। सबसे पहले “चढ़ावा चोरी” शब्द। “चोरी” शब्द लंबे समय से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का प्रमुख हिस्सा रहा है। पहले “चौकीदार चोर” का नारा सामने आया, फिर “वोट चोरी”, “सीट चोरी” और “चुनाव चोरी” जैसे शब्द प्रचलन में आए। अब “चढ़ावा चोरी” शब्द सामने लाया गया है। मंदिर में चढ़ावा चोरी का आरोप भी उसी प्रकार उछाला जा रहा है, जैसे कुछ राजनीतिक दल लगातार वोट चोरी, चुनाव चोरी अथवा सीट चोरी के आरोप लगाते रहे हैं। इन दलों से जुड़े कई लोग इस कथित चढ़ावा चोरी प्रकरण में भी मुखर दिखाई दे रहे हैं।
आरोपों में दो और बातें आश्चर्यजनक हैं। पहली, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय सहित चार पदाधिकारियों को सीधे निशाने पर लिया जाना और दूसरी, कथित चोरी की अनुमानित राशि तथा उसके तरीके का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया जाना।
महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा, गोपाल राव तथा टिन्नू यादव के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट दर्ज होना कई प्रश्न उत्पन्न करता है। चंपत राय का जीवन संतस्वरूप माना जाता है। उन्होंने स्वयं को रामकार्य के लिए समर्पित कर दिया है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी तथा मंदिर निर्माण के अन्य विरोधी समूहों के निशाने पर वे लंबे समय से रहे हैं लेकिन उनकी संकल्पशीलता कभी विचलित नहीं हुई। वे करोड़ों रामभक्तों के सम्मान और श्रद्धा के केंद्र हैं। ऐसे व्यक्ति का नाम चढ़ावा चोरी के आरोपों में जोड़ना सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। आरोप-पत्र में चोरी के कथित तरीकों का विस्तार से उल्लेख किया जाना भी आश्चर्य का विषय है।
आरोपों की सच्चाई शीघ्र ही सामने आ जाएगी, क्योंकि ट्रस्ट के पदाधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक इस शिकायत को गंभीरता से ले रहे हैं। यदि चढ़ावे में चोरी हुई है तो यह साधारण चोरी नहीं मानी जा सकती। यह मंदिर के प्रति जनआस्था को आघात पहुँचाने वाला एक सुनियोजित कुचक्र भी हो सकता है।
नियमानुसार नोटों की गिनती कैमरों की निगरानी में होती है। नोट गिनने वाले कर्मचारियों के प्रवेश और निकास के समय तलाशी लिए जाने तथा बिना जेब वाले साधारण वस्त्र पहनने का भी नियम है। क्या इन नियमों में कहीं ढिलाई बरती गई? यदि हाँ, तो उसका स्रोत कहाँ है? नोट गिनने वालों में कुछ लोग ट्रस्ट के नियमित कर्मचारी नहीं बताए जाते। उनके जुड़ने का माध्यम क्या था? क्या कुछ बाहरी तत्वों ने योजनाबद्ध तरीके से प्रबंधकों का विश्वास अर्जित कर यह कथित चोरी कर मंदिर प्रबंधन की छवि धूमिल करने का प्रयास किया है?
उत्तर प्रदेश से समय-समय पर वेश बदलकर मंदिरों में प्रवेश करने की घटनाओं के समाचार आते रहे हैं। ऐसे सौ से अधिक नकली पुजारी पकड़े जा चुके हैं, जिनका सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं था। इसी माह जून में गले में रुद्राक्ष की माला धारण कर उज्जैन के महाकाल मंदिर की भस्म आरती में प्रवेश करने का प्रयास करने वाला एक कथित साधु भी पकड़ा गया। ये घटनाएँ मंदिर प्रबंधनों और समाज को अतिरिक्त सतर्कता बरतने का संदेश देती हैं।
सनातन धर्म के आस्था केंद्रों में घुसपैठ कर श्रद्धा को आघात पहुँचाने की घटनाएँ देशभर में सामने आती रही हैं। ऐसे में यह प्रश्न भी विचारणीय है कि कहीं राम मंदिर का यह कथित चढ़ावा चोरी प्रकरण भी किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा तो नहीं। यदि चोरी हुई है तो दोषियों को कठोर दंड मिलना चाहिए किंतु इन सभी प्रश्नों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना आवश्यक है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

