हर बूंद की पुकार: जल संरक्षण ही समाधान
विश्व जल दिवस (22 मार्च) पर विशेष
- योगेश कुमार गोयल
जल संकट दुनिया के लगभग सभी देशों की एक विकट समस्या बन चुका है। हालांकि पृथ्वी का करीब तीन चौथाई हिस्सा पानी से लबालब है लेकिन धरती पर मौजूद पानी के विशाल स्रोत में से महज एक-डेढ़ फीसदी पानी ही ऐसा है, जिसका उपयोग पेयजल या दैनिक क्रियाकलापों के लिए किया जाना संभव है। इसीलिए जल संरक्षण और रखरखाव को लेकर दुनियाभर में लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए प्रतिवर्ष 22 मार्च को ‘विश्व जल दिवस’ मनाया जाता है।
यह दिवस मनाए जाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 1992 में रियो द जेनेरियो में आयोजित ‘पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ (यूएनसीईडी) में की गई थी। संयुक्त राष्ट्र की उसी घोषणा के बाद पहला विश्व जल दिवस 22 मार्च 1993 को मनाया गया था। सही मायनों में यह दिन जल के महत्व को जानने, समय रहते जल संरक्षण को लेकर सचेत होने तथा पानी बचाने का संकल्प लेने का दिन है।
विश्व जल दिवस 2026 की थीम है ‘जल और लिंग’ (Water and Gender)। यह थीम लिंग और जल तक पहुंच के बीच के महत्वपूर्ण और प्रायः असमान संबंध को उजागर करती है तथा साथ ही इस बात पर भी जोर देती है कि वैश्विक जल संकट का सबसे अधिक बोझ महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है और उन्हें नेतृत्व एवं निर्णय लेने में शामिल किया जाना चाहिए। जल प्रबंधन एक लैंगिक मुद्दा है, जिसमें महिलाएं और लड़कियां अक्सर पानी इकट्ठा करने के लिए जिम्मेदार होती हैं और स्वच्छता सुविधाओं तक उनकी पहुंच सीमित होती है।
दुनियाभर में इस समय करीब दो अरब लोग ऐसे हैं, जिन्हें स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं हो रहा और साफ पेयजल उपलब्ध नहीं होने के कारण लाखों लोग बीमार होकर असमय काल का ग्रास बन जाते हैं। ‘इंटरनेशनल एटोमिक एनर्जी एजेंसी’ का कहना है कि पृथ्वी पर उपलब्ध पानी की कुल मात्रा में से मात्र तीन प्रतिशत पानी ही स्वच्छ बचा है और उसमें से भी करीब दो प्रतिशत पानी पहाड़ों व ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा है जबकि शेष एक प्रतिशत पानी का उपयोग ही पेयजल, सिंचाई, कृषि तथा उद्योगों के लिए किया जाता है। बाकी पानी खारा होने अथवा अन्य कारणों की वजह से उपयोगी अथवा जीवनदायी नहीं है।
पृथ्वी पर उपलब्ध पानी में से इस एक प्रतिशत पानी में से भी करीब 95 फीसदी पानी भूमिगत जल के रूप में पृथ्वी की निचली परतों में उपलब्ध है और बाकी पानी पृथ्वी पर सतही जल के रूप में तालाबों, झीलों, नदियों अथवा नहरों में तथा मिट्टी में नमी के रूप में उपलब्ध है। स्पष्ट है कि पानी की हमारी अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति भूमिगत जल से ही होती है लेकिन इस भूमिगत जल की मात्रा भी इतनी नहीं है कि इससे लोगों की आवश्यकताएं पूरी हो सकें। वैसे भी जनसंख्या की रफ्तार तो तेजी से बढ़ रही है किन्तु भूमिगत जलस्तर बढ़ने के बजाय घट रहा है, ऐसे में पानी की कमी का संकट तो गहराना ही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इस समय दुनियाभर में करीब तीन बिलियन लोगों के समक्ष पानी की समस्या मुंह बाये खड़ी है और विकासशील देशों में तो यह समस्या कुछ ज्यादा ही विकराल हो रही है, जहां करीब 95 फीसदी लोग इस समस्या को झेल रहे हैं।
विश्वभर में तेजी से उभरती पानी की कमी की समस्या भविष्य में खतरनाक रूप धारण कर सकती है, इसीलिए अधिकांश विशेषज्ञ आशंका जताने लगे हैं कि जिस प्रकार तेल के लिए खाड़ी युद्ध होते रहे हैं, जल संकट बरकरार रहने या और बढ़ते जाने के कारण आने वाले वर्षों में पानी के लिए भी विभिन्न देशों के बीच युद्ध लड़े जाएंगे और हो सकता है कि अगला विश्व युद्ध भी पानी के मुद्दे को लेकर ही लड़ा जाए। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान भी पूरी दुनिया को चेता चुके हैं कि उन्हें इस बात का डर है कि आगामी वर्षों में पानी की कमी गंभीर संघर्ष का कारण बन सकती है। इसीलिए यह समय की सबसे बड़ी मांग है कि दुनियाभर में लोग बेशकीमती पानी की महत्ता को समय रहते समझें और इसके संरक्षण हर स्तर पर अपना योगदान दें।
दरअसल पानी का अंधाधुध दोहन करने के साथ-साथ हमने नदी, तालाबों, झरनों इत्यादि अपने पारम्परिक जलस्रोतों को भी दूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कहा जाता रहा है कि भारत ऐसा देश है, जिसकी गोद में कभी हजारों नदियां खेलती थी लेकिन आज इन हजारों नदियों में से सैकड़ों ही शेष बची हैं और वे भी अच्छी हालत में नहीं हैं। हर गांव-मौहल्ले में कुएं और तालाब हुआ करते थे, जो अब पूरी तरह गायब हो गए हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि पृथ्वी की सतह पर उपयोग में आने लायक पानी की मात्रा वैसे ही बहुत कम है और यदि भूमिगत जल स्तर भी निरन्तर गिर रहा है तो हमारी पानी की आवश्यकताएं कैसे पूरी होंगी? इसके लिए हमें वर्षा के पानी पर आश्रित रहना पड़ता है किन्तु वर्षा के पानी का भी सही तरीके से संग्रहण नहीं हो पाने के कारण ही इसका भी समुचित उपयोग नहीं हो पाता। वर्षा के पानी का करीब 15 फीसद वाष्प के रूप में उड़ जाता है और करीब 40 फीसद पानी नदियों में बह जाता है जबकि शेष पानी जमीन द्वारा सोख लिया जाता है, जिससे थोड़ा बहुत भूमिगत जल स्तर बढ़ता है और मिट्टी में नमी की मात्रा में कुछ बढ़ोतरी होती है। इसलिए यदि हम वर्षा के पानी का संरक्षण किए जाने की ओर खास ध्यान दें तो व्यर्थ बहकर नदियों में जाने वाले पानी का संरक्षण कर उससे पानी की कमी की पूर्ति आसानी से की जा सकती है और इस तरह जल संकट से काफी हद तक निपटा जा सकता है।
पानी को मानव की मूलभूत आवश्यकता, अमूल्य राष्ट्रीय धरोहर व अति विशिष्ट प्राकृतिक संसाधन मानते हुए 1987 में जल संसाधनों के नियोजन एवं विकास के लिए ‘राष्ट्रीय जल नीति’ घोषित की गई थी। इसके क्रियान्वयन के मामले में और तेजी लाने की जरूरत है। राष्ट्रीय जल नीति की घोषणा करते समय कहा गया था कि देश में उपलब्ध जल संसाधनों के विकास, संरक्षण, समुचित उपयोग एवं प्रबंधन के लिए सभी आवश्यक उपाय किए जाएंगे और जरूरी कदम उठाए जाएंगे। देश में जल संकट के विकराल रूप धारण करते जाने के पीछे जनसंख्या विस्फोट के साथ-साथ पानी की उपलब्धता में हो रही कमी तो जिम्मेदार है ही, इसके अलावा पानी का दुरूपयोग, कुप्रबंधन एवं दूषित होता पेयजल आदि और भी कई ऐसी वजहें हैं, जो समस्या को विकराल बना रही हैं।
हमें यह भली-भांति समझना होगा कि पानी प्रकृति की अमूल्य देन है और हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते। विकराल होते जल संकट का समाधान तभी संभव है, जब आमजन में इस दिशा में जागरूकता पैदा करने के अपेक्षित प्रयास किए जाएं तथा सरकारी प्रयासों के साथ-साथ हर नागरिक भी पानी की एक-एक बूंद बचाने के लिए अपने-अपने स्तर पर प्रयास करे।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैंं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

