(विश्व खाद्य दिवस पर विशेष) जब प्यासे हों खेत और खाली हों थालियां तो कैसे संवरेगा भविष्य?
- योगेश कुमार गोयल
दुनिया की आबादी तीव्र गति से बढ़ने के साथ-साथ विश्व में भूख की समस्या भी बढ़ती जा रही है। कई ऐसे राष्ट्र हैं, जो इस समस्या से जूझ रहे हैं। विश्वभर में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्हें पेट भरने को दो समय का भोजन तक नसीब नहीं होता। बहुत सारे लोग तो ऐसे भी हैं, जिन्हें जिंदा रहने के लिए भी पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा। पोषित और पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाने के कारण दुनिया की बड़ी आबादी कुपोषण की शिकार हो रही है। भोजन को एक बुनियादी और मौलिक मानवाधिकार माना गया है लेकिन पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी विड़म्बना है कि खाने की कमी और कुपोषण के ही कारण प्रतिवर्ष लाखों लोग जान गंवा देते हैं। भोजन, हवा और पानी के बाद तीसरी सबसे बुनियादी मानवीय जरूरत हर किसी को पर्याप्त भोजन का अधिकार ही है। चिंताजनक स्थिति है कि दुनियाभर के किसान वैश्विक आबादी से ज्यादा लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन पैदा करते हैं किन्तु फिर भी भूख बनी रहती है।
वैश्विक भुखमरी को खत्म करने और सभी लोगों को पोषणयुक्त आहार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ही प्रतिवर्ष 16 अक्तूबर को ‘विश्व खाद्य दिवस’ मनाया जाता है। दुनिया के करीब 150 सदस्य देश मिलकर यह दिवस मनाते हैं और संयुक्त राष्ट्र के कैलेंडर में सबसे ज्यादा मनाया जाने वाला दिवस भी यही है। यह दिवस मनाने का प्रमुख उद्देश्य वैश्विक भुखमरी से निपटना और पूरी दुनिया से उसे जड़ से खत्म करना है ताकि दुनिया का कोई भी इंसान भूखा और कुपोषित न रहे। विश्व खाद्य दिवस 2026 का विषय है ‘आज नवाचार करें। कल का पोषण करें।‘
खाद्य एवं कृषि संगठन (एएफओ) के अनुसार तीव्र जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण, आर्थिक विकास और जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा पिछले दशकों में मीठे पानी के संसाधनों में भी प्रति व्यक्ति 20 प्रतिशत की गिरावट आई है और दशकों के खराब उपयोग व प्रबंधन, भूजल के अत्यधिक दोहन, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से पानी की उपलब्धता तथा गुणवत्ता तेजी से बिगड़ रही है। मौजूदा समय में करीब 2.4 अरब लोग जल संकट वाले देशों में रहते हैं और इस अमूल्य संसाधन के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है क्योंकि पानी की कमी संघर्ष का निरंतर बढ़ता कारण बनती जा रही है। पृथ्वी पर जल एक सीमित और असीम मूल्यवान ऐसा प्राकृतिक संसाधन है, जिसके बिना धरती पर भोजन और जीवन असंभव है। यही नहीं, विश्वभर में 60 करोड़ से भी ज्यादा लोग अपनी आजीविका के लिए जलीय खाद्य प्रणालियों पर ही निर्भर हैं, जिनमें छोटे पैमाने के मछुआरे, मछली किसान, मछली प्रोसेसर और उनके आश्रित शामिल हैं, जो तटीय और अंतर्देशीय समुदायों की रीढ़ माने जाते हैं, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन करते हैं और विश्वभर में संस्कृतियों को प्रभावित करते हैं।
दुनिया से भुखमरी को मिटाने के प्रयासों में जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय तनाव, आर्थिक समस्याएं इत्यादि सबसे बड़ी बाधा बन रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक बार-बार होने वाले मौसम के झटकों, संघर्षों, आर्थिक मंदी, असमानता और महामारी के कारण विश्व में करीब 733 मिलियन लोग भूख का सामना कर रहे हैं, जिसका सर्वाधिक असर ग़रीब और कमज़ोर तबके पर पड़ता है, जिनमें से कई कृषि परिवार हैं। कोरोना महामारी के दौर के बाद लंबे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन और इजरायल-फिलस्तीन के भीषण युद्ध जैसी विकट परिस्थितियां भी भूख की समस्या को कम करने के बजाय और विकराल बनाने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। इसीलिए इस समस्या को कम करने के लिए दुनियाभर में तेज गति से गंभीर प्रयास किए जाने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भूख और कुपोषण लंबे समय तक चलने वाले संकटों से और बढ़ जाते हैं, जो संघर्ष, चरम मौसम की घटनाओं और आर्थिक झटकों के संयोजन से प्रेरित होते हैं।
आज दुनिया में करोड़ों लोग भूख से पीड़ित हैं और स्वस्थ आहार का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। एफएओ के मुताबिक विश्व में 2.8 बिलियन से भी ज्यादा लोग स्वस्थ आहार का खर्च उठाने में असमर्थ हैं और अस्वास्थ्यकर आहार ही सभी प्रकार के कुपोषण का प्रमुख कारण है। कमज़ोर लोगों को प्रायः मुख्य खाद्य पदार्थों या कम महंगे खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहने के लिए विवश होना पड़ता है, जो अस्वास्थ्यकर हो सकते हैं जबकि अन्य लोग ताज़े या विविध खाद्य पदार्थों की अनुपलब्धता से पीड़ित हैं, उन्हें स्वस्थ आहार चुनने के लिए जरूरी जानकारी की कमी है या फिर वे केवल सुविधा के लिए विकल्प चुनते हैं। दुनियाभर में प्रतिवर्ष हर 10 में से एक व्यक्ति दूषित भोजन के कारण बीमार हो जाता है और हर साल 4.2 लाख लोगों की मौत का कारण दूषित भोजन ही है, जिनमें करीब सवा लाख बच्चे भी होते हैं। संयुक्त राष्ट्र के ‘खाद्य एवं कृषि संगठन’ के अनुसार 2021 में दुनियाभर में 5 लाख लोगों की मौत भूख से ही हुई थी। हालांकि, ऐसा नहीं है कि पृथ्वी पर इतना अनाज पैदा नहीं हो रहा, जिससे दुनिया के हर व्यक्ति को पर्याप्त भोजन मिल सके बल्कि सबसे बड़ी समस्या पोषणयुक्त आहार तक सभी की पहुंच और उपलब्धता है।
एफएओ का कहना है कि वर्तमान में मत्स्य पालन में हम करीब तीन हजार प्रजातियों का दोहन करते हैं जबकि इनमें से केवल 650 से कुछ अधिक प्रजातियों की ही खेती करते हैं। एफएओ के मुताबिक इन जलीय पारिस्थितिक तंत्रों और उनके द्वारा समर्थित प्रजातियों का संरक्षण और सुरक्षा करना केवल एक जिम्मेदारी ही नहीं है बल्कि पृथ्वी और इसके निवासियों की भलाई के लिए एक बड़ी आवश्यकता भी है। जलीय खाद्य पदार्थ भी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और अपनी विविधता से जलीय खाद्य प्रणाली मानव के लिए पोषण और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए एक अद्वितीय और महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत बनती है। चिंता का विषय है कि जीवनयापन के लिए आंशिक रूप से ही सही, जलीय खाद्य प्रणालियों पर निर्भर 60 करोड़ लोग प्रदूषण, पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण, अस्थिर प्रथाओं और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से पीड़ित हैं। ऐसे में न केवल जलीय खाद्य प्रणालियों की रक्षा करने की सख्त आवश्यकता है बल्कि लोगों को अधिक भोजन तथा अन्य बुनियादी कृषि उत्पाद पैदा करने के लिए कम पानी का उपयोग करने की आवश्यकता है।
बहरहाल, वैश्विक जल एवं जलीय खाद्य प्रणालियों की रक्षा करते हुए पूरी दुनिया में मौजूदा जल चुनौतियों से निपटने के लिए अब लोगों द्वारा कृषि-खाद्य प्रणालियों में जल के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करने की बड़ी जरूरत महसूस की जाने लगी है। सुरक्षित जल और खाद्य सुरक्षा प्राप्त करना सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है कि दुनियाभर के देश पारंपरिक ज्ञान की शक्ति का पूर्ण उपयोग करते हुए विज्ञान और नवाचार के माध्यम से जल संसाधनों की कमी और जल सुरक्षा मुद्दों के नए समाधान ढूंढ़ने के गंभीर प्रयास करें। मौजूदा जल चुनौतियों से निपटने के लिए हमें कृषि खाद्य प्रणालियों में प्रभावी जल उपयोग सुनिश्चित करने और अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग के सुरक्षित तरीके खोजने के साथ-साथ जल और जलीय खाद्य प्रणालियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन और बढ़ती मांग के मद्देनजर सभी के लिए किफायती पौष्टिक भोजन प्रदान करने के लिए दुनिया के समक्ष मौजूद खाद्य चुनौतियों का मिलकर समाधान करना होगा।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)--------------------
हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी

