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अमेरिका-ईरान युद्ध से महंगाई के कारण आमजन प्रभावित

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अमेरिका-ईरान युद्ध से महंगाई के कारण आमजन प्रभावित


डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

भले 1970 के तेल संकट जैसे हालात होने की आशंका न हो या 2008 जैसी वित्तीय मंदी के हालात भी न हो लेकिन एक बात साफ है कि अमेरिका-ईरान के बीच करीब तीन माह से चल रहे युद्ध के दुष्प्रभाव गहराने लगे हैं। चाहे एशिया के हों या यूरोपीय देश, सभी केवल वैश्विक तनाव ही नहीं अपितु ईंधन आपूर्ति प्रभावित होने से बढ़ते दामों को रोकने में विफल रहे हैं। पिछले दस-पन्द्रह दिनों में ही हमारे देश में पेट्रोल-एलपीजी-सीएनजी- पीएनजी के दामों में एक बार नहीं अपितु तीन बार बढ़ोतरी हो चुकी है। हालांकि वर्तमान हालात में सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। विपक्ष चाहे लाख आरोप लगाये पर अंतरराष्ट्रीय हालात से आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आमजन से आग्रह को भी इसी संदर्भ में सकारात्मकता से लिया जाना चाहिए।

अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है। ईधन संकट का बड़ा कारण अमेरिका-ईरान युद्ध न होकर इस युद्ध के कारण हार्मुज वैश्विक संकट बन गया है। हार्मुज के रास्ते से ही कच्चे तेल की आपूर्ति होती है और यहां तनाव के चलते हार्मुज जनडमरुमध्य रास्ते को अवरुद्ध कर दिया गया है। इससे आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है। यह तो वैकल्पिक उर्जा के रुप में देश में सोलर, विण्ड एनर्जी के क्षेत्र में पिछले सालों में योजनाबद्ध तरीके से तेजी से बेहतर काम हुआ है और इसी का परिणाम है कि आज प्रधानमंत्री इलेक्ट्रोनिक वाहनों के उपयोग या सोलर एनर्जी के उपयोग पर खुले तौर पर आग्रह करने की स्थिति में है। नवीकरणीय उर्जा के क्षेत्र में देश में तेजी से काम हुआ है और हो रहा है जो एक हद तक संकट को कम करने में सहायक बन रहा है।

आज की दुनिया आइसोलेट दुनिया नहीं है। देशों की एक-दूसरे पर निर्भरता बढ़ी है। कहीं से ईंधन के लिए तो कहीं से खाद्यान्न, कहीं दवा, कहीं अन्य किसी वस्तु के लिए निर्भरता बढ़ी है। युद्ध के चलते इंटरनेशनल लॉजिस्टिक सेवाएं प्रभावित हुई है। जहां तक देश की ही बात की जाए तो पेट्रोल, डीजल, एलपीजी आदि की कीमत में बढ़ोतरी का व्यापक प्रभाव पड़ने लगा है। सीधी-सी बात है जब आवागमन महंगा होगा चाहे वह आम आदमी, सार्वजनिक क्षेत्र या लॉजिस्टिक का हो तो उसका सीधा वस्तुओं और सेवाओं पर पड़ेगा ही। यही कारण है ईंधन यानी तेल के भावों में बढ़ोतरी के साथ वस्तुओं और सेवाओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। इसके साथ ही आयात पर निर्भर वस्तुओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं।

जहां तक तेल का प्रश्न है, देश में खाद्य तेल ओैर अखाद्य तेल दोनों प्रभावित हो रहे हैं। खाद्य तेलों में भी आयात पर निर्भरता अधिक है। लाख प्रयासों के बावजूद तिलहन मिशन से तिलहनों का उत्पादन तो बढ़ा है पर अभी विदेशी निर्भरता बनी हुई ही है। इसी तरह अन्य वस्तुओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। जहां तक सेवा क्षेत्र का प्रश्न है, स्वीगी-जोमेटो आदि सेवा प्रदाताओं ने पिछले दिनों अपने दामों में 16 फीसदी से भी अधिक की बढ़ोतरी कर दी है। मोबाइल सेवा प्रदाताओं ने प्लानों को रिवाइज किया है तो उबेर-ओला जैसे सेवा प्रदाताओं ने किराया बढ़ा दिया है। साफ है कि लॉजिस्टिक लागत बढ़ेगी तो उसका असर सभी वस्तुओं में देखने को मिलेगा। भारत सरकार वेनेजुएला से वैकल्पिक तरीके से कच्चे तेल लाने का प्रयास कर रही है तो अन्य विकल्प भी खोजे जा रहे हैं। लेकिन कच्चे तेल की आपूर्ति जब तक सामान्य नहीं हो जाती तब तक संकट पूरी तरह से समाप्त होने की कल्पना नहीं की जा सकती।

इन वैश्विक हालातों के पीछे अमेरिका-ईरान की हठधर्मिता ही है। अमेरिका-इजराइल ने ईरान से लड़ाई शुरु करते समय रूस-यूक्रेन युद्ध के हालातों से सबक नहीं लिया। रूस के सामने यूक्रेन जैसा देश होने के बावजूद आज तीन साल से भी अधिक समय होने के बावजूद निर्णायक स्तर पर नहीं पहुंचा है। पर अमेरिका ने यह सोचा था कि दो-तीन दिन में ही ईरान को घुटने टिकवा देंगे और यही अमेरिका की नासमझी रही। मानो या न मानो पर वास्तविकता यह है कि आज अमेरिका के सामने अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने का संकट आ गया है और यही कारण है कि अंदरखाने अमेरिका और ट्रंप किसी भी तरह से सीजफायर के लिए प्रयासरत है।

इसमें दो राय नहीं कि युद्ध में नुकसान अमेरिका को अधिक हो रहा है। ईरान तो अपने घर से लड़ रहा है और उसके निशाने पर आसपास के देश हैं। ऐसे में स्टेक अमेरिका-इजराइल का ही हो जाता है। इसके अलावा एक बात और समझनी होगी कि ट्रंप ने राष्ट्रपति के तौर पर अपने दूसरे कार्यकाल में आये दिन तुगलकी फरमान जारी कर दुश्मन ही दुश्मन बनाए हैं। दूसरी ओर ट्रंप ने अमेरिका के ही अधिकांश लोगों का भरोसा खो दिया है। ऐसे में सम्मानजनक सीजफायर ही अमेरिका के लिए इस संकट से निकलने का रास्ता रह गया है और इसके लिए ही अंदरखाने प्रयास जारी है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश