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अमेरिका-ईरान युद्धः ट्रंप के लिए निगलते बने न उगलते

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अमेरिका-ईरान युद्धः ट्रंप के लिए निगलते बने न उगलते


-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

भारत के खिलाफ हालिया टिप्पणी और उससे पलटने से यह साफ हो गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी सनक या आवेग में बिना सोचे-समझे टिप्पणी या निर्णय करते हैं और उससे पलटने में देरी भी नहीं करते। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रूथ सोशल पर रेडियो होस्ट की टिप्पणी भारत और चीन को नरक का द्वार को रीपोस्ट करके विवादों में आ गए और भारत के कड़े विरोध और अमेरिका में ही पक्ष-प्रतिपक्ष की प्रतिक्रियाओं एवं नस्लीय टिप्पणी देखते हुए भारत को महान और दोस्त देश बताने में भी देरी नहीं की। ट्रंप ने हाल के महीनों में यह सिद्ध कर दिया है कि इतिहास में उनकी तरह का आवेश में निर्णय लेने, फिर उसके परिणामों से समूचे विश्व को संकट में डालने वाला दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा। हिटलर या मुसोलिनी जैसे तानाशाहों के उदाहरण दिए जाते हैं पर ट्रंप इन सबसे अलग हैं। दुनिया के देशों को डराने-धमकाने और अपने ही निर्णयों से पलटने वाला उनके जैसा राष्ट्राध्यक्ष ढूंढने से भी नहीं मिलेगा।

एक बात ट्रंप को समझ लेनी चाहिए कि केवल अमेरिका फर्स्ट के नारे से दुनिया नहीं चल सकती। यही कारण है कि आज दुनिया के करीब-करीब सभी देश ट्रंप से गले तक भर आये हैं। अमेरिकी-ईरान युद्ध के चलते आज दुनिया के सामने संकट का जो दौर आया है उससे अमेरिका भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। एक तरफ ईंधन का संकट आ रहा है तो तनाव के चलते व्यापार प्रभावित हो रहा है, आने वाले समय में खाद्यानों सहित दवा व अन्य आवश्यक वस्तुओं की कमी से भी दुनिया के देशों को दो-चार होना पड़ जाएगा। ट्रंप की रणनीति समझ से परे इस मायने में भी हो जाती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक साथ अनके मोर्चे खोल लिए हैं और इजरायल की बात छोड़ भी दी जाए तो दुनिया का कोई देश आज ट्रंप की नीतियों, टिप्पणियों और गीदड़ धमकियों का पक्षधर नहीं हो सकता।

दरअसल, आज ट्रंप ने समूची दुनिया को तनाव के दौर में धकेल दिया है। करीब सवा साल के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और दुनिया के देशों में अपनी स्वीकार्यता के सबसे निचले पायदान पर पहुंच चुके हैं। ईरान से टकराव के बाद केवल एक माह में ही स्वीकार्यता में दस प्रतिशत की गिरावट स्वयं सोचने को मजबूर कर देना चाहिए। अप्रैल की ताजा रिपोर्टस की बात की जाए तो न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार 39 प्रतिशत, रॉयटर के अनुसार 36 प्रतिशत और एपी के अनुसार 33 प्रतिशत वैश्विक स्वीकार्यता रह गई है। यदि अमेरिका की बात करें तो आर्थिक नीतियों के चलते असंतोष मुखर होता जा रहा है। अधिकांश अमेरिकी, ईरान संघर्ष को लेकर भी ट्रंप की निर्णय से संतुष्ट नहीं हैं। ट्रंप की नीतियां अमेरिका सहित दुनिया के देशों में अस्थिरता और तनाव पैदा करने वाली हैं।

ईरान को तबाह करने की घोषणा, ईरान के विद्युत एवं ऑयल संयत्रों को नष्ट करने की धमकी, हार्मुज जलडमरुमध्य को लेकर धमकी, फिर सीजफायर की बात करना और ईरान द्वारा समझौते की टेबल पर सकारात्मकता नहीं होने की स्थिति में अमेरिका की लगातार हेठी हो रही है। देखा जाए तो रुस-यूक्रेन युद्ध को हवा देने और फिर जेलेंस्की को धमकाने व जेलेंस्की की अमेरिका में ही ठेंगा दिखाना, अमेरिका के लिए कम शर्मनाक नहीं रहा। नाटों से हटने की धमकी, वेनेजुएला पर आक्रमण और वहां के राष्ट्राध्यक्ष के साथ व्यवहार, चीन के साथ व्यापार युद्ध, भारत को बार-बार टैरिफ गीदड़ भभकी, कनाडा का अमेरिका का राज्य घोषित करने, ग्रीनलैण्ड हथियाने का प्रयास, गाजा पट्टी, क्यूबा आदि से संबंधित ट्रांप की सभी भभकियां अबतक बेमानी साबित हुई है। उल्टे इन सबसे अमेरिका और ट्रंप की विश्वसनीयता में ही कमी आई है।

सवाल यह उठने लगा है कि अमेरिकी गीदड़ भभकियों का कुछ असर भी रहेगा या नहीं। क्योंकि आज छोटे-से-छोटे देश को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। आज यदि जंग छेड़ते हैं तो दो-चार दिन में फैसला हो जाएगा, यह सोचना गलत है। इसका उदाहरण रुस-यूक्रेन तो है ही अब ताजा उदाहरण अमेरिका-इजरायल और ईरान संघर्ष को देखा जा सकता है। लंबी जंग लड़ने की स्थिति में दुनिया का कोई देश नहीं है। आज ईरान से संघर्ष संघर्ष में अमेरिका को अधिक हानि उठानी पड़ रही है। ट्रंप ऐन-केन प्रकारेण जंग रुकवाने व सीजफायर के प्रयास कर रहे हैं। पर ट्रंप को यह सोच लेना चाहिए कि डर या धमकियों से नतीजा नहीं निकलने वाला है। दूसरा, ट्रंप के ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए उनकी कही गई किसी भी बात पर लंबे समय तक विश्वास नहीं किया जा सकता। इसलिए ट्रंप को पहले विश्वसनीयता बनाने के ठोस प्रयास करने होंगे। दुनिया के देशों को विश्वास में लेना होगा। नहीं तो दुनिया के हालात दिन-प्रतिदिन गंभीर होने हैं और इसके लिए ट्रंप को इतिहास माफ नहीं करने वाला।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश