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कश्मीर पर अमेरिका का बदलता रुख

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कश्मीर पर अमेरिका का बदलता रुख


प्रमोद भार्गव

भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने अपने पहले जम्मू-कश्मीर दौरे में यहां के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के बाद कश्मीर को भारत का अभिन्न और अहम भू-भाग बताया। सुरक्षा के लिहाज से सराहना की। अमेरिकी राजदूत का यह बयान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के स्तर पर चौंकाने वाला होने के साथ अमेरिका-भारत के संबंधों में बदलाव का उल्लेखनीय संकेत है। लंबे समय से कश्मीर मुद्दे पर अमेरिका की स्थिति भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय विवाद के रूप में देखी जाती रही है। जिसे अक्सर ‘भारतीय प्रशासन वाले कश्मीर‘ जैसे शब्दों से संबोधित किया जाता रहा है। ऐसे में कश्मीर की धरती पर एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक का यह दो टूक बयान इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर कश्मीर को लेकर भारत की अखंडता एवं संप्रभुता की पुष्टि के रूप में देखा जा रहा है। इस बयान से पाकिस्तान को तो झटका लगा ही है, चीन भी सकते में है।

अमेरिका ने वर्ष 2018 से ही जम्मू-कश्मीर के तात्कालिक पूर्वी लद्दाख और लेह को छोड़कर अपने नागरिकों को यात्रा नहीं करने की चेतावनी दी हुई है। इस यात्रा चेतावनी को चौथी श्रेणी में रखा हुआ है। गोर ने फिलहाल इस यात्रा चेतावनी को कम करने का कोई संकेत नहीं दिया है लेकिन उम्मीद है कि इस बिंदु पर अमेरिका यात्रा में छूट दे सकता है। हालांकि उस समय अनुच्छेद-370 बहाल थी और घाटी में आतंकी संकट की छाया छाई रहती थी। अगस्त 2019 में अनुच्छेद-370 और 35-ए को भारत सरकार ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते विलोपित कर दिया, उसी के बाद से कश्मीर में सुरक्षा संबंधी हालातों में निरंतर सुधार हो रहे हैं और पत्थरबाजी व अन्य आतंकी घटनाओं में कमी आई है। पहलगाम में आतंकी हमले के एक दिन बाद ही अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने उक्त चेतावनी की फिर से पुष्टि करते हुए नई एडवाइजरी जारी कर दी थी। जो अभी भी लागू है।

चूंकि गोर दक्षिण एशिया व मध्य एशियाई मामलों के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष प्रतिनिधि हैं इसलिए उनकी कश्मीर यात्रा और दो टूक बयान की अपनी अहमियत है। खासतौर पर तब जब पाकिस्तान के संबंध भी अमेरिका के साथ फिलहाल मधुर बने हुए हैं और अमेरिका ईरान से लड़े जा रहे युद्ध में पाकिस्तान को अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रहा है। इस बयान से उमर अब्दुल्ला को भी बड़ा झटका लगा है क्योंकि वे कुछ दिनों से अनुच्छेद-370 की पुर्नबहाली की मांग कर रहे हैं। उन्होंने जून 2026 में ‘द हिंदू हडल‘ (अंग्रेजी समाचार पत्र) सत्र के दौरान कहा था कि 2019 में 370 को हटाना भारत सरकार की सबसे बड़ी नीतिगत भूल थी। उन्होंने जम्मू-कशमीर के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा और विशेष संवैधानिक अधिकारों की बहाली की भी मांग की थी।

पाकिस्तान धर्म की घुट्टी पिलाकर 35 साल से भारत पर आतंकी हमले करता रहा है। जबकि उसे सबसे मुकम्मल जवाब ऑपरेशन सिंदूर के जरिए दिया गया था लेकिन वह बाज नहीं आ रहा है। गैर-कश्मीरियों और हिंदुओं की हत्या के लिए उसकी क्रूरता समाप्त नहीं हो रही है। जाहिर है, पाकिस्तान भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर के बदले को भूल गया है। उसे एक बार फिर करारा जबाव देना होगा। दरअसल, इस समय पाकिस्तान अपने कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में चल रहे आजादी के आंदोलन से भी जूझ रहा है। वहां भी उसने निर्ममता बरतते हुए सैंकड़ों प्रदर्शनकारियों को भूनने का काम किया है। पाक की ये हरकतें इसलिए भी बरकरार हैं क्योंकि ईरान हमले में उलझा अमेरिका उसकी पीठ थपथपाने में लगा है। ऐसे में भारत को अनेक कूटनीतिक कदम उठाकर पाकिस्तान को विवश करना पड़ रहा है। अब जाकर उसे कश्मीर मुद्दे पर अमेरिका का दो टूक जवाब मिला है।

अनुच्छेद-370 हटने के बाद भी हालातों में सुधार नहीं हो पा रहा है तो इसका एक बड़ा कारण मजहबी कट्टरता पर चोट नहीं कर पाना है। साफ है कि यह समस्या अब राजनैतिक व संवैधानिक नहीं रह गई है बल्कि धार्मिक चरमपंथ के रूप में सामने आ रही है। इस हिंसक उन्माद का सोच पाकिस्तान से निर्यात आतंकवाद तो है ही, घाटी में कुकुरमुत्तों की तरह मस्जिदों और मदरसों में फैला, वह शिक्षा का तंत्र भी है, जो आतंक की फसल बोने और उगाने का काम करता है। यही वजह है कि जितने भी इस्लामिक देश हैं, उनमें न तो अल्पसंख्यकों का जनसंख्यात्मक घनत्व बढ़ रहा है और न ही उन्हें नागरिक समानता के अधिकार मिल रहे हैं। कश्मीर में भी जिहादी चाहते हैं कि गैर-मुस्लिम या तो इस्लाम स्वीकार करें या फिर घाटी छोड़ जाएं।

इस दोषपूर्ण मंशा को संविधान निर्माण के समय ही डॉ. भीमराव अंबेडकर ने समझ लिया था। शेख अब्दुल्ला ने जब जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने की मांग की तो अंबेडकर ने सख्त लहजे में कहा था कि ‘आप चाहते हो कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, कश्मीरियों की आर्थिक सुरक्षा करे, कश्मीरियों को संपूर्ण भारत में समानता का अधिकार मिले लेकिन भारत और अन्य भारतीयों को आप कश्मीर में कोई अधिकार देना नहीं चाहते? मैं देश का कानून मंत्री हूं और मैं अपने देश के साथ कोई अन्याय या विश्वासघात किसी भी हालत में नहीं कर सकता हूं।‘

नेहरू के अनावश्यक दखल से कश्मीर को विशेष दर्जा मिल गया। इस भिन्नता का संकट देश बंटवारे से लेकर अबतक भुगत रहा है। यही वजह है कि इस बंटवारे के बाद पाकिस्तान से जो हिंदू, बौद्ध, सिख और दलित शरणार्थी के रूप में जम्मू-कश्मीर में ही ठहर गए थे, उन्हें मौलिक अधिकार अनुच्छेद-370 हटने के बाद मिल पाए हैं। इनकी संख्या करीब 70-80 लाख है, ये 56 शरणार्थी शिविरों में सभी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से महरूम रहते हुए बद से बदतर जिंदगी का अभिशाप अनुच्छेद-370 हटने से पहले तक भोगते रहे हैं।

पहलगाम हमले के बाद जितने भी आतंकी हमले कश्मीर में हुए हैं, उनमें से ज्यादातर की जिम्मेदारी भी टीआरएफ ने ली थी। यह लश्कर-ए-तैयबा का ही एक मुखौटा संगठन है। यह लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूहों की आतंकी हरकतों को अंजाम देता है। भारतीय सेना ने कोटली अब्बास में जिस आतंकी शिविरों को तबाह किया किया था, इसमें 1500 आतंकियों को प्रशिक्षण दिया गया था। मुरीदके में जिस मरकज तैयबा को ध्वस्त किया गया था, यहां लश्कर का मुख्यालय माना जाता है। यहीं से मुंबई हमले का प्रमुख आतंकी अजमल कसाब ने प्रशिक्षण लिया था। इस जवाबी कार्रवाई के बाद भारत की कूटनीति अत्यंत सफल दिखाई दी थी क्योंकि अमेरिका, रूस और जापान ने भारत का तत्काल खुलकर समर्थन किया था। यह समर्थन मोदी ने वैश्विक आतंकवाद से लड़ने के लिए जो मुहिम चलाई हुई है, उसका परिणाम थी।

इसमें दो राय नहीं कि सीमापार स्थित ठिकानों से आतंकी गतिविधियां संचालित करने वाले संगठनों के खिलाफ सेना और सुरक्षाबलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। कश्मीर में आतंकी बने रहने का एक कारण यह भी है कि आतंकियों को संरक्षण आसानी से मिल जाता है। यही कारण है कि रुक-रुककर आतंकी बिना किसी शोरशराबे के आबादी के बीच घुसपैठ कर हिंदुओं के विरुद्ध लक्षित हिंसा को परिणाम में बदलने में सफल हो जाते है। ऐसे हमलों में निर्दोष लोग ही मारे जाते हैं। अब अमेरिकी राजनयिक के कथन के बाद संभव है आतंकी हमलों पर अंकुश लगे।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश