जब शहर तपते हैं
- डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत आज तीव्र शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन- दो ऐसी प्रक्रियाओं के संगम पर खड़ा है जो देश के सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक ढांचे को गहराई से प्रभावित कर रही हैं। एक ओर शहर विकास, रोजगार और नवाचार के केंद्र हैं तो दूसरी ओर वे बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, शहरी बाढ़, जल संकट, वायु प्रदूषण और चरम मौसमी घटनाओं के सबसे बड़े शिकार भी बनते जा रहे हैं। सामान्यतः जलवायु परिवर्तन को पर्यावरणीय समस्या माना जाता है किंतु भारतीय शहरों का अनुभव बताता है कि यह केवल प्रकृति का संकट नहीं है; यह शहरी शासन, सामाजिक न्याय और विकास मॉडल की सीमाओं को उजागर करने वाला बहुआयामी संकट है।
इस संकट का सबसे अधिक दुष्प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है जो शहरों की अर्थव्यवस्था और जीवन-प्रणाली को प्रतिदिन संचालित करते हैं लेकिन नीतियों और योजनाओं में सबसे पीछे रह जाते हैं। इनमें अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक, प्रवासी मजदूर, सड़क विक्रेता, निर्माण श्रमिक, घरेलू कामगार, कचरा बीनने वाले और स्वच्छता कार्यकर्ता प्रमुख हैं। विडंबना यह है कि जिन लोगों के श्रम से शहर चलते हैं, वही लोग जलवायु परिवर्तन के सबसे असुरक्षित शिकार बनते हैं।
भारत की लगभग 35 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है और आने वाले दशकों में यह अनुपात तेजी से बढ़ेगा। शहरों का विस्तार अक्सर बिना समुचित योजना के हुआ है। हरित क्षेत्रों का सिकुड़ना, जल निकायों का अतिक्रमण, अनियंत्रित कंक्रीटीकरण और कमजोर जल निकासी व्यवस्था ने शहरों की प्राकृतिक जलवायु सहनशीलता को कम कर दिया है। परिणामस्वरूप थोड़ी-सी अधिक वर्षा भी व्यापक जलभराव और बाढ़ का कारण बन जाती है, जबकि लंबे समय तक वर्षा न होने पर गंभीर जल संकट उत्पन्न हो जाता है। बढ़ते तापमान ने शहरी हीट आइलैंड प्रभाव को और तीव्र बना दिया है, जिससे शहर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री अधिक गर्म हो जाते हैं।
यह स्थिति केवल प्राकृतिक कारणों का परिणाम नहीं है। यह शहरी शासन की कमियों को भी दर्शाती है। अनेक नगर निकायों के पास न तो पर्याप्त वित्तीय संसाधन हैं और न ही जलवायु परिवर्तन के अनुरूप दीर्घकालिक योजना बनाने की क्षमता। विभिन्न विभागों के बीच समन्वय का अभाव, डेटा आधारित निर्णयों की कमी और अल्पकालिक विकास परियोजनाओं पर अत्यधिक निर्भरता ने समस्या को और जटिल बना दिया है।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से वंचित वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन को अब क्लाइमेट जस्टिस अर्थात जलवायु न्याय के दृष्टिकोण से भी देखा जा रहा है। जिन लोगों का कार्बन उत्सर्जन सबसे कम है, वही इसके सबसे गंभीर परिणाम भुगत रहे हैं।
अनौपचारिक क्षेत्र भारतीय शहरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। विभिन्न आकलनों के अनुसार शहरों में कार्यरत अधिकांश श्रमिक असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े हैं। उनके पास स्थायी रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा या पेंशन जैसी सुविधाएँ नहीं होतीं। उनकी आय प्रतिदिन के कार्य पर निर्भर करती है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन उनके लिए केवल मौसम का बदलाव नहीं बल्कि आजीविका का संकट बन जाता है।
जब भीषण गर्मी पड़ती है, निर्माण कार्य धीमे हो जाते हैं, सड़क विक्रेताओं की बिक्री घट जाती है, रिक्शा और ई-रिक्शा चालक कम समय तक काम कर पाते हैं तथा दिहाड़ी मजदूरों की आय प्रभावित होती है। दूसरी ओर, अत्यधिक वर्षा और शहरी बाढ़ से बाजार बंद हो जाते हैं, परिवहन बाधित होता है और लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी ठप पड़ जाती है। अधिकांश अनौपचारिक श्रमिकों के पास आय का कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं होता। परिणामस्वरूप वे कर्ज, भूख और आर्थिक असुरक्षा के दुष्चक्र में फंस जाते हैं।
शहरों की झुग्गी बस्तियाँ जलवायु संकट का सबसे बड़ा केंद्र बन चुकी हैं। अधिकांश झुग्गियाँ नदी किनारे, नालों के आसपास या निम्न-स्तरीय भूमि पर स्थित होती हैं, जहाँ बाढ़ और जलभराव का खतरा अधिक रहता है। इन क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल, सीवरेज, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव होता है। भारी वर्षा के बाद दूषित जल फैलने से डेंगू, मलेरिया, हैजा और अन्य जलजनित रोग तेजी से फैलते हैं। गर्मी के दौरान टिन की छतों वाले छोटे घर असहनीय तापमान तक गर्म हो जाते हैं, जिससे बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
स्वच्छता कार्यकर्ताओं की स्थिति और भी चिंताजनक है। वे प्रतिदिन कचरा संग्रह, नालों की सफाई, सीवर प्रबंधन और अपशिष्ट निस्तारण जैसे कार्य करते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक गर्मी, दूषित जल और चरम वर्षा जैसी परिस्थितियाँ उनके कार्य को और अधिक जोखिमपूर्ण बना रही हैं। अनेक स्थानों पर आज भी पर्याप्त सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं हैं। हीट स्ट्रेस, संक्रमण, त्वचा रोग, श्वसन संबंधी बीमारियाँ और जहरीली गैसों का खतरा लगातार बना रहता है। विडंबना यह है कि शहरों की स्वच्छता बनाए रखने वाले ये कर्मचारी स्वयं सुरक्षित कार्य परिस्थितियों से वंचित हैं।
भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग पर कानूनी प्रतिबंध होने के बावजूद समय-समय पर सीवरों में दम घुटने से होने वाली मौतें यह दर्शाती हैं कि कानून और वास्तविकता के बीच अभी भी बड़ा अंतर है। जलवायु परिवर्तन के कारण भारी वर्षा के समय सीवरों और नालों की सफाई का दबाव बढ़ जाता है, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है।
महिलाएँ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को अलग प्रकार से झेलती हैं। अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत महिलाएँ घरेलू जिम्मेदारियों के साथ आर्थिक गतिविधियों में भी भाग लेती हैं। जल संकट बढ़ने पर पानी लाने का अतिरिक्त बोझ अक्सर महिलाओं पर ही पड़ता है। बाढ़ या गर्मी के दौरान स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी अधिक बढ़ जाते हैं। गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल का अतिरिक्त भार भी महिलाओं को ही उठाना पड़ता है।
प्रवासी श्रमिक जलवायु संकट के सबसे अदृश्य पीड़ितों में हैं। वे प्रायः अस्थायी आवासों में रहते हैं, जहाँ मूलभूत सुविधाओं का अभाव होता है। अत्यधिक गर्मी, वर्षा या बाढ़ के समय उनके पास सुरक्षित आश्रय नहीं होता। रोजगार रुकने पर वे आय और भोजन दोनों के संकट से जूझते हैं। महामारी के दौरान यह स्थिति स्पष्ट रूप से सामने आई थी और जलवायु परिवर्तन भविष्य में ऐसी परिस्थितियों को और गंभीर बना सकता है।
शहरी शासन की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जलवायु परिवर्तन को अक्सर केवल पर्यावरण विभाग या वन विभाग का विषय मान लिया जाता है, जबकि इसका संबंध स्वास्थ्य, परिवहन, आवास, रोजगार, जल प्रबंधन, सामाजिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन सहित लगभग सभी क्षेत्रों से है। यदि नगर नियोजन में जलवायु जोखिमों को शामिल नहीं किया जाएगा तो भविष्य की समस्याएँ और गंभीर होंगी।
आज आवश्यकता ऐसे शहरों की है जो केवल स्मार्ट न हों बल्कि जलवायु-सहिष्णु और सामाजिक रूप से समावेशी भी हों। इसके लिए हरित अवसंरचना का विस्तार, वर्षा जल संचयन, शहरी जल निकायों का संरक्षण, हरित पट्टियों का विकास, छायादार सार्वजनिक स्थान, प्रभावी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और आधुनिक जल निकासी प्रणाली विकसित करनी होगी। साथ ही प्रत्येक शहर के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हीट एक्शन प्लान और बाढ़ प्रबंधन रणनीति तैयार करनी होगी।
अनौपचारिक श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना भी उतना ही आवश्यक है। स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, आय सहायता, कौशल विकास और जलवायु जोखिम बीमा जैसी व्यवस्थाएँ उन्हें संकट के समय सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं। सड़क विक्रेताओं, कचरा बीनने वालों और अन्य अनौपचारिक श्रमिकों को शहरी योजनाओं में भागीदार बनाया जाना चाहिए।
स्वच्छता कार्यकर्ताओं के लिए यंत्रीकरण को प्राथमिकता देना समय की मांग है। सीवर और नालों की सफाई में मशीनों का अधिकतम उपयोग, गुणवत्तापूर्ण सुरक्षा उपकरण, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियाँ सुनिश्चित की जानी चाहिए। यह केवल श्रम अधिकारों का प्रश्न नहीं बल्कि मानव गरिमा का विषय भी है।
जलवायु परिवर्तन के समाधान में नागरिकों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। जल संरक्षण, ऊर्जा दक्षता, सार्वजनिक परिवहन, कचरा पृथक्करण, वृक्षारोपण और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण जैसे प्रयास शहरों को अधिक टिकाऊ बना सकते हैं। लेकिन इन प्रयासों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब शासन पारदर्शी, उत्तरदायी और समावेशी होगा।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि जलवायु परिवर्तन केवल तापमान बढ़ने की कहानी नहीं है। यह उन असमानताओं का दर्पण है जो हमारे शहरों में पहले से मौजूद हैं। यदि विकास का लाभ समान रूप से नहीं पहुँचेगा और कमजोर वर्गों को सुरक्षा नहीं मिलेगी तो जलवायु संकट सामाजिक अन्याय को और गहरा करेगा। इसलिए भारत के शहरी भविष्य की सफलता केवल ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और स्मार्ट तकनीक से नहीं मापी जाएगी बल्कि इस बात से तय होगी कि हमारे शहर अपने सबसे कमजोर नागरिकों- अनौपचारिक श्रमिकों और स्वच्छता कार्यकर्ताओं को कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और न्यायपूर्ण जीवन प्रदान कर पाते हैं।
जलवायु परिवर्तन का मुकाबला केवल पर्यावरणीय उपायों से संभव नहीं है। इसके लिए संवेदनशील शासन, सामाजिक न्याय, समावेशी शहरी नियोजन और मानव गरिमा पर आधारित विकास मॉडल की आवश्यकता है। यही वह मार्ग है जो भारतीय शहरों को वास्तव में टिकाऊ, न्यायपूर्ण और भविष्य के लिए सक्षम बना सकता है।
(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

