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संकट बनती निर्माणाधीन सुरंगें

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संकट बनती निर्माणाधीन सुरंगें


प्रमोद भार्गव

मानव जीवन के लिए प्रकृति को छलनी कर किया जा रहा आधुनिक विकास, जहां जरूरी है, वहीं संकट का सबब भी बन रहा है।सिक्किम के नामची जिले में समरडुंग-झोलुंगे में नामची जल विद्युत सुरंग परियोजना (तीस्ता नदी चरण-5) की निर्माणाधीन सुरंग में तेज बारिश, भूस्खलन और जहरीली गैस मीथेन के रिसाव चलते बड़ी दुर्घटना घटी है। इसमें 20 मजदूरों की मौत हो गई। कुल 25 मजदूर घटना के समय सुरंग में काम कर रहे थे। 500 मेगावाट की इस परियोजना में विस्फोट के कारण मिथेन का रिसाव हुआ बताया जा रहा है। रिसाव के चलते राष्ट्रीय और राज्य आपदा राहत दलों को बचाव कार्य में कठिनाई आ रही है। सुरंग के भीतर ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम रह गया था। इस कारण कई बेहोश हो गए थे। फंसे लोगों को निकालने के लिए हरसंभव प्रयास हो रहे हैं। सुरंगों के लिए किए जाने वाले भीषण विस्फोटों को भूस्खलन एक बड़ा कारण माना जा रहा है। नामची जिले में जल विद्युत ऊर्जा निगम तीस्ता छह परियोजनाओं के लिए सुरंगें बनाई जा रही हैं। समूचे हिमालय में घट रही ऐसी घटनाएं पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा को लेकर बड़े सवाल खड़े कर रही हैं।

इस सुरंग के अलावा सिक्किम के ऊंचाई वाले नगरों व ग्रामों तक पहुँच आसान बनाने के लिए अनेक सुरंगें निर्माणाधीन हैं। इनमें 578 मीटर लंबी एक सुरंग मंगन जिले की सीमा में गंगटोक-चुंगथांग राजमार्ग पर बन रही है। दूसरी प्रमुख सुरंग सिवोक-रंगपो है। इसे पाक्योंग जिले में भारत-तिब्बत तक बनाया जा रहा है। यह सुरंग सीमा तक सैनिकों की आवाजाही को आसान बनाएगी। मालूम हो, बीते साल फ़रवरी 2025 में तेलंगाना के नगरकुरनूल जिले के डोमलपेंटा गांव में श्रीशैलम लेफ्ट बैंक कैनाल (एसएलबीसी) परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में फंसे आठ लोगों का जीवन बचाने में अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा था। 42 किमी लंबी यह सुरंग बनने के बाद दुनिया की सबसे लंबी पानी की सुरंग कहलाएगी। 2023 में उत्तराखंड के उत्तरकाशी में निर्माणाधीन सुरंग का एक हिस्सा भूमि में धंस जाने के कारण 40 मजदूर फंस गए थे। उनके प्राण पिछले कुछ दिनों से संकट में जरूर हैं, लेकिन उन्हें बचा लिया गया था।

यह हादसा उत्तरकाशी से 55 किमी दूर निर्माणाधीन सिल्क्यारा-पोलगांव सुरंग के भीतर हुआ था। यह हादसा भू-स्खलन के कारण सुरंग का 15 मीटर हिस्सा जमीन में धंस जाने के कारण घटित हुआ था। बरसात के मौसम में सुरगें मलबे और पानी से भर जाती हैं। फंसे लोगों को बचाने के लिए रैट माइनर्स अर्थात चूहों की तरह खदान खोदने वाले विशेषज्ञ खनिक इस काम को अंजाम तक पहुंचा पाते हैं। यही सिक्किम के लोगों को बचने के काम में जुटे हैं। बचाव दल रोबोटिक कैमरों की मदद से लोगों तक बमुशिकल पहुँच पता है। ये थर्मल फिशिंग नौका से सुरंग के अंदर पहुंचते हैं।

वर्तमान में देशभर के पहाड़ों की पारिस्थितिकी की अनदेखी करके सड़कों, रेल लाइन, नहरों के पानी की निकासी, नदी जोड़ों और जल विद्युत परियोजनाओं के लिए हिमालय के शिखरों से लेकर मध्य और दक्षिण भारत के अनेक पहाड़ो को खोदा जा रहा है। इन कठिन कार्यों को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए अनेक दुर्घटनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है। समूचे हिमालय क्षेत्र में बीते एक दशक से पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाने के परिप्रेक्ष्य में जल विद्युत संयंत्र और रेल परियोजनाओं की बाढ़ आई हुई है। इन योजनाओं के लिए हिमालय क्षेत्र में रेल गुजारने और कई हिमालयी छोटी नदियों को बड़ी नदियों में डालने के लिए सुरंगें निर्मित की जा रही हैं। बिजली परियोजनाओं के लिए जो संयंत्र लग रहे हैं, उनके लिए हिमालय को खोखला किया जा रहा है।

इस आधुनिक औद्योगिक और प्रौद्योगिकी विकास का ही परिणाम है कि आज हिमालय ही नहीं, हिमालय के शिखर दरकने लगे हैं, जिन पर हजारों साल से मानव बसाहटें अपने ज्ञान-परंपरा के बूते जीवन-यापन करने के साथ हिमालय और वहां रहने वाले अन्य जीव-जगत की भी रक्षा करते चले आ रहे हैं। हिमालय और पृथ्वी सुरक्षित बने रहें, इस दृष्टि से कृतज्ञ मनुष्य ने अथर्ववेद में लिखे पृथ्वी-सूक्त में अनेक प्रार्थनाएं की हैं। यह सूक्त में राष्ट्रीय अवधारणा एवं वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को विकसित, पोषित एवं फलित करने के लिए मनुष्य को नीति और धर्म से बांधने की कोशिश की हैं। लेकिन हमने कथित भौतिक सुविधाओं के लिए अपने आधार को ही नष्ट करने का काम आधुनिक विकास के बहाने कर दिया। जोशीमठ इसी अनियोजित विकास की परिणति है।

उत्तराखंड के चमोली जिले में आने वाले जोशीमठ शहर ने कई अप्रिय कारणों से नीति-नियंताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा जारी उपग्रह तस्वीरों से जोशीमठ के हिमालय के गर्भ में घंस जाने की चिंता जताई है। सिमटती धरती की इन प्रामाणिक सच्चाइयों को छिपाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और उत्तराखंड सरकार ने अंतरिक्ष एजेंसी समेत कई सरकारी संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे मीडिया के साथ जानकारी साझा न करे। उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहयोगी नदियों पर एक लाख तीस हजार करोड़ की जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इनमें से कई पूरी भी हो गई हैं। इन संयंत्रों की स्थापना के लिए लाखों पेड़ों को काटने के बाद पहाड़ों को निर्ममता से छलनी किया जा रहा है और नदियों पर बांध निर्माण के लिए बुनियाद हेतु गहरे गड्ढे खोदकर खंबे व दीवारें खड़े किए जाते हैं। कई जगह सुरंगे बनाकर पानी की धार को संयंत्र के पंखों पर डालने के उपाय किए गए हैं। इन गड्ढों और सुरंगों की खुदाई में ड्रिल मशीनों से जो कंपन होता है, वह पहाड़ की परतों की दरारों को खाली कर देता है और पेड़ों की जड़ों से जो पहाड़ गुंथे होते हैं, उनकी पकड़ भी इस कंपन से ढीली पड़ जाती है। नतीजतन तेज बारिश के चलते पहाड़ों के ढहने और हिमखंडो के टूटने की घटनाएं पूरे हिमालय क्षेत्र में लगातार बढ़ जाती हैं। यही नहीं कठोर पत्थरों को तोड़ने के लिए भीषण विस्फोट भी किए जाकर हिमालय को हिलाया जा रहा है।

हिमालय में अनेक रेल परियोजनाएं भी निर्माणाधीन है। सबसे बड़ी रेल परियोजना उत्तराखंड के चार जिलों (टेहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और चमोली) के तीस से ज्यादा गांवों को भी विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है। छह हजार परिवार विस्थापन के दायरे में आ गए हैं। रुद्रप्रयाग जिले के मरोड़ा गांव के सभी घर दरक गए है। रेल विभाग ने इनके विस्थापन की तैयारी कर ली है। यह तो शुरुआत है, लेकिन ये विकास इसी तरह जारी रहते हैं तो बर्बादी का नक्शा बहुत विस्तृत होगा। दरअसल ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेल परियोजना 125 किमी लेगी है। इसके लिए सबसे लंबी सुरंग देवप्रयाग से जनासू तक बनाई जा रही है, जो 14.8 किमी लंबी है। केवल इसी सुरंग का निर्माण बोरिंग मशीन से किया जा रहा है। बांकी जो 15 सुरंगें बन रही हैं, उनमें ड्रिल तकनीक से बारूद लगाकर विस्फोट किए जा रहे हैं। इस परियोजना का दूसरा चरण कर्णप्रयाग से जोशीमठ के बजाय अब पीपलकोटी तक होगा। भू-गर्भीय सर्वेक्षण के बाद रेल विकास निगम ने जोशीमठ क्षेत्र की भौगोलिक संरचना को परियोजना के अनुकूल नहीं पाया था। इसलिए अब इस परियोजना का अंतिम पड़ाव पीपलकोटी कर दिया है,जो एक अच्छी पहल है। हिमालय की ठोस व कठोर अंदरूनी सतहों में ये विस्फोट दरारें पैदा करके पेड़ों की जड़े हिला रहे हैं। हिमालय की अलकनंदा नदी घाटी ज्यादा संवेदनशील है। रेल परियोजनाएं इसी नदी से सटे पहाड़ों के नीचे और ऊपर निर्माणाधीन हैं।

हिमालय में हाल ही में केन-बेतवा नदी जोड़ों अभियान की तर्ज पर उत्तराखंड में देश की पहली ऐसी परियोजना पर काम शुरू हो गया है, जिसमें हिमनद (ग्लेशियर) की एक धारा को मोड़कर बरसाती नदी में पहुंचाने का प्रयास हो रहा है। यदि यह परियोजना सफल हो जाती है तो पहली बार ऐसा होगा कि किसी बरसाती नदी में सीधे हिमालय का बर्फीला पानी बहेगा। हिमालय की अधिकतम ऊंचाई पर नदी जोड़ने की इस महापरियोजना का सर्वेक्षण शुरू हो गया है। इस परियोजना की विशेषता है कि पहली बार उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल की एक नदी को कुमाऊं मंडल की नदी से जोड़कर बड़ी आबादी को पानी उपलब्ध कराया जाएगा। यही नहीं एक बड़े भू-भाग को सिंचाई के लिए भी पानी मिलेगा। ‘जल जीवन मिशन‘ के अंतर्गत इस परियोजना पर काम किया जा रहा है। लेकिन इस परियोजना के क्रियान्वयन के लिए जिस सुरंग का निर्माण कर पानी नीचे लाया जाएगा, उसके निर्माण में हिमालय के शिखर-पहाड़ों को खोदकर सुरंगों एवं नालों का निर्माण किया जाएगा, उनके लिए ड्रिल मशीनों से पहाड़ों को छेदा जाएगा और विस्फोट से पहाड़ों को शिथिल किया जाएगा। यह स्थिति हिमालयी पहाड़ों के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नया बड़ा खतरा साबित हो सकती है। हिमालय के लिए बांधों के निर्माण पहले से ही खतरा बनकर कई मर्तबा बाढ़, भूस्खलन और केदारनाथ जैसी प्रलय की आपदा का कारण बन चुके हैं।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश