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परंपरा और संविधान के बीच संतुलन तलाशता समाज

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परंपरा और संविधान के बीच संतुलन तलाशता समाज


-डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा के जींद जिले में नौगामा खाप की महापंचायत द्वारा प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों के 21 गांवों में प्रवेश पर रोक लगाने संबंधी कथित निर्णय ने एक बार फिर उस बहस को जीवित कर दिया है, जो समय-समय पर भारतीय समाज के सामने खड़ी होती रही है- क्या सामाजिक परंपराएं किसी बालिग नागरिक के संवैधानिक अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं? यह विवाद केवल एक पंचायत या एक गांव तक सीमित नहीं है बल्कि बदलते भारतीय समाज, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक संरचनाओं के बीच संतुलन की चुनौती को भी सामने लाता है।

खाप पंचायतों का इतिहास सदियों पुराना है। ग्रामीण समाज में उन्होंने विवाद निपटाने, सामाजिक अनुशासन बनाए रखने और सामुदायिक सहयोग को मजबूत करने का कार्य किया है। अनेक अवसरों पर जल संरक्षण, नशामुक्ति, सामाजिक समरसता और सामूहिक हितों से जुड़े निर्णयों में उनकी सकारात्मक भूमिका रही है इसलिए उन्हें नकारात्मक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। किंतु जब कोई निर्णय संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करता दिखाई देता है, तब उस पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

भारतीय संविधान प्रत्येक बालिग नागरिक को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय भी अनेक निर्णयों में स्पष्ट कर चुका है कि दो वयस्कों का सहमति से किया गया विवाह कानून की दृष्टि में पूरी तरह वैध है। ऐसी स्थिति में किसी सामाजिक संस्था द्वारा ऐसे विवाहों पर रोक लगाने या सामाजिक बहिष्कार की घोषणा लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।

इस पूरे विवाद के बीच सोशल मीडिया पर वायरल एक युवती का वीडियो चर्चा का केंद्र बन गया। उसने एक ऐसा सवाल उठाया, जिसे केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया कहकर टाला नहीं जा सकता। उसका प्रश्न था कि जब हरियाणा में वर्षों तक कन्या भ्रूण हत्या के कारण लड़कियों की संख्या कम होती रही और अनेक परिवार दूसरे राज्यों से महिलाओं को खरीद कर विवाह करने लगे, तब समाज की सामूहिक चेतना उतनी मुखर क्यों नहीं दिखाई दी? यदि सहमति से किया गया प्रेम विवाह सामाजिक संकट माना जाता है तो मानव तस्करी जैसी अमानवीय प्रवृत्तियों पर समान कठोरता क्यों नहीं दिखाई जाती?

यह प्रश्न केवल खाप पंचायतों के लिए नहीं, पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है। दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा, बाल विवाह, महिला उत्पीड़न, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति और बेटियों के प्रति भेदभाव जैसे अनेक सामाजिक संकट आज भी हमारे सामने हैं। यदि समाज की सामूहिक शक्ति इन समस्याओं के समाधान में अधिक सक्रिय हो तो उसका सकारात्मक प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होगा।

यह भी सत्य है कि हर प्रेम विवाह सफल नहीं होता। कई बार जल्दबाजी, अपरिपक्व निर्णय या पारिवारिक संवाद की कमी से रिश्तों में तनाव पैदा होता है। माता-पिता की चिंताएं भी कई बार वास्तविक होती हैं। इसलिए युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे अपने निर्णय परिपक्वता, पारदर्शिता और परिवार के सम्मान को ध्यान में रखकर लें। संवाद हमेशा टकराव से बेहतर विकल्प होता है।

उधर, सामाजिक संस्थाओं को भी यह स्वीकार करना होगा कि बदलते समय में अधिकारों और स्वतंत्रताओं की नई समझ विकसित हुई है। परंपराओं का सम्मान आवश्यक है किंतु वे तभी टिकाऊ होती हैं जब वे न्याय, समानता और मानव गरिमा के साथ सामंजस्य स्थापित करें। समाज की भूमिका भय पैदा करने की नहीं, विश्वास बनाने की होनी चाहिए।

एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्रतिनिधित्व का है। जिन निर्णयों का सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है, उनमें महिलाओं की भागीदारी कितनी है? क्या सामाजिक निर्णय प्रक्रिया में सभी वर्गों की पर्याप्त सहभागिता सुनिश्चित है? लोकतांत्रिक समाज में यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना परंपरा और अधिकार का प्रश्न।

आज का भारत तेजी से बदल रहा है। शिक्षा, रोजगार, तकनीक और संचार ने नई पीढ़ी की सोच को नया आयाम दिया है। ऐसे समय में सामाजिक संस्थाओं के सामने चुनौती यह है कि वे अपनी ऐतिहासिक भूमिका को बनाए रखते हुए संवैधानिक मूल्यों के साथ तालमेल बैठाएं। संवाद, समझ और सहमति का मार्ग ही समाज को आगे ले जा सकता है।

दरअसल, यह विवाद प्रेम विवाह बनाम परंपरा का नहीं बल्कि समाज की प्राथमिकताओं का है। यदि हम कन्या भ्रूण हत्या, दहेज, महिला सुरक्षा, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर उतनी ही गंभीरता से एकजुट हों, जितनी व्यक्तिगत निर्णयों पर दिखाई देती है तो समाज अधिक स्वस्थ और संतुलित बन सकता है।

लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि वह परंपराओं का सम्मान करते हुए भी व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इसलिए आवश्यकता किसी पक्ष की पूर्ण विजय की नहीं बल्कि ऐसे सामाजिक संवाद की है जिसमें परंपरा भी सम्मानित रहे और संविधान भी सर्वोच्च बना रहे। यही संतुलन भविष्य के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश