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वृद्धावस्था की चुनौती : बढ़ती उम्र, सिकुड़ती संवेदना

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वृद्धावस्था की चुनौती : बढ़ती उम्र, सिकुड़ती संवेदना


विश्व वृद्ध दिवस (01 अक्टूबर) पर विशेष

- डॉ. मनीष कुमार चौधरी

वृद्ध होना जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है लेकिन वृद्धावस्था को सम्मान के साथ जी पाना आज एक सामाजिक चुनौती बनता जा रहा है। मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक उसकी बढ़ती जीवन-प्रत्याशा है। चिकित्सा विज्ञान, पोषण, तकनीक और जीवन-स्तर में सुधार ने मनुष्य को अधिक लंबे समय तक जीने का अवसर दिया है। लेकिन एक विडंबना हमारे सामने है- हमने जीवन को लंबा तो कर दिया पर क्या हमने उस लंबे जीवन को सम्मान, सुरक्षा, आत्मीयता और अर्थ भी दिया है?

दुनिया तेजी से वृद्ध हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार साल 2023 में दुनिया में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग 1.1 अरब लोग थे। यह संख्या साल 2050 तक बढ़कर लगभग 2.1 अरब होने का अनुमान है। यानी आने वाले पच्चीस वर्षों में दुनिया में बुजुर्गों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाएगी। साल 2030 तक दुनिया का हर छहवां व्यक्ति 60 वर्ष या उससे अधिक आयु का होगा। साल 2050 तक दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत बुजुर्ग निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रह रहे होंगे।

यह केवल जनसंख्या का आंकड़ा नहीं है। यह आने वाले समाज की संरचना में होने वाले एक बड़े बदलाव का संकेत है। दुनिया के सामने अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि बढ़ती आबादी को रोजगार कैसे दिया जाए, बल्कि यह भी है कि बढ़ती वृद्ध आबादी को स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और जीवन की गरिमा कैसे दी जाए।

भारत इस परिवर्तन के बीच एक विशेष स्थिति में खड़ा है। आज भारत को दुनिया के युवा देशों में गिना जाता है लेकिन यह स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के अनुसार भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी साल 2021 में लगभग 10.1 प्रतिशत थी, जो 2050 तक बढ़कर करीब 20 प्रतिशत हो सकती है। यूएनएफपीए के एक हालिया आकलन के अनुसार साल 2050 तक भारत में लगभग 34.6 करोड़ लोग 60 वर्ष से अधिक आयु के हो सकते हैं।

इसका अर्थ है कि जिस भारत की आज चर्चा युवा आबादी और जनसांख्यिकीय लाभांश के कारण होती है, उसे उसी समय अपनी वृद्ध होती आबादी के भविष्य की भी तैयारी करनी होगी।

वृद्धावस्था केवल उम्र नहीं, एक सामाजिक स्थिति

हमने वृद्धावस्था को लंबे समय तक मुख्यतः शारीरिक कमजोरी और बीमारी से जोड़कर देखा है। यह दृष्टि अधूरी है। वृद्धावस्था का संबंध व्यक्ति की सामाजिक भूमिका, आर्थिक स्वतंत्रता, पारिवारिक संबंधों, मानसिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान से भी है। किसी व्यक्ति की उम्र बढ़ जाने का अर्थ यह नहीं कि उसका सामाजिक महत्व समाप्त हो गया। उसके पास जीवन का वह अनुभव होता है, जिसे कोई पुस्तक, कोई तकनीक और कोई कृत्रिम बुद्धिमत्ता पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। उसने परिवार बनाए हैं, संस्थाएं खड़ी की हैं, समाज को अपना श्रम दिया है और अगली पीढ़ियों के लिए रास्ते बनाए हैं।

फिर ऐसा क्यों है कि जब वही व्यक्ति वृद्ध होता है तो कई बार उसकी उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगने लगता है? ‘उन्होंने तो अपना जीवन जी लिया’, ‘अब बच्चों को अवसर मिलना चाहिए’ या ‘अब इनसे क्या काम’ जैसी धारणाएं केवल सामान्य बातचीत का हिस्सा नहीं हैं। इनके पीछे एक ऐसी उपयोगितावादी मानसिकता है जिसमें मनुष्य का मूल्य उसकी आर्थिक उत्पादकता से तय होने लगता है। यदि किसी व्यक्ति का मूल्य केवल उसकी कार्यक्षमता से निर्धारित होगा तो बीमारी, विकलांगता और वृद्धावस्था अपने आप समाज के हाशिये पर चली जाएंगी। मनुष्य की गरिमा उसकी उत्पादकता से बड़ी है।

अकेलापन: वृद्धावस्था की अदृश्य बीमारी

वृद्धावस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में अकेलापन तेजी से सामने आ रहा है। संयुक्त परिवारों के कमजोर होने, बच्चों के रोजगार के लिए दूसरे शहरों या देशों में चले जाने और जीवन की बढ़ती व्यस्तता ने बुजुर्गों की सामाजिक दुनिया को छोटा किया है। एक घर में चार लोग रहते हैं लेकिन चारों की दुनिया अलग-अलग है। बुजुर्ग व्यक्ति के पास समय है, जबकि परिवार के बाकी सदस्यों के पास समय का अभाव। यही विरोधाभास कई बार एक ही छत के नीचे रहते हुए भी भावनात्मक दूरी पैदा करता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अकेलापन और सामाजिक अलगाव वृद्धावस्था में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के महत्वपूर्ण जोखिम कारक हैं। डब्ल्यूएचओ के 2026 के आंकड़ों के अनुसार लगभग हर छह में से एक बुजुर्ग व्यक्ति दुर्व्यवहार का अनुभव करता है और 70 वर्ष या उससे अधिक आयु के लगभग 15 प्रतिशत वयस्क किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या के साथ जीवन जीते हैं। इसलिए वृद्धावस्था की देखभाल केवल दवा देने तक सीमित नहीं हो सकती। बुजुर्गों को बातचीत चाहिए, सामाजिक सहभागिता चाहिए, निर्णयों में भूमिका चाहिए और सबसे बढ़कर यह विश्वास चाहिए कि वे परिवार के लिए अब भी महत्वपूर्ण हैं।

आर्थिक असुरक्षा का दूसरा चेहरा भी कम चिन्ताजनक नहीं हैI वृद्धावस्था तब और कठिन हो जाती है जब उसके साथ आर्थिक निर्भरता जुड़ जाती है। हर बुजुर्ग पेंशनभोगी नहीं है। हर व्यक्ति के पास बचत या संपत्ति नहीं है। भारत में बड़ी संख्या ऐसे वृद्धों की है जिनका जीवन परिवार की आय पर निर्भर है। यूएनएफपीए की भारत एजिंग रिपोर्ट 2023 के अनुसार भारत के 40 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग सबसे गरीब आर्थिक वर्ग में आते हैं और लगभग 18.7 प्रतिशत बुजुर्गों के पास कोई आय नहीं है। रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया है कि आर्थिक असुरक्षा का सीधा असर स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है।

यहां वृद्धावस्था और गरीबी एक-दूसरे को और कठिन बना देते हैं। दवा महंगी है तो भोजन में कटौती होती है। अस्पताल जाना है तो परिवहन की समस्या सामने आती है। पेंशन नहीं है तो छोटी से छोटी जरूरत के लिए किसी दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। वृद्धावस्था में आर्थिक स्वतंत्रता केवल सुविधा नहीं, आत्मसम्मान का भी आधार है।

वृद्ध महिलाओं की चुनौती और भी कठिन

वृद्धावस्था का एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखा पक्ष वृद्ध महिलाओं की स्थिति है। महिलाओं की जीवन प्रत्याशा सामान्यतः पुरुषों से अधिक होती है। इसका अर्थ यह भी है कि वे अधिक वर्षों तक वृद्धावस्था में जीवन जी सकती हैं लेकिन कई बार विधवापन, संपत्ति पर सीमित अधिकार और आर्थिक निर्भरता के साथ। यूएनएफपीए की भारत संबंधी रिपोर्टों में वृद्ध महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा को विशेष चिंता के रूप में रेखांकित किया गया है। 80 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी के बढ़ने के साथ अत्यधिक वृद्ध, विधवा और अधिक निर्भर महिलाओं की संख्या भी बढ़ने की संभावना है। इसलिए वृद्धावस्था की नीति को केवल ‘बुजुर्गों’ की एक समान श्रेणी मानकर नहीं बनाया जा सकता। वृद्ध पुरुष और वृद्ध महिला की सामाजिक परिस्थितियां कई मामलों में अलग होती हैं।

बुजुर्गो के लिए शहर में सुविधा, गांव में संबंध

महानगरों में रहने वाले बुजुर्गों की समस्या का एक चेहरा है- सुविधाओं के बीच अकेलापन। बेहतर अस्पताल, निजी स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन और मनोरंजन के साधन उपलब्ध हो सकते हैं लेकिन परिवार और समुदाय का समय कम हो सकता है। इसके विपरीत ग्रामीण जीवन में आज भी कई जगह सामाजिक संबंध अधिक मजबूत दिखाई देते हैं। लेकिन वहां स्वास्थ्य सुविधाओं, परिवहन, पेंशन और नियमित देखभाल की समस्याएं अधिक गंभीर हो सकती हैं। युवाओं के रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन ने ग्रामीण बुजुर्गों की एक नई पीढ़ी को अकेलेपन की ओर धकेला है। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं कि गांव में वृद्धावस्था आसान है और शहर में कठिन। दोनों जगह चुनौतियों का स्वरूप अलग है।

एक और नई चुनौती डिजिटल विभाजन है। बैंकिंग से लेकर टिकट, अस्पताल की बुकिंग, सरकारी सेवाओं और संचार तक जीवन तेजी से डिजिटल हो रहा है। युवा इसे सुविधा के रूप में देखते हैं लेकिन अनेक बुजुर्गों के लिए यह एक नई दीवार बन जाता है। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में कागज, डाक, बैंक की पासबुक और आमने-सामने संवाद के माध्यम से काम किया हो, उसके सामने अचानक ऐप, पासवर्ड, ओटीपी और ऑनलाइन सत्यापन की दुनिया खड़ी हो जाती है। हमें यह समझना होगा कि डिजिटल साक्षरता केवल तकनीक सीखना नहीं है। यह वृद्ध व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाए रखने का माध्यम भी है।

क्या परिवार ही पर्याप्त है?

भारतीय समाज में अक्सर कहा जाता है कि बुजुर्गों की देखभाल परिवार की जिम्मेदारी है। यह बात सही है लेकिन केवल परिवार पर पूरी जिम्मेदारी डाल देना पर्याप्त नहीं होगा। बदलती अर्थव्यवस्था, छोटे परिवार, प्रवासन और रोजगार की प्रकृति ने परिवार की क्षमता को भी बदला है। इसलिए राज्य, समाज, परिवार और बाजार- सभी को मिलकर वृद्धावस्था की नई संरचना तैयार करनी होगी। स्वास्थ्य सेवाओं में जेरियाट्रिक यानी वृद्ध चिकित्सा को मजबूत करना होगा। पेंशन और सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना होगा। सार्वजनिक परिवहन और शहरों को वृद्ध-अनुकूल बनाना होगा। अकेले रहने वाले बुजुर्गों के लिए सामुदायिक सहायता तंत्र विकसित करना होगा। साथ ही वृद्धों के लिए डे-केयर, सामुदायिक केंद्र और घर पर देखभाल जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ाना होगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी वृद्धावस्था को केवल चिकित्सा का विषय न मानकर स्वास्थ्य, सामाजिक देखभाल, परिवहन, आवास और शहरी नियोजन सहित व्यापक सामाजिक व्यवस्था से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देता है।

वृद्धों को देखभाल नहीं, सहभागिता भी चाहिए

हमारे दृष्टिकोण में बुनियादी बदलाव जरूरी है। बुजुर्गों को केवल ‘देखभाल पाने वाले’ व्यक्ति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। वे समाज के सक्रिय सदस्य हैं।

बुजुर्गों के अनुभव को स्कूलों, समुदायों, स्थानीय संस्थाओं और परिवारों के साथ जोड़ा जा सकता है। दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां केवल मनोरंजन नहीं, पीढ़ियों के बीच संवाद का माध्यम हैं। सेवानिवृत्ति का अर्थ सामाजिक जीवन से सेवानिवृत्ति नहीं होना चाहिए। जिस व्यक्ति ने चालीस वर्ष काम किया है, उसके पास सेवानिवृत्ति के बाद भी अनुभव है। समाज को उस अनुभव के लिए नए अवसर पैदा करने चाहिए।

भारत के सामने चुनौती

भारत के लिए यह चुनौती और बड़ी है क्योंकि वृद्ध आबादी तेजी से बढ़ने वाली है। UNFPA के अनुसार साल 2050 तक भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या लगभग 34.6 करोड़ तक पहुंच सकती है। 80 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी में 2022 से 2050 के बीच लगभग 279 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान भी सामने आया है। यह आंकड़ा हमें चेतावनी देता है कि वृद्धावस्था भविष्य की समस्या नहीं है। वह हमारे वर्तमान में प्रवेश कर चुकी है। आज जो युवा अपने माता-पिता की वृद्धावस्था की चिंता नहीं करता, उसे यह भी समझना होगा कि वह स्वयं भी उसी जीवन-चक्र का हिस्सा है। वृद्धावस्था किसी दूसरे व्यक्ति की समस्या नहीं है। वह हमारे अपने भविष्य का नाम है। इसलिए वृद्धों के लिए बनाई गई व्यवस्था वास्तव में हमारे अपने भविष्य की व्यवस्था है।

वृद्धावस्था जीवन का अंत नहीं है। यह जीवन की लंबी यात्रा का वह पड़ाव है, जहाँ व्यक्ति को सबसे अधिक सम्मान, सबसे अधिक आत्मीयता और सबसे अधिक सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता हो सकती है। समाज की सभ्यता का मूल्यांकन उसकी तकनीकी उपलब्धियों, ऊंची इमारतों और आर्थिक विकास से जितना होता है, उतना ही इस बात से भी होता है कि वह अपने बच्चों, महिलाओं, दिव्यांगों और बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। हमें यह तय करना होगा कि हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जिसमें उम्र बढ़ना बोझ समझा जाए या ऐसा समाज जिसमें बढ़ती उम्र अनुभव और गरिमा का उत्सव बने। वृद्धों की दुनिया को सुरक्षित करना दरअसल अपने भविष्य को सुरक्षित करना है। क्योंकि आज का युवा कल का बुजुर्ग है। जिस समाज में वृद्धावस्था सम्मानित होती है, उस समाज में मनुष्य का पूरा जीवन सम्मानित होता है। यही किसी सभ्य और संवेदनशील समाज की असली पहचान है।

(लेखक, दिल्ली के दौलतराम कॉलेज में सहायक प्राध्यापक हैं।)

हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी