किराए की कोख की दुकानों पर अंकुश
-प्रमोद भार्गव
केंद्र सरकार ‘किराए की कोख‘ यानी सरोगेसी मदर की क्लीनिक के नाम पर खुली मनमानी दुकानों पर अंकुश लगने जा रही है। अब कुकुरमुत्तों की तरह देशभर में खुल रही नई दुकानें खोलने पर सख्ती बरती जाएगी। सरोगेसी केंद्रों और इनमें होने वाले फर्जीवाड़े को रोकने के लिए सरकार ने इसमें पंजीयन और संचालन के नियमों में बदलाव किया है। नए नियमों के तहत इन केंद्रों को अब उपग्रहों द्वारा नियंत्रित किया जाएगा। अब केवल राष्ट्रीय पोर्टल और ऑनलाइन आवेदन ही होंगे। इस पर निगरानी ऑनलाइन सॉफ्टवेयर से होगी। कागजी आवेदन व दस्तावेजीकरण की सुविधा पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी गई है। ये क्लीनिक अन्य दूसरे क्लीनिक को चिकित्सा सुविधा नहीं दे सकेगा। केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि नए नियमों का सख्ती से पालन किया जाए।
दरअसल, किराए की कोख का व्यवसायीकरण हो रहा है। यह इस तथ्य से पता चला कि कुछ ही सालों के भीतर देश में 35 से 50 प्रतिशत केंद्रों की संख्या बढ़ गई। इसी अनुपात में देश-विदेश में ठगी की घटनाएं भी बढ़ी हैं। हैदराबाद में ऐसा गिरोह पकड़ा गया, जो 2 से 4 लाख में कोख किराए पर लेकर 30 लाख रुपए तक में बेच देते थे। यहां तक कि विदेशों से भी शुक्राणु दानदाता लाए गए। यानी देश के बाहर भी बच्चे बेचे गए। हालांकि 2025 में सरकार ने शुक्राणु दाता नियमों में बदलाव किया था लेकिन कारोबारियों ने इन नियमों की अनदेखी की। नाबालिग और अविवाहित लड़कियों की कोख का भी अवैध इस्तेमाल किया गया। भारत में कोख किराए से लेने का खर्च 10 से 25 लाख है, जबकि विदेशों में 80 लाख से डेढ़ करोड़ रुपए तक है। इसलिए सरोगेसी क्लीनिकों में किराए की कोख अवैध कारोबार का बड़ा धंधा बनती जा रही है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और तमिलनाडु में सरोगेसी के अनेक ठगी के मामले सामने आए हैं। इसलिए सरकार को नियमों में बदलाव करना पड़ा। इसके पहले 2025 में लिव इन और समलैंगिक युगलों को किराए की कोख के जरिए माता-पिता बनने का अधिकार देने से साफ मना कर दिया था।
अब ऑनलाइन जानकारी होने से निगरानी तंत्र के पास सरोगेसी क्लीनिक संचालन व नवीनीकरण संबंधी जानकारी हर वक्त सामने होगी। इससे अनियमितता को आसानी से चिन्हित कर लिया जाएगा। क्लीनिक के पास क्या वैध दस्तावेज हैं, इसकी भी पुख्ता जानकारी मिलती रहेगी। कोई भी कमी पाए जाने पर संस्था को प्रतिबंधित किया जा सकेगा। इन केंद्रों के कर्मचारियों और बच्चों के जन्म की जानकारी भी मिलती रहेगी। सरकार इन नियमों को एक साथ लागू करने की बजाय चरणबद्ध अमल में लाएगी। वर्तमान कानून के अनुसार किसी अन्य महिला की कोख के प्रयोग की अनुमति तब मिलती है, जब कानून के अनुसार विवाहित जोड़ा षारीरिक रूप से अक्षम हो या फिर गर्भधारण करने में पत्नी की जान को खतरा हो। अर्थात इस हालात में वैवाहिक जोड़ा सरोगेसी मदर का साहरा ले सकता है। कानून के अनुसार यह भी बाध्यकारी शर्त है कि किराए की कोख देने वाली महिला विवाहित होनी चाहिए और कम-से-कम उसका एक बच्चा भी हो। साथ ही पति की आयु 26 से 55 वर्ष और पत्नी की आयु 23 से पचास वर्ष के बीच होना आवश्यक है।
किराए की कोख के कानून में परिवर्तन इसके बढ़ते अवैध व्यापार पर अंकुश लगाने की दृष्टि से किया गया है। अब केवल निःसंतान दंपति जो बच्चे पैदा करने में शारीरिक रूप से अक्षम हैं, वे अपने किसी करीबी रिश्तेदार की मदद ले सकते हैं। इस सुविधा को कानूनी भाषा में ‘अल्ट्रस्टिक सर्जरी सरोगेसी‘ कहा जाता है। भारत दुनिया के दंपतियों के लिए किराए की कोख का बड़ा व्यावसायिक नाभिकेंद्र बनता जा रहा है, जो सुविधा वास्तविक जरूरतमंदों के लिए शुरू की गई थी, वह अमीर दंपतियों के लिए शौक में तब्दील होती जा रही है। सूचना तकनीक के बाद भारत में प्रजनन का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। इसमें किराए पर कोख दिए जाने का धंधा भी शामिल है। चिकित्सा पर्यटन के बहाने विदेशी पर्यटक भारत प्रसूति पर्यटन के लिए भी आ रहे हैं।
भारत में किराए की कोख का कारोबार अरबों डाॅलर का हो गया है लेकिन यह धंधा अंततः प्रकृति की प्रतिरूप महिला की कोख पर टिका है, ठीक उसी तरह जिस तरह, उदारवादी अर्थव्यवस्था प्रकृति के गर्भ में समाई खनिज संपदाओं के दोहन पर टिकी है। इस धंधे की भारी कीमत उन महिलाओं को चुकानी पड़ी है, जिन्हें अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए हर हाल में धन की जरूरत रहती है। अतएव 2016 में प्रजनन सहायक तकनीक विधेयक लाकर केंद्र्र सरकार ने इस गोरखधंधे पर अकुंश लगाने की पहल कर दी थी। जो एक सही कदम रहा है। लेकिन इस कानून से उन्हें परेशानी है, जिन्होंने स्त्री की आर्थिक कमजोरी को वस्तु में डालकर उसकी कोख को बाजार के हवाले कर दिया है। वे यह भी दलील दे रहे हैं कि कठोर कानून से विदेशी मुद्रा का आगमन रुक जाएगा।
सरोगेसी मां बनने के लिए महिला को इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया से गुजरना होता है। इसके लिय जैविक माता-पिता के शुक्राणु और अण्डाणु को परखनली में निषेचित करने के बाद जब भ्रूण पनप जाता है, तब उसे अन्य स्त्री की कोख में प्रत्यारोपित किया जाता है। गर्भाधान का यही एकमात्र उपाय है। इसका शरीर पर विपरीत असर पड़ता है, इसके गर्भपात होने की 80 फीसदी आशंका रहती है। ऐसी 90 प्रतिशत प्रसूति शल्यक्रिया के जरिए होती हैं। ऐसे में महिला की जान का संकट भी बना रहता है। इस स्थिति में कोख किराए से देने वाली महिला का न तो कोई बीमा होता था, न ही उसके पति और बच्चों की कोई गारंटी लेता था। इस परिप्रेक्ष्य में यह भी बड़ा सवाल था कि जैविक अविभावक यदि जन्म के बाद बच्चे को छोड़कर नौ-दो-ग्यारह हो जाते हैं तो उसके पालन-पोषण की जबावदेही किसकी थी? यदि नवजात शिशु विकलांग या ऐसी लाइलाज बीमारी के साथ पैदा होता है और जैविक माता-पिता उसे लेने से इनकार कर देते हैं तो उस बच्चे की जिम्मेदारी कौन लेता? ऐसी स्थिति में उन महिलाओं को और ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता था, जो किश्तों पर कोख किराए पर देती थीं। ऐसी ही सुविधाओं के चलते भारत में किराए की कोख वैश्विक राजधानी बन गया था।
इस बाबत एक स्वयंसेवी संगठन के अध्ययन ने चौंकाने वाले सवाल भी उठाए थे। खासतौर से विदेशी धनवान जब किराए की कोख से संतान पाने के इच्छुक होते हैं तो वे भारत आकर एक साथ कई महिलाओं को गर्भधारण करा देते हैं। इनमें से कुछ महिलाओं में यह प्रयोग सफल हो जाता है तो वह किसी एक महिला को छोड़ बाकी का गर्भपात करा देते हैं। गर्भपात कराई गई महिलाओं को कोई धन भी नहीं दिया जाता था। यह सरासर अन्याय व अनैतिकता थी। इसी अध्ययन से खुलासा हुआ था कि कोख की कीमत कई हजार डॉलर है लेकिन इस राशि में से सरोगेसी मां को महज 1 या 2 प्रतिशत धनराशि ही बामुश्किल मिल पाती है। बाकी अस्पताल के चिकित्सक और बिचौलिये हजम कर जाते थे।
अप्रवासी भारतीयों में सरोगेसी की मांग बहुत ज्यादा थी। यदि स्त्री स्वस्थ व सुंदर होने के साथ उच्च जाति और उत्तम पारिवारिक पृष्ठभूमि से होती थी तो उसे ज्यादा पैसा दिया जाता था। अप्रवासी दंपति भारत आकर किराए की कोख द्वारा बच्चा पैदा करना इसलिए भी अच्छा मानते थे क्योंकि वे मनौवैज्ञानिक स्तर पर अपने को भारत से जुड़ा पाते थे, नतीजतन भारत में सरोगेसी की मांग तेजी से बढ़ रही रही थी। वर्तमान में अमीर घरों की स्त्रियां शौक के लिए या बच्चा पैदा करने के कठिन दायित्व से बचने के लिए किराए की कोख से संतान पैदा कर रही हैं। अतएव यह कारोबार निरंतर बढ़ रहा था। यहां तक कि नाबालिग और अविवाहित लड़कियां भी इस धंधे में धन कमाने के लिए उतरती चली आ रही थीं। इसलिए इस कानून में नए बदलाव जरूरी थे।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

