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सुदर्शन का हिंदी स्वप्न: ज्ञान की भाषा को व्यवस्था की चुनौती

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सुदर्शन का हिंदी स्वप्न: ज्ञान की भाषा को व्यवस्था की चुनौती


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय चेतना को उसकी भाषाओं से अलग करके नहीं समझा जा सकता। जिस देश ने हजारों वर्षों से अपनी ज्ञान परंपरा संस्कृत, प्राकृत, पालि और देशज भाषाओं में विकसित की, वहां आधुनिक भारत में ज्ञान-विज्ञान, चिकित्सा, तकनीक और उच्च शिक्षा का सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी भाषा के सहारे आगे बढ़ा। स्वतंत्रता के बाद भी अंग्रेजी उच्च शिक्षा और रोजगार की सीढ़ी बनी रही। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुप्प सी सुदर्शनजी ने एक ऐसा सपना देखा, जोकि सिर्फ हिंदी के विस्तार का स्वप्न न होकर इससे कहीं आगे भारतीय प्रतिभा को ज्ञान अर्जित करने के लिए विदेशी भाषा की बाध्यता से मुक्त करने का आग्रह है। वे चाहते थे कि भारत की अपनी भाषाओं में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की दुनिया खड़ी की जाए।

सुदर्शनजी की दृष्टि में भाषा संवाद का माध्यम होने के अलावा विचार की स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और मौलिक चिंतन का आधार है। उनका मानना था कि जब कोई विद्यार्थी अपनी सहज भाषा में विज्ञान, तकनीक या चिकित्सा को समझता है, तब उसके भीतर प्रश्न पूछने, प्रयोग करने और नए विचार गढ़ने की क्षमता अधिक स्वाभाविक ढंग से विकसित हो सकती है। इसी विचार का एक संस्थागत रूप भोपाल में स्थापित अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय के रूप में सामने आया।

19 दिसंबर 2011 को इस विश्वविद्यालय की स्थापना बड़े उद्देश्य के साथ हुई। कल्पना यह थी कि हिंदी में इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, प्रबंधन और दूसरे आधुनिक विषयों की उच्च शिक्षा उपलब्ध होगी। यह प्रयोग अपने भीतर एक बड़े भाषायी स्वाभिमान का विचार समेटे हुए था। सवाल था कि क्या हिंदी सिर्फ साहित्य और सामान्य शिक्षा की भाषा रहेगी या वह प्रयोगशाला, अस्पताल, इंजीनियरिंग संस्थान और आधुनिक उद्योग की भाषा भी बन सकेगी?

डेढ़ दशक के आसपास की यात्रा के बाद आज इसी सवाल के सामने विश्वविद्यालय की स्थिति गंभीर चिंता पैदा करती है। 4,280 स्वीकृत सीटों वाले संस्थान में महज 234 विद्यार्थियों का प्रवेश होना और एमए हिंदी जैसे मूल पाठ्यक्रम में एक विद्यार्थी का दाखिला होना उस संकट की गहराई बताता है, जिसकी कल्पना कभी स्वयं सुदर्शनजी ने भी निश्चित रूप से नहीं की होगी। लगभग 68 पाठ्यक्रमों में सात प्रमुख तकनीकी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश का आंकड़ा शून्य रहना भी संकेत देता है कि विचार बड़ा था, पर उसके अनुरूप संस्थागत तैयारी नहीं हो सकी।

यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हिंदी की क्षमता के अलावा व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है। विद्यार्थी यह देखता है कि हिंदी माध्यम से डिग्री लेने के बाद उसका भविष्य क्या होगा। यदि तकनीकी शिक्षा हिंदी में प्राप्त करने के बाद रोजगार बाजार में अंग्रेजी की अनिवार्यता उसके सामने खड़ी हो जाती है, तो वह स्वाभाविक रूप से जोखिम लेने से बचता है। भाषा के प्रति भावनात्मक आग्रह रोजगार की निश्चितता का विकल्प नहीं बन सकता। सुदर्शनजी के स्वप्न को सफल बनाने के लिए हिंदी शिक्षा के साथ हिंदी में रोजगार का भरोसा भी पैदा करना होना चाहिए था, पर प्रशासनिक व्यवस्था को जो इस दिशा में करना चाहिए था, दुर्भाग्य से वह आज तक मध्य प्रदेश के भाषायी रूप से हिन्दी प्रदेश होने के बाद भी आज तक संभव नहीं हो पाया है।

तकनीकी शिक्षा की तरह यह संकट हिंदी माध्यम एमबीबीएस के प्रयोग में भी दिखाई दे रहा है। मध्य प्रदेश ने लगभग तीन वर्ष पहले मेडिकल शिक्षा में अंग्रेजी के विकल्प के रूप में हिंदी को स्थापित करने का महत्वाकांक्षी अभियान शुरू किया। लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च कर 50 हजार हिंदी मेडिकल पुस्तकें छापी गईं। 16 विषयों की पुस्तकों का अनुवाद 300 से अधिक डॉक्टरों की टीम ने किया। अनुवाद, मुद्रण और मंदार केंद्रों पर करोड़ों रुपये खर्च हुए। आरंभिक दौर में मुख्यमंत्री और मंत्री स्तर पर अनेक समीक्षा बैठकें हुईं। विद्यार्थियों से संवाद हुआ और इस अभियान से जुड़े लोगों को सम्मानित भी किया गया।

फिर भी आज तस्वीर का दूसरा पक्ष सामने है। अनेक केंद्रों पर ताले की स्थिति, हिंदी पुस्तकों का स्टोर में पड़े रहना, लंबे समय से कार्यसमिति की बैठक न होना और हिंदी प्रकोष्ठ के लिए स्वतंत्र बजट का अभाव यह बताता है कि किसी बड़े भाषायी अभियान को किताबें प्रकाशित करके सफल नहीं बनाया जा सकता, उसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति भी चाहिए, जो सिर्फ बोलने से व्यवहार में यानी जमीन पर नहीं उतरने वाली है।

सबसे गंभीर प्रश्न विद्यार्थियों के भरोसे का है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में प्रश्नपत्र उपलब्ध होने के बावजूद पिछले तीन वर्षों में किसी विद्यार्थी द्वारा हिंदी में परीक्षा नहीं लिखना अपने आप में बड़ा संकेत है। विद्यार्थियों के बीच यह धारणा बन जाना कि हिंदी में उत्तर लिखने पर कम अंक मिल सकते हैं या शून्य अंक का खतरा हो सकता है, पूरे अभियान की बुनियादी कमजोरी को सामने लाता है। जब तक परीक्षा, मूल्यांकन, शिक्षक प्रशिक्षण और प्रशासनिक व्यवस्था हिंदी माध्यम के विद्यार्थी को बराबर का भरोसा नहीं देती, तब तक पुस्तकें अलमारियों से निकलकर कक्षा और परीक्षा कक्ष तक नहीं पहुंचेंगी।

वस्तुत: यहीं पर सुदर्शन जी के स्वप्न को राज्य में मिट्टी में मिलता हुआ हम देखते हैं। क्या हिंदी में ज्ञान संभव है? इसका उत्तर आज विज्ञान और तकनीकी पुस्तकों के हुए अनुवाद दे चुके हैं। प्रश्न अब यह है कि क्या हिंदी में ज्ञान की ऐसी संपूर्ण व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिसमें विद्यार्थी पढ़े, परीक्षा दे, शोध करे और अंततः रोजगार भी पाए?

अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय को इसी व्यापक मिशन का राष्ट्रीय केंद्र बनाया जा सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मातृभाषाओं में उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण आधार देती है। मध्य प्रदेश में हिंदी माध्यम एमबीबीएस का प्रयोग पहले ही हो चुका है। ऐसे में भोपाल स्थित विश्वविद्यालय को हिंदी तकनीकी शब्दावली, उच्च स्तरीय पाठ्यसामग्री, डिजिटल अध्ययन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद और भारतीय भाषाओं में शोध का केंद्रीय केंद्र बनाया जा सकता है।

इसके लिए स्थायी और योग्य प्राध्यापकों की नियुक्ति, आधुनिक प्रयोगशालाओं की स्थापना, देश के प्रमुख तकनीकी और चिकित्सा संस्थानों से अकादमिक साझेदारी तथा हिंदी माध्यम विद्यार्थियों के लिए रोजगार की ठोस व्यवस्था आवश्यक होगी। सरकार को उद्योग जगत के साथ संवाद कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हिंदी माध्यम से पढ़े विद्यार्थी डिग्री लेकर स्थायी रोजगार प्राप्त करेंगे। क्योंकि तकनीकी दक्षता को भाषा के आधार पर रोजगार से वंचित करना भी उतना ही अनुचित है जितना भाषा के नाम पर गुणवत्ता से समझौता करना।

यहां ध्यान रहे, सुदर्शनजी का सपना हिंदी को अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा के विरुद्ध खड़ा करना कभी नहीं रहा, उनका सपना यह था कि भारतीय विद्यार्थी अपनी भाषा में आधुनिक विश्व का ज्ञान हासिल कर सके और अपनी मौलिक प्रतिभा को विकसित कर सके। इस दृष्टि से हिंदी और अंग्रेजी को संघर्ष की दो सेनाओं की तरह देखने के बजाय ज्ञान के दो माध्यमों के रूप में देखना होगा। विद्यार्थी जितनी भाषाएं जाने, उतना अच्छा; पर अपनी भाषा में ज्ञान पाने का अवसर उससे छीन लिया जाए, यह स्वीकार्य स्थिति नहीं होनी चाहिए।

आज अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय और हिंदी माध्यम एमबीबीएस अभियान दोनों एक ही संदेश दे रहे हैं। शासन और प्रशासन भी इस बात को समझें कि भाषा का सपना घोषणाओं से साकार नहीं होता, उसके लिए किताब चाहिए, शिक्षक चाहिए, प्रयोगशाला चाहिए, परीक्षा व्यवस्था चाहिए, शोध चाहिए और सबसे बढ़कर रोजगार का भरोसा चाहिए।

ऐसे में कहना यही है कि सुदर्शनजी ने जिस भाषायी स्वाभिमान का सपना देखा था, वह आज भी प्रासंगिक है। चुनौती यह है कि उस स्वप्न को स्मारक बनने से बचाया जाए। यदि मध्य प्रदेश सरकार इस अवसर को व्यापक नीति में बदल सके तो भोपाल का हिंदी विश्वविद्यालय भारतीय भाषाओं में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की नई यात्रा का राष्ट्रीय केंद्र बन सकता है। अन्यथा खतरा यही है कि सुदर्शनजी का जीवंत स्वप्न धीरे-धीरे फाइलों, पुस्तकों और सरकारी घोषणाओं में बंद होकर रह जाएगा। अब सब कुछ व्यवस्था की इच्छाशक्ति पर आकर टिक गया है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी