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स्ट्रीट फूड के लिए नए सिरे से नियमन की जरूरत

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स्ट्रीट फूड के लिए नए सिरे से नियमन की जरूरत


-योगेश कुमार सोनी

देशभर में स्ट्रीट फूड का चलन तेजी से बढ़ रहा है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक सड़क किनारे ठेले, रेहड़ी और छोटी दुकानों पर मिलने वाला भोजन आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। कम कीमत, आसानी से उपलब्धता और स्थानीय स्वाद इसकी लोकप्रियता का बड़ा कारण है। लेकिन इसके साथ भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्ट्रीट फूड बेचने वाले लाखों छोटे कारोबारी अपनी आजीविका इसी व्यवसाय से चलाते हैं। इसलिए नियमन का उद्देश्य उन्हें परेशान करना या उनकी रोजी-रोटी छीनना नहीं होना चाहिए। जरूरत ऐसे व्यावहारिक नियमों की है, जिनसे कारोबार भी चलता रहे और लोगों को सुरक्षित एवं स्वच्छ भोजन भी मिल सके।

सरकारों को स्ट्रीट फूड के लिए एक व्यापक और आधुनिक नियामक व्यवस्था पर विचार करना चाहिए। इसमें साफ पानी की उपलब्धता, खाद्य सामग्री के सुरक्षित भंडारण, खाना बनाने और परोसने की स्वच्छता, कचरा निस्तारण, हाथ धोने की व्यवस्था तथा इस्तेमाल होने वाले बर्तनों की सफाई जैसे मानकों को अनिवार्य किया जा सकता है। साथ ही खाद्य विक्रेताओं के लिए आसान पंजीकरण और नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था भी होनी चाहिए।

देशभर में स्ट्रीट फूड का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। सड़क किनारे मिलने वाला खाना आम लोगों के लिए सस्ता और आसानी से उपलब्ध विकल्प है लेकिन इसके साथ खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता का सवाल भी लगातार गंभीर होता जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन दुकानों पर बिकने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और उनमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री कई स्थानों पर यह आरोप सामने आते रहे हैं कि सड़क किनारे दुकान लगाने की अनुमति या पुलिस की निगरानी के नाम पर अवैध वसूली होती है। यदि कहीं ऐसा हो रहा है तो इसकी निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। किसी भी सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार के कारण खाद्य सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए।

स्ट्रीट फूड में इस्तेमाल होने वाले तेल, मसाले, दूध, पनीर, मांस, पानी और अन्य खाद्य सामग्री की गुणवत्ता की नियमित जांच बेहद जरूरी है। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि खाद्य सामग्री किस स्रोत से खरीदी जा रही है, उसे किस तरह रखा जा रहा है और खाना तैयार करने वाले व्यक्ति स्वच्छता के निर्धारित मानकों का पालन कर रहे हैं या नहीं। कई बार खराब या दूषित खाद्य पदार्थ खाने से लोगों के बीमार पड़ने की खबरें सामने आती हैं। गंभीर मामलों में खाद्य विषाक्तता जानलेवा भी हो सकती है। ऐसे मामलों में केवल दुकान संचालक को दोषी ठहराने के बजाय यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि संबंधित इलाके में निगरानी और निरीक्षण की जिम्मेदारी किस विभाग की थी और क्या नियमित जांच वास्तव में की गई थी।

स्ट्रीट फूड कारोबार को बंद करना इसका समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि इसके लिए स्पष्ट और व्यावहारिक नियमावली बनाई जाए। प्रत्येक दुकान या ठेले का पंजीकरण हो, खाद्य सुरक्षा संबंधी प्रशिक्षण दिया जाए, स्वच्छता के मानक तय हों और समय-समय पर खाद्य सामग्री के नमूने लेकर प्रयोगशाला में जांच कराई जाए। इसके साथ ही स्थानीय निकाय, खाद्य सुरक्षा विभाग और पुलिस की जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से निर्धारित की जानी चाहिए। पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, जबकि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की वैज्ञानिक जांच के लिए सक्षम खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की व्यवस्था होनी चाहिए। जहां अवैध वसूली या भ्रष्टाचार की शिकायत हो, वहां स्वतंत्र जांच और कार्रवाई की व्यवस्था भी होनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी व्यक्ति की जान जाने के बाद कार्रवाई करने के बजाय खाद्य सुरक्षा की नियमित निगरानी पहले से सुनिश्चित की जाए। स्ट्रीट फूड लाखों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत और रोजगार का माध्यम है, इसलिए इसे व्यवस्थित, सुरक्षित और जवाबदेह बनाना सरकार और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। सवाल केवल यह नहीं है कि सड़क किनारे खाना कौन बेच रहा है। असली सवाल यह है कि जो खाना लाखों लोग खा रहे हैं, उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि अलग-अलग शहरों में स्ट्रीट फूड कारोबार के लिए नियम, निगरानी और उनके पालन की व्यवस्था एक जैसी नहीं है। स्थानीय निकायों, खाद्य सुरक्षा विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है। छोटे विक्रेताओं को केवल दंडित करने के बजाय पहले उन्हें प्रशिक्षण, बुनियादी सुविधाएं और स्पष्ट दिशानिर्देश उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

स्ट्रीट फूड को शहरों की अर्थव्यवस्था और संस्कृति का हिस्सा मानते हुए इसके लिए निर्धारित वेंडिंग जोन विकसित किए जा सकते हैं। इन स्थानों पर स्वच्छ पानी, कूड़ेदान, जल निकासी और साफ-सफाई जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। इससे विक्रेताओं और ग्राहकों दोनों को लाभ होगा तथा सड़कों पर अव्यवस्था भी कम हो सकती है। सरकारों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि खाद्य सुरक्षा के नाम पर बनाए गए नियम इतने जटिल न हों कि छोटे दुकानदार उनके पालन में ही असमर्थ हो जाएं। डिजिटल पंजीकरण, सरल लाइसेंस प्रक्रिया और कम लागत वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम इस दिशा में मददगार हो सकते हैं।

स्ट्रीट फूड पर पूरी तरह रोक लगाना समाधान नहीं है। इसके बजाय इसे व्यवस्थित, सुरक्षित और स्वच्छ बनाना ज्यादा व्यावहारिक रास्ता है।

बदलते समय के साथ स्ट्रीट फूड संस्कृति भी बदल रही है इसलिए इसके नियमन के लिए पुराने और बिखरे हुए प्रावधानों के बजाय एक स्पष्ट, व्यावहारिक और जवाबदेह व्यवस्था पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

आखिरकार सवाल सिर्फ सड़क किनारे बिकने वाले भोजन का नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य और लाखों छोटे कारोबारियों की आजीविका का है। इसलिए स्ट्रीट फूड के लिए ऐसा नियमन जरूरी है जिसमें स्वच्छता, खाद्य सुरक्षा, उपभोक्ता अधिकार और विक्रेताओं की आजीविका चारों के बीच संतुलन कायम किया जा सके।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश