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सड़कों पर दम तोड़ती गायें

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सड़कों पर दम तोड़ती गायें


-डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत के लगभग हर छोटे-बड़े शहर की भयावह तस्वीर अब आम होती जा रही है- कूड़े के ढेर में भोजन तलाशती गायें, प्लास्टिक निगलते बछड़े, सड़कों पर भटकते पशु और गंदगी से जूझती आबादी। एक तरफ समाज गाय को “माता” कहकर पूजता है, दूसरी तरफ वही गायें भूख, बीमारी और इंसानों की लापरवाही के कारण सड़कों पर दम तोड़ रही हैं। यह केवल सफाई व्यवस्था की विफलता नहीं बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनहीनता और दोहरे चरित्र का जीवंत प्रमाण है।

आज देश के अधिकांश शहरों में सुबह का दृश्य लगभग एक जैसा होता है। दूध निकालने के बाद पशुपालक अपनी गायों को खुला छोड़ देते हैं। ये पशु फिर गलियों, बाजारों और कूड़े के ढेरों में भोजन तलाशते घूमते रहते हैं। सड़ी सब्जियाँ, प्लास्टिक की थैलियाँ, मेडिकल वेस्ट और जहरीला कचरा इनके पेट में जाता है। धीरे-धीरे यही जहर उनकी मौत का कारण बनता है। कई बार ऑपरेशन में गायों के पेट से कई किलो प्लास्टिक निकलता है लेकिन समाज की संवेदनाएँ फिर भी नहीं जागतीं।

सबसे बड़ा सवाल उन पशुपालकों से है जो पशु को केवल “दूध देने वाली मशीन” समझते हैं। जब तक गाय से कमाई होती है, तब तक उसकी पूजा होती है लेकिन जैसे ही वह सड़कों पर छोड़ दी जाती है, उसकी जिम्मेदारी खत्म मान ली जाती है। यह लालच और अमानवीयता का सबसे कुरूप चेहरा है। जिस पशु से घर चलता है, बच्चों की फीस भरती है और परिवार की आय बनती है, उसी को कचरे में मुंह मारने के लिए छोड़ देना किस संस्कृति और किस धर्म का हिस्सा है?

विडंबना यह है कि गाय के नाम पर देश में सबसे ज्यादा भावनाएँ भड़काई जाती हैं। राजनीति से लेकर धार्मिक मंचों तक “गौ माता” का जयकारा लगाया जाता है। सोशल मीडिया पर लोग गाय को रोटी खिलाते हुए वीडियो डालते हैं और खुद को बड़ा पशु प्रेमी साबित करते हैं। लेकिन यदि सच में गाय के प्रति प्रेम और सम्मान होता तो शहरों की सड़कों पर कोई गाय भूखी, घायल या प्लास्टिक खाते दिखाई नहीं देती।

आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि शहरों में आवारा पशु केवल अपनी जान ही नहीं गंवा रहे, बल्कि आम लोगों की जान के लिए भी खतरा बनते जा रहे हैं। सड़क दुर्घटनाओं में हर साल हजारों लोग घायल होते हैं। रात के अंधेरे में अचानक सामने आए पशु कई बार जानलेवा हादसों का कारण बनते हैं लेकिन न प्रशासन गंभीर दिखता है और न समाज।

नगर निगम और स्थानीय प्रशासन समय-समय पर अभियान चलाने की बातें करते हैं लेकिन समस्या जड़ से कभी हल नहीं होती। कुछ पशु पकड़कर गौशालाओं में भेज दिए जाते हैं, कुछ दिनों तक कार्रवाई दिखाई जाती है और फिर सब पहले जैसा हो जाता है। असल समस्या यह है कि पशुपालकों की जवाबदेही तय ही नहीं की जाती। यदि कोई व्यक्ति अपने पशु को सड़क पर छोड़ता है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई क्यों नहीं होती?

यह संकट केवल पशुओं तक सीमित नहीं है। शहरों में फैला कचरा और गंदगी अब सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। खुले कूड़े के ढेर मच्छरों, मक्खियों और संक्रमण का घर बनते जा रहे हैं। बारिश में यही कचरा नालियाँ जाम करता है और जलभराव के साथ बीमारियों का संकट पैदा करता है। लेकिन हम सफाई को अब भी केवल सरकारी जिम्मेदारी मानकर अपने कर्तव्यों से बच निकलना चाहते हैं।

भारत “स्मार्ट सिटी” और आधुनिक विकास के बड़े-बड़े दावे करता है। चमकती सड़कें, बड़े मॉल और ऊँची इमारतें विकास का प्रतीक बन गई हैं लेकिन असली विकास वह होता है जहाँ इंसान और पशु दोनों सम्मान और सुरक्षा के साथ जी सकें। जिस शहर में गायें कूड़े में भोजन तलाशती हों और लोग उस दृश्य को सामान्य मानकर गुजर जाएँ, वहाँ विकास केवल दिखावा है।

हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमने संवेदनशीलता को प्रदर्शन में बदल दिया है। कैमरे के सामने दया दिखाना आसान है लेकिन व्यवस्था बदलने की मांग करना कठिन। लोग मंदिरों में दान देते हैं, धार्मिक यात्राएँ करते हैं, गाय के नाम पर बहस करते हैं लेकिन अपने आसपास फैली गंदगी और पशुओं की बदहाली पर चुप रहते हैं।

राजनीति भी इस मुद्दे पर केवल भावनात्मक लाभ उठाती रही है। चुनावों में गाय और धर्म के नाम पर भाषण दिए जाते हैं लेकिन सड़कों पर मरती गायों के लिए ठोस नीति कहीं दिखाई नहीं देती। गौशालाओं के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे होते हैं, फिर भी शहरों में बेसहारा पशुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। आखिर यह पैसा कहाँ जा रहा है? जवाबदेही कौन तय करेगा?

सबसे दुखद बात यह है कि बच्चों की पीढ़ी अब इस अमानवीय दृश्य की आदी होती जा रही है। रोज़ सड़क पर घायल पशु, कूड़े में भोजन तलाशती गायें और गंदगी का माहौल देखकर संवेदनाएँ धीरे-धीरे मरने लगती हैं। एक समाज जो अपने पशुओं तक के प्रति दयालु नहीं रह पाता, वह इंसानों के प्रति भी लंबे समय तक मानवीय नहीं रह सकता।

समाधान स्पष्ट है, बस इच्छाशक्ति की जरूरत है। सबसे पहले पशुपालकों की जिम्मेदारी तय करनी होगी। हर पशु का पंजीकरण अनिवार्य हो और पशु को सड़क पर छोड़ने पर भारी जुर्माना लगाया जाए। नगर निकायों को आधुनिक कचरा प्रबंधन प्रणाली लागू करनी चाहिए। प्लास्टिक के खुले उपयोग और कचरे के गलत निस्तारण पर सख्ती जरूरी है। गौशालाओं की वास्तविक स्थिति का पारदर्शी ऑडिट होना चाहिए।

साथ ही समाज को भी अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा। सड़क पर कचरा फेंकना, प्लास्टिक खुले में छोड़ना और हर समस्या के लिए केवल सरकार को दोष देना आसान रास्ता है। शहर नागरिक अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी से बदलते हैं।

आज सड़कों पर फैला कचरा और उसमें भोजन तलाशती गायें केवल बदइंतजामी का दृश्य नहीं हैं। यह हमारे समाज के नैतिक पतन का आईना हैं। गायों के नाम पर शोर बहुत है लेकिन उनकी वास्तविक पीड़ा पर खामोशी उससे भी बड़ी है। जब तक यह दोहरी मानसिकता खत्म नहीं होगी, तब तक न शहर सच में स्वच्छ होंगे, न पशु सुरक्षित होंगे और न ही हमारा समाज संवेदनशील कहलाने योग्य बचेगा।

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश