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कैसे सेहत और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते स्ट्रा

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कैसे सेहत और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते स्ट्रा


-विवेक शुक्ला

हम सब अपने पसंदीदा पेय -ठंडी कॉफी, ताज़ा नींबू पानी या कोक को पीने के लिए स्ट्रॉ का इस्तेमाल बिना एक पल सोचे कर लेते हैं। ये हमें सुविधाजनक, साफ़-सुथरा और सुरक्षित लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह छोटा-सा प्लास्टिक या पेपर स्ट्रॉ हमारी सेहत और पर्यावरण दोनों को चुपचाप नुकसान पहुँचा रहा है? इन छोटे से स्ट्रॉ का केवल कुछ मिनटों के लिए इस्तेमाल होता है, इसलिए इनसे होने वाले नुकसान की कोई चर्चा ही नहीं हो पाती है। लेकिन दुनिया भर में हर दिन इस्तेमाल किए जाने वाले स्ट्रा समुद्र तट और महासागर की सफाई के दौरान सबसे आम कचरे में से एक होते हैं।

अपने छोटे और हल्के आकार के कारण स्ट्रॉ की शायद ही कभी रीसायक्लिंग होती हो। ये नदियों, समुद्रों और कचरा स्थलों (लैंडफिल) में पहुंच जाते हैं, जहां ये सैकड़ों साल तक बने रह सकते हैं। राजधानी के पर्यावरणविद् और उद्यमी गुरसेव चावला कहते हैं, “भारत में हमारी बड़ी आबादी और बढ़ती कैफ़े कल्चर के कारण स्ट्रॉ का उपयोग तेज़ी से बढ़ रहा है, जिससे समस्या और गंभीर हो रही है।”

कुछ साल पहले, दुनिया के कई हिस्सों में प्लास्टिक स्ट्रॉ पर प्रतिबंध लगना शुरू हुआ, जिसका लोगों ने स्वागत किया। इसके बाद पेपर और मकई से बने प्लास्टिक के स्ट्रॉ बाज़ार में आए और उन्हें “पर्यावरण के अनुकूल” विकल्प के रूप में देखा गया। लेकिन लोगों की धारणा और वास्तविकता के बीच अंतर है। चावला ने इस विषय की गहराई से रिसर्च की। कई देशों का दौरा किया। उन्होंने जो पाया, वह चौंकाने वाला और चिंताजनक था। अपनी शोध की यात्रा ने उन्हें “कार्मापैक्स” नामक कंपनी शुरू करने के लिए प्रेरित किया, जो गन्ने के अपशिष्ट से बने स्ट्रॉ बनाती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले स्ट्रॉ के पीछे छिपी सच्चाइयों के बारे में जागरूकता बढ़ाने का काम किया।

प्रख्यात चिकित्सक और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल कहते हैं, “कई पेपर स्ट्रॉ में रसायन होते हैं, जिन्हें ‘फॉरएवर केमिकल्स’ भी कहा जाता है। ये आसानी से नष्ट नहीं होते और लंबे समय तक पर्यावरण और हमारे शरीर में बने रह सकते हैं। इन्हें नष्ट करने के लिए विशेष औद्योगिक परिस्थितियों की जरूरत होती है, जो भारत के अधिकांश शहरों में उपलब्ध नहीं हैं।”

प्लास्टिक स्ट्रॉ क्यों हानिकारक हैं

प्लास्टिक स्ट्रॉ सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली एकल-उपयोग (सिंगल-यूज़) वस्तुओं में से एक हैं। जब ये गर्मी, धूप या नींबू पानी जैसे अम्लीय पेय के संपर्क में आते हैं तो ये माइक्रोप्लास्टिक नामक छोटे कण छोड़ जाते हैं। माइक्रोप्लास्टिक बहुत छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जो हमारे भोजन और पेय के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। प्लास्टिक में ऐसे रसायन भी होते हैं जो हमारे हार्मोन को प्रभावित कर सकते हैं और समय के साथ हमारी सेहत को तबाह करने लगते हैं।

एक स्ट्रॉ भले ही नुकसानदेह न लगे, लेकिन इसके नियमित इस्तेमाल से इसका प्रभाव बढ़ता जाता है और यह एक गंभीर चिंता का कारण बन सकता है। यह दिखाता है कि केवल प्लास्टिक को किसी अन्य सामग्री से बदलना पर्याप्त नहीं है- विकल्प वास्तव में सुरक्षित और टिकाऊ होना चाहिए।

बेहतर विकल्प क्या

यहीं पर गन्ने के (Bagasse) से बने स्ट्रॉ एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने आते हैं। बगैस (Bagasse) का हिंदी अर्थ खोई है, जो गन्ना या ज्वार का रस निकालने के बाद बचा हुआ सूखा, रेशेदार अवशेष होता है। यह मुख्य रूप से चीनी मिलों में ईंधन, बिजली उत्पादन, कागज़, लुगदी और पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग सामग्री (डिस्पोजेबल प्लेट, कप) बनाने के लिए एक नवीकरणीय स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह भारत में आसानी से उपलब्ध है। आप इसे देश के बड़े चीनी उद्योग का उप-उत्पाद कह सकते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि बगास से बने स्ट्रॉ के कई फायदे हैं। जैसा कि ये पूरी तरह प्लास्टिक-मुक्त और गैर-विषैले होते हैं, इनमें हानिकारक रसायन नहीं होते और ये प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाते हैं और घर पर भी गल सकते हैं। ये कृषि अपशिष्ट से बनाए जाते हैं, जिससे बेकार चीज़ उपयोगी बन जाती है। ये रोज़मर्रा के उपयोग के लिए पर्याप्त मज़बूत होते हैं और पेय में कोई हानिकारक पदार्थ नहीं छोड़ते।

क्या यह बड़े स्तर पर संभव है?

सबसे अच्छी बात ये यह है कि बगास आधारित उत्पादों का उत्पादन पहले से ही बढ़ रहा है। पर्यावरण अनुकूल विकल्पों की बढ़ती मांग और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर सख्त नियमों के कारण कई व्यवसाय अब ऐसे विकल्प अपनाने लगे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आज के उपभोक्ता अधिक जागरूक हो रहे हैं। वे उन ब्रांड्स को पसंद करते हैं जो वास्तव में पर्यावरण की परवाह करते हैं। व्यवसायों के लिए सुरक्षित विकल्प अपनाने से विश्वास और ब्रांड छवि दोनों में सुधार हो सकता है।

क्या बदलने की जरूरत है

सरकारी नीतियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। केवल प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाना पर्याप्त नहीं है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि “सुरक्षित” और “कम्पोस्टेबल” किसे कहा जाए। भ्रामक दावों पर नियंत्रण होना चाहिए और कृषि अपशिष्ट का उपयोग करने वाले उद्योगों को समर्थन मिलना चाहिए। चावला कहते हैं कि उपभोक्ताओं के लिए संदेश सरल है: केवल लेबल पर भरोसा न करें। सवाल पूछें और अपने स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिए सही निर्णय लें।

एक स्ट्रॉ भले छोटी चीज़ लगे लेकिन सबको इस तरह की ही स्ट्रॉ का इस्तेमाल करना होगा जो हमारी सेहत और हमारे पर्यावरण के लिए हानिकारक ना हो। अब समय है कि हम सुविधा से आगे बढ़कर जागरूक विकल्प चुनें- एक-एक घूंट के साथ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश