कलकत्ता विश्वविद्यालय की गरिमा को पुर्नस्थापित करने का अवसर
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती (6 जुलाई) पर विशेष
-गिरीश्वर मिश्र
सन् 1857 भारतवर्ष के इतिहास में एक प्रस्थान बिंदु के रूप में स्मरण किया जाता है। तब इतिहास ने करवट ली थी और देश का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आरंभ हुआ था। इस अत्यंत महत्वपूर्ण घटना की स्मृति के बीच दूसरी बातें अलक्षित ही रह जाती हैं। यह तथ्य भुला दिया जाता है कि उसी वर्ष भारत में पहला आधुनिक विश्वविद्यालय स्थापित हुआ था। अंग्रेजी शासन के केंद्र रहे कलकत्ता में पहले विश्वविद्यालय का आरंभ हुआ था। उसके साथ ही बांबे (अब मुंबई) और मद्रास की रेज़िडेंसियों और फिर 1887 में इलाहाबाद में विश्वविद्यालय स्थापित हुए जिन्होंने देश में आधुनिक ढंग की उच्च शिक्षा की नींव रखी। ये सभी सरकारी विश्वविद्यालय थे जिनकी देखरेख और व्यवस्था राज्य के अधीन थी। शुरू में विश्वविद्यालय का कार्य मात्र परीक्षा आयोजित करने तक सीमित था। धीरे-धीरे उनमें अध्ययन–अध्यापन के साथ शिक्षा देने का कार्य भी शुरू हुआ। कालांतर में अध्ययन विषयों का विस्तार भी हुआ जो विशिष्टीकरण और अब अंतरानुशासनिक दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के केंद्र बनने लगे और वहाँ शिक्षण के साथ विभिन्न विषयों में अनुसंधान का काम भी शुरू हुआ।
स्वतंत्रता मिलने के बाद सामाजिक विकास की दृष्टि से देश में शिक्षा के प्रसार की ज़रूरत महसूस की गई। खासतौर पर आम जनता के लिए शिक्षा पाने की सुविधा बढ़ाने की दृष्टि से भारत में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ने लगी। विगत कुछ दशकों में उनकी संख्या में बड़ी तेजी से उछाल आया है। आज पूरे भारत में ग्यारह सौ से अधिक विश्वविद्यालय हैं और चालीस हज़ार से ज़्यादा महाविद्यालय जिनमें उच्च शिक्षा दी जाती है। सरकारी, अर्ध सरकारी, निजी, विदेशी आदि कई तरह के विश्वविद्यालय शामिल हैं। इनमें कुछ ‘डीम्ड टू बी’ विश्वविद्यालय भी हैं। इनमें कई तरह का स्तर भेद मौजूद है। विश्वविद्यालयों की संख्या में निश्चित ही कई गुनी वृद्धि दर्ज हुई है। इनमें बहुत सारे ग़ैर सरकारी विश्वविद्यालय धनी लोगों द्वारा या व्यापारिक प्रतिष्ठानों द्वारा व्यापार-व्यवसाय की तर्ज पर धनार्जन के लिए चल रहे हैं, जिनका उद्देश्य छात्रों से अधिकाधिक धन उगाही करना है। इन विश्वविद्यालयों में शिक्षा किस तरह की है और उसकी गुणवत्ता कैसी है यह एक अलग विचारणीय प्रश्न है। इन प्रश्नों को लेकर सबके मन में संशय बना हुआ है। उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीय मानकों को देखें तो स्थिति निराशाजनक है और चिंता का कारण है।
पिछले वर्षों में विश्वगुरु बनने की बात की जाती रही है और नालंदा, तक्षशिला, वल्लभी, ओदंतपुरी जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों और वहाँ के गुरुओं की प्रतिभा का स्मरण किया जाता है। शिक्षा का यह समृद्ध अतीत निश्चय ही गौरवशाली है और देश के लिए गर्व का कारण है। परंतु आज की स्थिति यही है कि एक भी विश्वविद्यालय देश में ऐसा नहीं है जिसे स्वीकृत मानदंडों पर विश्वस्तरीय (वर्ल्ड क्लास) का दर्जा दिया जा सके। इसलिए प्रतिभावान भारतीय छात्रों के मन में अभी भी विदेशी विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाने का तीव्र आकर्षण है। इसी का लाभ उठाते हुए कई विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपना परिसर खोल रहे हैं और विद्यार्थी वहाँ दाख़िला भी ले रहे हैं। साथ ही सामर्थ्य रखने वाले साधन संपन्न अभिभावक अपने बच्चों को विदेश में उच्च शिक्षा दिलाने के लिए तत्पर रहते हैं।
समय कभी रुकता नहीं और अब कलकत्ता विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के 170वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है । साथ ही यहाँ के युवतम कुलपति रहे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती का भी यह वर्ष है। वे 33 वर्ष की आयु में ही कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए थे और विश्वविद्यालय में विभिन्न विषयों के पठन-पाठन में अनेक सुधार किए। यही नहीं, उन्होंने बांग्ला भाषा को वहाँ शिक्षा का माध्यम बनाया, गुरुदेव टैगोर को बांग्ला भाषा साहित्य का विशिष्ट प्रोफ़ेसर नियुक्त किया। गुरुदेव ने डॉ. मुखर्जी के आग्रह पर वहाँ 1937 में बांग्ला में दीक्षांत भाषण दिया था। डॉ. मुखर्जी ने विश्वविद्यालय में अनेक नवाचार भी किए। वे समाज के हर स्तर पर शिक्षा का प्रसार चाहते थे ताकि युवा वर्ग में मूल्यों का विकास हो सके। वह सांस्कृतिक जीवन और व्यावसायिक शिक्षा के बीच समुचित संबंध के पक्षधर थे। वे यह भी मानते थे कि उदार और मुक्त परिवेश में राष्ट्रीय संस्कृति के अनुरूप शिक्षा दी जानी चाहिए।
भारत स्थित उच्च शिक्षा संस्थानों के जीवन विस्तार की दृष्टि से विचार करें तो कलकत्ता विश्वविद्यालय जितनी लंबी अवधि विशेष महत्व रखती है। वस्तुतः यह शिक्षा संस्थान आधुनिक भारत के जन्म और उसके नव-निर्माण का साक्षी है। देश के विस्तृत इतिहास के कई कालखण्डों की धड़कनों को अपने में समेटे हुए है। वर्तमान में यह राज्यस्तरीय विश्वविद्यालय है जिसमें अनेकानेक विषयों और पाठ्यक्रमों की पढ़ाई होती है। इस विश्वविद्यालय का अत्यंत गौरवशाली अतीत है। इसकी पहले सीनेट में पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर एक सम्मानित सदस्य थे। ‘बंदे मातरम’ के अमर गायक ख्यातिलब्ध रचनाकार साहित्य सम्राट बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय इस विश्वविद्यालय से अध्ययन कर निकलने वाले प्रथम स्नातक थे।
यह भारत का अकेला विश्वविद्यालय है, जहाँ से चार नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले विद्वान जुड़े रहे, दो स्वतंत्रता मिलने के पहले और दो स्वतंत्रता मिलने के बाद। इस विश्वविद्यालय में गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर बाँग्ला भाषा और साहित्य के और सर सीवी रमन भौतिकी के प्राध्यापक थे। प्रोफ़ेसर अमर्त्य सेन और प्रोफ़ेसर अभिजीत बनर्जी यहाँ के आनर्स के छात्र थे। यहाँ अध्यापन करने वालों में रसायन शास्त्री प्रफुल्ल चंद्र रे, दार्शनिक ब्रजेन्द्रनाथ सील तथा सर्वपल्ली राधाकृष्णन, भौतिकीविद सत्येंद्रनाथ बोस तथा मेघनाद साहा, भौतिकीविद् एवं जीव वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस भी थे। महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोस, देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद यहीं से पढ़ कर निकलने वाली विभूतियां थीं। इन सबने असंदिग्ध रूप से ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में और देश सेवा के लिए अमूल्य योगदान किया, ख्याति अर्जित की और देश की उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया।
विश्वविद्यालयों की एनआईआरएफ की वर्ष 2025 की ताजा रैंकिंग की सूची में कलकत्ता विश्वविद्यालय का नाम देश के विश्वविद्यालयों में 37 वें स्थान पर दिख रहा है। आज कलकत्ता विश्वविद्यालय में मानविकी, भौतिक विज्ञान, समाज विज्ञान, कला, जीव-विज्ञान, प्राच्य अध्ययन आदि अनेक विषयों की पढ़ाई हो रही है। भारतीय और अर्वाचीन दोनों तरह की ज्ञान-धाराओं का प्रवाह यहाँ सरलता से देखा जा सकता है। गौरतलब है कि इनमें से कई विषयों की पढ़ाई भारत में पहली बार कलकत्ता विश्वविद्यालय में ही शुरू हुई थी। बहुत से आविष्कार और सिद्धांतों की जननी यह संस्था आधुनिक भारत की विश्वस्तरीय संस्था बनने की संभावना रखती है। दुर्भाग्य से विगत अनेक दशकों में इस विद्या केंद्र को लेकर प्रदेश और केंद्र सरकारों के बीच के संबंधों में काफ़ी शिथिलता बनी रही। उसका परिणाम यह हुआ कि इस शिक्षा संस्थान को लगातार उपेक्षा का सामना करना पड़ा। राजनीति का शिकार होकर विश्वविद्यालय में पिछले कुछ वर्षों से स्थायी कुलपति तक नहीं था। क्रमशः संस्था के संसाधन सिमटते गए और उसका राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्वरूप धूमिल पड़ता गया।
आज देश की सरकार शिक्षा के उत्थान के लिए उद्यत है और विश्वस्तर की शिक्षा के लिए कृतसंकल्प है। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत कई तरह की पहल की जा रही है। देश में विभिन्न विषयों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक नई संस्थाएं भी स्थापित हो रही हैं और व्यावसायिक शिक्षा देने के लिए कई तरह के उपक्रम किए जा रहे हैं। किंतु शैक्षिक संस्था के रूप में विश्वविद्यालय की व्यापकता का कोई विकल्प नहीं है। साथ ही मौजूद संस्थाओं को संभालने-संजोने का काम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। कोई संस्था एक दिन में नहीं बनती इसलिए जो है उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज जैसे विश्व के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों को बनाने में सदियों का समय लगा है। अर्थात् प्राचीन विश्वविद्यालयों के गौरव को बचाना और उसका संवर्धन भी एक राष्ट्र के लिए पुण्य का काम है।
अमृतकाल में विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए देश द्वारा वर्ष 2047 का लक्ष्य निश्चित किया गया है। यह संयोग ही है कि उस संकल्प के ठीक दस साल बाद यानी 2057 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के लिए अपनी द्विशताब्दी मनाने का अवसर होगा। यह वही अवसर होगा जब भारत अपने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की भी द्विशताब्दी मनाएगा। इस प्रसंग में यह गौरतलब है कि कलकत्ता के ही दर्शन शास्त्र के प्राध्यापक श्री कृष्णचन्द्र भट्टाचार्य ने 1931 में विचार में स्वराज को स्थान देने के लिए आग्रह करते हुए भारतीय समाज को आवाज़ दी थी। देश राजनीतिक रूप से 1947 में स्वतंत्र तो हो गया परंतु मानसिक स्वतंत्रता अभी भी कोसों दूर है। राष्ट्र का दायित्व है कि विचारों में स्वराज की अलख जगाने वाले संस्थान को राष्ट्रीय ज्ञान संस्थान के रूप में एक जीवंत ऐतिहासिक धरोहर घोषित किया जाय। चिंतन और शोध की दृष्टि से सांस्कृतिक चेतना के विकास के लिए इसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान का दर्जा मिले जिससे देश के स्वायत्त विकास की संभावनाएं मूर्त रूप ले सकें।
इस विश्वविद्यालय की पृष्ठभूमि और उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए इसे भारत का अग्रणी विश्वविद्यालय बनाना कठिन नहीं होगा। इस दिशा में पहला कदम होगा कि इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा अविलंब दिया जाए और आकलन कर आवश्यक अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। ज्ञान-विज्ञान का स्वराज्य स्थापित करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर है। विकसित भारत का लक्ष्य सिर्फ आर्थिक प्रगति से नहीं पाया जा सकता। उस हेतु ज्ञान की दृष्टि से भी भारत को विकसित करना होगा।
(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

