कांवड़ यात्रा : भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर
डॉ. आशीष वशिष्ठ
सावन महीने की शुरुआत होते ही हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक, गंगा गंगोत्री से लेकर रामेश्वरम तक सम्पूर्ण भारत शिवमय हो उठता है। सावन माह में शिवभक्तों की विशाल पदयात्राएं जो कांवड़ यात्रा के नाम से जानी जाती है, भारतीय संस्कृति की जीवंतता का अनुपम दृश्य प्रस्तुत करती हैं। कंधों पर सुसज्जित कांवड़, मुख पर बोल बम का उद्घोष, हृदय में भगवान शिव के प्रति अनन्य भक्ति। यही है कांवड़ यात्रा का वास्तविक स्वरूप।
कांवड़ यात्रा केवल एक सामान्य यात्रा नहीं है बल्कि ये तपस्या, भक्ति और श्रद्धा की वह गाथा है जो शताब्दियों से चली आ रही है। धर्मशास्त्रों के अनुसार जब कांवड़ से जुड़े दोनों पात्र जिन्हें ब्रह्मघट और विष्णुघट कहा जाता है, पवित्र जल से भर लिए जाते हैं, उन्हें एक बांस की डण्डी के सहारे सजा-धजा कर और पूजित कर स्थापित कर दिया जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार रूद्र अर्थात् शिव बांस में समाहित हैं। कांवड़िया कांवड़ के माध्यम से साक्षात ब्रह्मा, विष्णु, शिव, तीनों की कृपा एक साथ प्राप्त करते हैं।
भारत में दो कांवड़ यात्राएं होती हैं, दिल्ली से उत्तराखंड-गंगोत्री, ऋषिकेश या हरिद्वार तक की कांवड़ यात्रा और बिहार और झारखंड में सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवड़ यात्रा। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से सैकड़ों-हजारों लोग, युवा से लेकर बुजुर्ग तक, जिनमें महिलाएं और कभी-कभी बच्चे भी कांवड़ यात्रा में भाग लेते हैं। कंधों पर लटका पवित्र जल भगवान शिव को समर्पित है, जिन्हें अक्सर भोला या भोले बाबा कहकर पुकारा जाता है। भोले का अर्थ भोलेनाथ, यानी भगवान शिव भी हो सकता है। इसलिए, तीर्थयात्री भोला और भोले हैं!
वर्तमान में, कांवड़ यात्रा विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक पदयात्राओं में मानी जाती है। आधुनिक समय में इसकी भव्यता अत्यधिक बढ़ी है, किंतु इसकी आध्यात्मिक जड़ें वैदिक एवं पौराणिक परंपराओं में गहराई तक समाई हुई हैं। प्राचीन ग्रंथों में कांवड़ यात्रा का उल्लेख प्राय: किया जाता है। यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है कि कांवड़ यात्रा का उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है? इसका उत्तर थोड़ा सूक्ष्म है। कांवड़ शब्द अपने वर्तमान अर्थ में पुराणों में प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता। किंतु पवित्र नदी से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करने की परंपरा का वर्णन अनेक पुराणों में स्पष्ट रूप से मिलता है। वर्तमान कांवड़ यात्रा उसी प्राचीन शिवाभिषेक परंपरा का आधुनिक स्वरूप मानी जाती है। अर्थात् कांवड़ यात्रा का भाव पुराण सम्मत है, जबकि कांवड़ शब्द अपेक्षाकृत उत्तरकालीन लोक प्रचलित नाम है। कंवार शब्द की व्युत्पत्ति, जिसका अर्थ कंधा है।
कांवड़ में दूर-दूर से पवित्र नदियों, खासकर गंगा का जल भरकर लाते हैं। इसे पैदल यात्रा करते हुए शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। इस संकल्प यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण होता है कांवड़ को अपने कंधे पर उठाकर ले जाना। यह कोई साधारण परंपरा नहीं है। इसके पीछे गहराई से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं छुपी हुई हैं।
कांवड़ यात्रा का जिक्र किसी पौराणिक ग्रंथ में सीधे तौर पर नहीं मिलता है। इसका भी स्पष्ट रूप से कोई जिक्र नहीं है कि किसने पहली बार कांवड़ यात्रा शुरू की थी, लेकिन लोक व्यवहार में महाबली रावण, महाविष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम, अगस्त्य ऋषि, महर्षि मार्कंडेय, महारथी कर्ण और 61 नयनार संतों में से एक संत कनप्पा जैसे कई नाम शामिल हैं, जिन्होंने महादेव शिव को बड़ी सरल-सहज और आसान विधि से पूजन कर प्रसन्न किया था। रावण और भगवान परशुराम द्वारा तो शिवजी के लिए कांवड़ लाकर भी उनका जलाभिषेक करने का प्रसंग लोक कथाओं में मिलता है, हालांकि पुराणों में हर जगह इनके द्वारा की गई विधिवत पूजा का ही वर्णन मिलता है, जिसमें पंचोपचार पूजन से लेकर, षोडशोपचार पूजन तक का वर्णन मिलता है, फिर भी कांवड़ द्वारा जल लाकर शिवजी के अभिषेक का वर्णन नहीं मिलता है।
हालांकि कांवड़ शब्द का जिक्र रामायण में मिलता है। जहां राजा दशरथ द्वारा गलती से श्रवण कुमार की हत्या हो जाती है। इस प्रसंग में जब श्रवण कुमार के चरित्र का वर्णन आता है तब कांवड़ का जिक्र होता है। जहां पता चलता है कि श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर उन्हें तीर्थ यात्रा पर ले जाता है। कांवड़ असल में तराजू जैसी आकृति का एक नमूना होता है। श्रवण ने अपने माता-पिता को दोनों ओर बिठा लिया और कांवड़ कंधे पर रखकर चला।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तीर्थ क्षेत्र में दशानन रावण से जुड़ी कई लोक कथाएं प्रचलित हैं। यहां नोएडा के पास बिसरख गांव को रावण की जन्मस्थली बताया जाता है। मेरठ को मयराष्ट्र बताते हुए उसे रावण की ससुराल बताया जाता है। यहीं, बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां पर खुद रावण ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर शिवजी का जलाभिषेक किया था, जबकि रावण से भी सैकड़ों वर्ष पहले भगवान परशुराम ने इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी और 108 कलश से उनका अभिषेक किया था।
स्कंद पुराण में शिव उपासना के लिए रामोपाख्यान सर्ग में एक जिक्र आता है, जहां शिवगण नंदी और रावण की बातचीत होती है। इस स्थान पर नंदी कहते हैं कि जो प्राणी जलाशय से शिवालय तक पैदल ही गमन करता है और फिर जल ले जाकर शिवालय को धोकर साफ करता है, वह बिना किसी विधान की पूजा के शिवलोक को प्राप्त कर लेता है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि स्कंद पुराण में कांवड़ यात्रा का जिक्र नहीं है लेकिन ये जरूर लिखा है कि 'जलाशय से जल लेकर शिवालय तक की यात्रा'- संभवतः आगे चलकर यही व्याख्या कांवड़ यात्रा के संदर्भ में ली गई होगी।
हालांकि कांवड़ यात्रा विशुद्ध ग्रामीण परंपरा है और इसकी शुरुआत इधर के आधुनिक काल में ही कभी हुई हो, इसकी अधिक संभावना हो सकती है। शिवजी की कावड़ यात्रा का जिक्र पुराणों में मिले न मिले, किसी रावण ने कांवड़ पहले चढ़ाई हो या नहीं, शिवभक्तों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनके लिए तो बस इतनी सी बात है, वे शिव के हैं और शिव उनके हैं। वहीं, कांवड़ के व्युत्पत्तिपरक जो अर्थ किए गए हैं, उनमें एक के अनुसार ‘क’ अक्षर अग्नि को द्योतक है और ‘आवर’ का अर्थ ठीक से वरण करना। प्रार्थना यह है कि अग्नि अर्थात स्रष्टा, पालक एवं संहारकर्ता परमात्मा हमारा मार्गदर्शक बने और वही हमारे जीवन का लक्ष्य हो तथा हम अपने राष्ट्र और समाज को अपनी शक्ति से सक्षम बनाएं।
गंगाजल, पारद, पाषाण, धतूराफल आदि सबमें शिव सत्ता मानी गई है। अतः सब प्राणियों, जड़-जंगम पदार्थों में स्वयं भूतनाथ पशुपतिनाथ की सुगमता और सुलभता ही तो आपको देवाधिदेव महादेव सिद्ध करती है। कांवड़ शिव के उन सभी रूपों को नमन है। कंधे पर गंगा को धारण किए श्रद्धालु इसी आस्था और विश्वास को जीते हैं। यों भी कह सकते हैं कि कांवड़ यात्रा शिव के कल्याणकारी रूप और निष्ठा के नीर से उसके अभिषेक को तीव्र रूप में प्रतिध्वनित करती है।
वास्तव में, कांवड़ यात्रा का यह धार्मिक उत्सव न केवल आस्था का प्रतीक है बल्कि यह भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण धरोहर भी है। कांवड़िये इस यात्रा के माध्यम से न केवल अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते हैं बल्कि यह यात्रा उन्हें एकजुटता और भाईचारे का भी अनुभव कराती है। इस दौरान भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है, जो भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता को दर्शाता है। सही मायनों में, कांवड़ यात्रा भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में निहित सिद्धांतों की पुनर्स्थापना है। कांवड़ यात्रा सिर्फ एक यात्रा नहीं है, ये महादेव को शीतल जल अर्पित करने की परंपरा है, ये लोक-उत्सव है, समानता का सन्देश है क्योंकि चारों तरफ भगवा ही भगवा दिखता है जो सनातन संस्कृति का प्रतीक है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

