जल बचाने की मुहिम में जनभागीदारी जरूरी
- डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत में पानी की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। कई इलाकों में भूजल स्तर नीचे जा रहा है, तालाब और कुएं सूख रहे हैं तथा खेती और पीने के पानी के लिए भूजल पर निर्भरता बढ़ रही है। ऐसे समय में पानी बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं हो सकती। इसमें आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। इसी सोच के साथ ‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान शुरू किया गया है।
6 सितंबर 2024 को शुरू किए गए इस अभियान का मुख्य उद्देश्य बारिश के पानी को बचाना, भूजल स्तर बढ़ाना और स्थानीय स्तर पर पानी के स्रोतों को मजबूत करना है। इसके तहत कम खर्च में जल संरक्षण की संरचनाएं बनाने, पुराने और बंद पड़े नलकूपों को फिर से उपयोगी बनाने तथा स्थानीय जरूरत के अनुसार जल संरक्षण के उपाय करने पर जोर दिया जा रहा है।
इस अभियान की खास बात यह है कि इसमें सरकार के साथ आम जनता, पंचायतें, सामाजिक संगठन और कंपनियां भी जुड़ सकती हैं। इसका आधार तीन ‘सी’ हैं- समुदाय, कंपनियों का सामाजिक दायित्व और लागत। यानी समुदाय की भागीदारी, कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी और कम खर्च में जल संरक्षण। इससे जल संरक्षण को केवल सरकारी योजना न बनाकर जन-अभियान बनाने की कोशिश की जा रही है।
इस दिशा में बड़ी संख्या में जल संरक्षण संरचनाएं बनाई गई हैं। पहले चरण के तहत मई 2025 तक देश में 27 लाख से अधिक जल संरक्षण संरचनाएं बनाई गईं। इसके बाद जून 2025 में दूसरा चरण शुरू किया गया। मई 2026 तक डेढ़ करोड़ से अधिक भूजल पुनर्भरण संरचनाएं बनाई जा चुकी थीं। 3 सितंबर 2026 तक यह संख्या एक करोड़ 58 लाख से अधिक हो गई। यह आंकड़ा बताता है कि देश में जल संरक्षण को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया जा रहा है।
केवल संरचनाएं बना देना काफी नहीं है। उनका सही स्थान पर बनना, नियमित रखरखाव और सही उपयोग भी जरूरी है। यदि बारिश का पानी इन संरचनाओं तक पहुंचे ही नहीं या कुछ वर्षों बाद वे मिट्टी और कचरे से भर जाएं तो उनका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसलिए स्थानीय लोगों को इनके रखरखाव की जिम्मेदारी भी लेनी होगी।
भारत में पानी बचाने की परंपरा पहले से रही है। गांवों में तालाब, कुएं, बावड़ियां, जोहड़ और छोटे बांध लोगों की जरूरत पूरी करते थे। हरियाणा और राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में आज भी पुराने जल स्रोत इसकी याद दिलाते हैं। आधुनिक विकास के दौरान हमने इन स्रोतों की उपेक्षा की और भूजल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल शुरू कर दिया। अब समय है कि पुरानी समझ को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ा जाए।
इसी उद्देश्य से जल संचय जन भागीदारी को ‘वर्षा जल संचयन’ अभियान से भी जोड़ा गया है। जून 2026 में इसे ‘जल शक्ति अभियान—वर्षा जल संचयन’ के साथ मिलाकर नया रूप दिया गया। इसका सीधा संदेश है- बारिश की हर बूंद को व्यर्थ बहने से रोकना और उसे जमीन में पहुंचाना।
जल संकट का एक बड़ा कारण खेती में पानी का अधिक इस्तेमाल भी है। कई किसान ऐसी फसलें उगाते हैं जिनमें बहुत अधिक पानी लगता है। भूजल निकालने के लिए लगातार नलकूप चलाए जाते हैं। इससे जमीन के नीचे का पानी तेजी से कम होता है। इसलिए पानी बचाने के लिए फसल विविधता, बूंद-बूंद सिंचाई, फुहार सिंचाई और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना जरूरी है।
जल संरक्षण में ग्राम पंचायतों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। हर गांव अपना ‘जल बजट’ तैयार कर सकता है। इसमें यह देखा जाए कि गांव में सालभर में कितना पानी आता है, कितना पानी खेती और घरों में खर्च होता है और कितना पानी जमीन में वापस पहुंचाया जा सकता है। इससे लोगों को अपने क्षेत्र में पानी की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी।
विद्यालय और महाविद्यालय भी इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। बच्चों को केवल किताबों में जल संरक्षण पढ़ाने के बजाय विद्यालय परिसर में वर्षाजल संचयन, पौधारोपण और पानी की बचत की व्यवस्था करनी चाहिए। बच्चों के माध्यम से पानी बचाने का संदेश घरों तक भी पहुंच सकता है।
1 और 2 सितंबर 2026 को हुए जल शक्ति मंत्रालय के विभागीय सम्मेलन में भी केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर दिया गया। जल संरक्षण के साथ जल जागरूकता, प्रशिक्षण, राज्यों के बीच अनुभव साझा करने और पानी से जुड़े सही आंकड़े तैयार करने की जरूरत पर भी चर्चा हुई। यह जरूरी है, क्योंकि पानी की समस्या हर राज्य और हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं है। कहीं बाढ़ की समस्या है तो कहीं सूखे की।
जल संरक्षण को सफल बनाने के लिए सबसे जरूरी है कि लोगों की सोच बदले। नल खुला छोड़ना, बारिश के पानी को नालियों में बहने देना, तालाबों पर कब्जा करना और भूजल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करना बंद करना होगा। पानी को असीमित संसाधन मानने की सोच बदलनी होगी।
जल संचय जन भागीदारी की असली सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितनी संरचनाएं बनाई गईं। सफलता तब होगी जब तालाबों में पानी लौटे, भूजल स्तर सुधरे, किसानों की पानी पर निर्भरता कम हो और आम लोग पानी बचाने को अपनी जिम्मेदारी समझें।
भारत में जल सुरक्षा केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। सरकार दिशा और संसाधन दे सकती है, लेकिन पानी बचाने की आदत समाज को खुद विकसित करनी होगी। हर बूंद बचाना, हर जल स्रोत को बचाना और हर व्यक्ति को जल संरक्षण से जोड़ना ही भविष्य के सुरक्षित भारत की जरूरत है।
(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

