कश्मीर के विलय और पूर्ण एकीकरण में रा स्व संघ की भूमिका
डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसके वैचारिक सहयोगियों ने कश्मीर के पूर्ण एकीकरण से जुड़ी राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण और स्थायी भूमिका निभाई, जिसे अक्सर पर्याप्त मान्यता नहीं मिली। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह कठिन स्थिति में थे। एक कट्टर और देशभक्त हिंदू होने के नाते वे पाकिस्तान में शामिल होने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे लेकिन राज्य में मुस्लिम आबादी की बड़ी संख्या ने उन्हें असमंजस में डाल दिया था। जून 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन ने महाराजा को पाकिस्तान चुनने के लिए मनाने के उद्देश्य से कश्मीर का दौरा किया लेकिन महाराजा ने इस दबाव को ठुकरा दिया। उस समय कश्मीर के प्रधानमंत्री रहे आर.सी. काक ने महाराजा को स्वतंत्र बने रहने की सलाह दी। इस जटिल स्थिति के बीच संघ ने महाराजा का समर्थन किया और उनके राज्य के भारत में विलय की वकालत की।
संघ ने 1940 के दशक में जम्मू-कश्मीर में अपना काम शुरू किया। दिवंगत प्रो. बलराज मधोक के नेतृत्व और पं. प्रेमनाथ डोगरा के मार्गदर्शन में संगठन ने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाया। जब महाराजा पर पाकिस्तान की ओर से विलय के लिए दबाव बढ़ता गया तो उनके सामने तीन विकल्प थे: पाकिस्तान में शामिल होना, भारतीय संघ में विलय करना या स्वतंत्र बने रहना। वे पाकिस्तान में शामिल होने के तो खिलाफ थे ही लेकिन पं. नेहरू द्वारा शेख अब्दुल्ला को दिए जा रहे समर्थन को लेकर वे भारतीय संघ में शामिल होने को लेकर भी आशंकित थे। वहीं, स्वतंत्र बने रहना भी जोखिम भरा हो सकता था क्योंकि इससे पाकिस्तान के हमले का खतरा था और पर्याप्त सुरक्षा न होने के कारण यह एक खतरनाक विकल्प साबित हो सकता था।
इस दौरान, महाराजा हरि सिंह ने सरदार पटेल के करीबी मेहरचंद महाजन को अपना नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया। महाजन, जिनके जम्मू-कश्मीर में आरएसएस प्रचारक प्रो. बलराज मधोक के साथ अच्छे संबंध थे, ने महाराजा को विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इसमें पाकिस्तान या भारत में शामिल होने के फायदे और नुकसान तथा स्वतंत्र बने रहने के विकल्प के बारे में बताया गया था। मधोक ने महाराजा को आरएसएस की ओर से पूरा समर्थन देने का भी वादा किया।
उसी समय, तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने महाराजा पर पाकिस्तान के साथ विलय का प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए दबाव डाला लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया। इस बीच, पाकिस्तानी अधिकारी अपनी सेना की मदद से कबायलियों के समूहों के जरिए कश्मीर पर हमला करने की योजना बना रहे थे, जिससे महाराजा के लिए फैसला लेना और भी मुश्किल हो गया।
अपने दरबारियों, सहयोगियों और मंत्रिपरिषद के सदस्यों के बढ़ते दबाव के बीच- जो कश्मीर के भारत में विलय की वकालत कर रहे थे- सरदार पटेल और महात्मा गांधी दोनों ने महाराजा को मनाने की कोशिश की लेकिन महाराजा अपनी बात पर अड़े रहे और नेहरू के प्रभाव में आने को तैयार नहीं थे।
दूसरी ओर, पाकिस्तानी सेना कश्मीर की सीमाओं तक पहुँच गई थी, जिससे स्थिति और भी जटिल हो गई। राजनीतिक बातचीत विफल होने पर सरदार पटेल ने मेहरचंद महाजन के जरिए आरएसएस के सरसंघचालक एम. एस. गोलवलकर को एक संदेश भेजा। इसमें उनसे आग्रह किया गया कि वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके महाराजा को भारत में शामिल होने के लिए प्रेरित करें।
गोलवलकर जी, जिन्हें प्यार से 'गुरुजी' कहा जाता था, ने एक संवेदनशील मुद्दे पर बात करने के लिए अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए और तुरंत नागपुर से दिल्ली होते हुए श्रीनगर के लिए उड़ान भरी। मेहरचंद महाजन और पंडित प्रेमनाथ डोगरा की मदद से गुरुजी और महाराजा हरि सिंह के बीच बैठक तय की गई। उस समय पंजाब और जम्मू-कश्मीर के प्रांत प्रचारक रहे स्वर्गीय माधवराव मुले ने बताया कि गोलवलकर गुरुजी, महाराजा को भारत में विलय (एक्सेशन) पर विचार करने के लिए मनाने में सफल रहे। इसके बाद, महाराजा ने भारत में विलय का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया, जबकि गुरुजी ने जम्मू-कश्मीर में आरएसएस (आरएसएस) कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए पूरी तरह समर्पित रहें। ये निर्देश देने के बाद, वे दिल्ली लौट आए।
मुले ने अपनी पुस्तक श्री गुरुजी समग्र दर्शन में इस महत्वपूर्ण घटना का विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने यह भी बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री सरदार पटेल ने मेहरचंद महाजन से कहा था कि वे गुरुजी से बात करें ताकि महाराजा हरि सिंह को राज्य के भारत में विलय के लिए तैयार किया जा सके। महाजन ने यह संदेश गुरुजी तक पहुँचाया, जिसके परिणामस्वरूप उनकी बैठक आयोजित हुई।
गुरुजी 17 अक्टूबर 1947 को दिल्ली से विमान द्वारा श्रीनगर पहुँचे और अगली सुबह, 18 अक्टूबर को बैठक हुई। इस बैठक में राजकुमार करण सिंह भी मौजूद थे, जो पैर में फ्रैक्चर के कारण प्लास्टर बंधे होने की वजह से बिस्तर पर लेटे हुए थे।
महाराजा ने अपना यह विचार व्यक्त किया कि उनका राज्य पूरी तरह से पाकिस्तान पर निर्भर है। उन्होंने कहा, सभी रास्ते सियालकोट और रावलपिंडी से होकर गुजरते हैं। लाहौर मेरा हवाई अड्डा है। ऐसे में मैं भारत के साथ संबंध कैसे रख सकता हूँ? गुरुजी ने उन्हें याद दिलाते हुए कहा, आप एक हिंदू राजा हैं। पाकिस्तान के साथ जुड़ने पर आपकी हिंदू प्रजा को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। भले ही अभी कोई रास्ता मौजूद न हो लेकिन उन्हें जल्दी ही बहाल किया जा सकता है। भारत में विलय करना आपके और जम्मू-कश्मीर, दोनों के हित में होगा। प्रधानमंत्री महाजन ने भी गुरुजी की बात का समर्थन किया और भारत में विलय की आवश्यकता पर जोर दिया। अपनी मुलाकात के अंत में, महाराजा ने गुरुजी को एक 'तोसा' (उच्च गुणवत्ता वाला पश्मीना शॉल) भेंट किया और भारत में शामिल होने की अपनी इच्छा जताई। आठ दिन बाद, महाराजा ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिससे जम्मू-कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग बन गया।
उस समय संघ के सरसंघचालक रहे गोलवलकर गुरुजी ने महाराजा को मनाने और इस विलय को संभव बनाने में अहम भूमिका निभाई। हालाँकि, इतिहास में इस महत्वपूर्ण घटना को काफी हद तक अनदेखा कर दिया गया है, जिस कारण यह लोगों की यादों से मिट गई है। जो लोग स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका पर सवाल उठाते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि संघ के प्रयासों की बदौलत ही आज जम्मू-कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग बना हुआ है। पाकिस्तान समर्थित कबायलियों के हमले के दौरान संघ स्वयंसेवकों ने भारतीय सेना की मदद के लिए भारी बलिदान दिए; इन्हीं प्रयासों की वजह से जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे में जाने से बचाया जा सका।
अक्टूबर 1947 में अशांति के दौर में जम्मू में संघ स्वयंसेवकों और स्थानीय राष्ट्रवादी स्वयंसेवकों ने नागरिक प्रशासन की मदद करने, आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने और पाकिस्तानी कबीलाई हमलों के कारण विस्थापित हुए शरणार्थियों की सहायता करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रजा परिषद आंदोलन (1952–1953): पंडित प्रेम नाथ डोगरा जैसे नेताओं के नेतृत्व में और संघ तथा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के 'भारतीय जनसंघ' के वैचारिक समर्थन से जम्मू प्रजा परिषद ने 'परमिट प्रणाली' और जम्मू-कश्मीर के लिए 'दो झंडे/दो संविधान' वाली व्यवस्था के खिलाफ जोरदार आंदोलन चलाया।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सर्वोच्च बलिदान: 1953 में श्रीनगर की जेल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की गिरफ्तारी और रहस्यमय मौत- जो उस समय 'परमिट नियम' (नारा: एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान- नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे) का विरोध कर रहे थे, ने पूरे देश में एक नई भावना जगाई। इसने राष्ट्रवादी एजेंडे के तहत कश्मीर के पूर्ण विलय की मांग को और अधिक मजबूत कर दिया।
1990 के दशक में आतंकवाद के चरम दौर के दौरान संघ से जुड़े संगठनों- जैसे सहकार भारती, सेवा भारती और विभिन्न शैक्षिक ट्रस्टों ने घाटी से विस्थापित हुए कश्मीरी हिंदू शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। साथ ही, उन्होंने जम्मू क्षेत्र में राष्ट्रवादी एकता की भावना को भी बढ़ावा दिया।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

