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समष्टि चित्त का उल्लास

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समष्टि चित्त का उल्लास


होली (4 मार्च) पर विशेष

गिरीश्वर मिश्र

मनुष्य जीवन का अस्तित्व, पोषण और उत्थान पारस्परिक संबंधों के बीच ही संभव है। यह तथ्य सर्वविदित है किंतु आज के सामाजिक जीवन में अकेले व्यक्ति के अपने अहंकार का अभिमान इतना प्रचंड होता जा रहा है कि वह सबकुछ भूल कर उसके विस्तार के लिए किसी भी तरह की हिंसा का सहारा लेने से नहीं चूकता। वह सिसृक्षा के मूल आशय को भी भूल जाता है।

यह विश्वात्मा की एक से अनेक होने- एकोहं बहुस्याम्- की उद्दाम आकांक्षा ही थी जो सृष्टि में सृजन का व्याज बनी। कहते हैं अन्य को रच कर विश्वात्मा ने उस रचना में स्वयं उपस्थित होकर उसे अनन्य बना दिया। आज भी दूसरों के साथ जुड़ाव जीवन के स्पंदन का आधार बना हुआ है। प्रगाढ़ रिश्तों की उदार विशालता से व्यक्ति, समुदाय और देश सकारात्मक रूप से सक्रिय होते हैं और उसके अभाव में बिखर कर टूट जाते हैं। इस सत्य को भारतीय समाज ने बहुत पहले आत्मसात् किया था और संगच्छध्वम् संवधध्वम् संवो मनांसि जानताम् का उद्घोष किया था। इस भाव को अपने जीवन में उतारने के लिए वर्षभर अनेक उत्सवों और पर्वों की संकल्पना की गई जिसमें व्यक्ति अपने सीमित स्व से ऊपर उठकर अपने को सबमें और सबको अपने में देखने की चेष्टा करता है। ऐसा करते हुए मनुष्य न केवल समाज बल्कि प्रकृति के साथ भी एकाकार होने की संभावना को तलाशता रहता है। इसी में आनंद मिलता है जो जीवन का प्रयोजन है।

होली का उत्सव इसी लौकिक तलाश का मूर्त रूप है। होली वसंत में मनाई जाती है जब पूरी सृष्टि में एक साथ उल्लास के बीज का विस्फोट दिखता है। प्रसिद्धि है कि नया रमणीय होता है इसलिए सबके मन को भाता है। नए के लिए मन में उत्सुकता और उमंग होती है। अज्ञात और अनागत का आकर्षण वसंत के आगमन में चतुर्दिक दिखता है। उत्साह के साथ होली में एक क़िस्म का उन्माद का भाव आता है जब हम अपने को भुला कर आनंद का अनुभव करते हैं। प्रकृति में परिवर्तन का संदेश राग और अनुराग के कोमल भावों को जीवित करता है। वह यही कहता है कि सालभर जिन सफलताओं और विफलताओं का मीठा कड़वा अनुभव करते रहे हैं उन सबसे आगे बढ़कर या परे जाकर जीवन क्रम के नाटक का नया अंक शुरू करें। होली का उत्सव पुराने का आतंक भूल नए चित्र कैनवस पर उकेरने की पुकार लगाता है।

भारत में ऋतुराज वसंत इस दृष्टि से अनोखा और समृद्ध होता है कि इसके आगमन के साथ ठंड को किनारे कर प्रकृति अपने सौंदर्य की ऊष्मा का सारा संचित खजाना लुटाने के लिए व्यग्र हो उठती है। वसंत के निजी दूत बने पशु-पक्षी गाकर, तरु, लता, गुल्म, और पादप नव किसलय और पुष्प के साथ सज-धज कर बड़ी मुस्तैदी से इस मस्ती भरी असीम व्यग्रता का डंका बजाते हैं। नवलता वसंत में उमग पड़ती है- नवल कुसुम नव पल्लव साखा, कूजत नवल मधुर पिक कीर। वायुमंडल में भी बदलाव आता है और फागुन की मदमाती बयार हर किसी के चित्त को उन्मथित किए देती है। यह सब कमोबेश एक व्यवस्थित क्रम में कालचक्र की निश्चित गति से आयोजित होता है। कुल मिला कर प्रकृति इस बीच कोमल और आकर्षक नया परिधान धारण कर सजती है। खेतों और बाग-बगीचों में विभिन्न रंगों की अद्भुत चित्रकारी देखते बनती है। बिना किसी व्यतिक्रम के सहज स्वाभाविक संगति में ये विविधता भरा जादुई परिवर्तन नया आकर्षक और उत्साहवर्धक परिदृश्य रच देता है।

संक्रामक वसंत सार्वभौमिक-सा है, कुछ उसी तरह जैसे जीवन विस्तार में यौवन की अवस्था स्वाभाविक रूप से आती है। इसी समय बुलबुल और कोयल की मीठी बोली भी आमंत्रण देती है। प्रवासी पक्षी भी इस बीच हजारों मिल दूर साइबेरिया तक से चले आते हैं। वसंत की दस्तक के साथ आंतरिक और बाह्य अस्तित्व में बदलाव की श्रृंखला शुरू होती है। इसकी अभिव्यक्ति विभिन्न देशों में अनेक किस्म के त्योहारों और अभिव्यक्तियों में होती हैं। वसंत भारत में रंगों की निराली छटा में दिखता है। वायुमंडल में तमाल, महुआ, नीम और पलाश आदि विभिन्न वृक्षों की गंध आगे पीछे आती है। आम में बौर आने लगते हैं। रसिया और गणगौर के गीत में वसंत की ही गूंज होती है।

ऊधमी वसंत के साथ झाँझ, मृदंग, ढोल और मजीरा के साथ फाग की उमंग अनूठी होती है। वसंतोत्सव सालभर मनाए जाने वाले विभिन्न उत्सवों का सिरमौर है। कहते हैं काम का सेनापति है वसंत। आता है और थोड़े समय में ही ओझल हो जाता है। यह सचमुच में एक लोक उत्सव है-लोक यानी वह जगत जिसमें सभी शामिल होते हैं। मनुष्य और प्रकृति सभी इस लोक के अंश और भागीदार होते हैं। वृक्ष और जंगल सृष्टि के नयेपन के संकल्प को जीवित रखते हैं। होली के साथ भारतीय नया वर्ष और संवत्सर का आरम्भ भी होता है। यह जीवन के नए ऋतुचक्र की शुरुआत होती है। फागुन के बाद चैत के महीने में आम के बौर में कैरियाँ आती हैं मानों उत्कंठा के बाद तृप्ति का आस्वाद आता है। प्रिय पास न हों तो यह वसंत बड़ा दुःख देता है, मन बिलखता-छटपटाता है। साहित्य की चेतना में दर्द, आकुलता, विरह, प्रेमातिशय, उन्माद और माधुर्य की प्रखर अनुभूतियों के साथ वासंती कविताएँ रची गई हैं। फाग और मधुर चैती के गीतों में साथ ले चलने की पुकार तीव्र होती है।

रंगों के इस त्योहार ब्रज क्षेत्र में वृंदावन और बरसाने की होली का सौंदर्य गौर वर्ण की श्रीराधा और श्याम वर्ण घनश्याम श्रीकृष्ण की स्मृति और अनुभूति से सराबोर होती है। आनंद की उन्मुक्त अभिव्यक्ति ब्रज की रागिनी में छायी रहती है। यहाँ के लोकगीतों में यह सहज अभिव्यक्ति कुछ इस तरह जीवंत होती है :

आज बिरज में होरी रे रसिया।

इत ते आए कुँअर कन्हैया , उत ते राधा गोरी रे रसिया।

कौन के हाथ कनक पिचकारी, कौन के हाथ कमोरी रे रसिया।

कृष्ण के हाथ कनक पिचकारी, राधा के हाथ कमोरी रे रसिया।

उड़त गुलाल लाल भए बादल, मारत भर-भर झोरी रे सखिया।

अबीर गुलाल के बादल छाये, धूम मचाई रे सब मिल सखिया।

चंद्रसखी भज बाल कृष्ण छवि, चीर जीवो यह जोड़ी रे रसिया।

होली की पिछली रात होलिका दहन होता है और सम्मत जलाई जाती है। जो घट चुका उससे आगे बढ़ने का साहस देता नया संवत्सर आरम्भ होता है। होली सामूहिक उल्लास की ताज़गी के साथ व्यष्टि को समष्टि बनाने वाला अवसर है। इस सांस्कृतिक आयोजन पर अब बाजार हावी होता जा रहा है और उत्कंठा और संवेदना के लिए जगह कम होती जा रही है। फिर भी होली अभी भी उद्घोष करती है कि वास्तविक आनंद दूसरे को सुखी करने में ही होता है। परस्पर एक-दूसरे को भावित करने में ही कल्याण संभव है।

(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश