home page

भारत छोड़ो आंदोलन की अमिट गाथा

 | 
भारत छोड़ो आंदोलन की अमिट गाथा


भारत छोड़ो आंदोलन दिवस (8 अगस्त) पर विशेष

- योगेश कुमार गोयल

भारत छोड़ो आंदोलन, जिसे ‘अगस्त क्रांति’ के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसे निर्णायक मोड़ का प्रतीक है, जिसने अंग्रेजी शासन की नींव को गहराई से हिला दिया था। यह केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था बल्कि भारतीय जनमानस की स्वतंत्रता के प्रति अटूट इच्छा, आत्मबल और त्याग की पराकाष्ठा का सशक्त उदाहरण था। हर वर्ष 8 अगस्त को ‘भारत छोड़ो आंदोलन दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जो हमें उस ऐतिहासिक संघर्ष की याद दिलाता है, जब पूरा देश एक स्वर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़ा हो गया था।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत की राजनीतिक स्थिति अत्यंत जटिल हो गई थी। ब्रिटिश सरकार ने भारत को बिना उसकी सहमति के युद्ध में झोंक दिया था, जिससे भारतीय नेताओं और जनता में व्यापक असंतोष फैल गया। इसी बीच, 1942 में ‘क्रिप्स मिशन’ भारत आया, जिसने युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने का प्रस्ताव रखा लेकिन यह प्रस्ताव अस्पष्ट और अधूरा था। भारतीय नेताओं ने इसे अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें तत्काल स्वतंत्रता की कोई स्पष्ट गारंटी नहीं थी। इस असफलता ने आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की।

8 अगस्त 1942 को बॉम्बे (अब मुंबई) के गोवालिया टैंक मैदान, जिसे आज ‘अगस्त क्रांति मैदान’ के नाम से जाना जाता है, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ। इसी अधिवेशन में ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया गया। महात्मा गांधी ने इस अवसर पर अपने प्रसिद्ध ‘करो या मरो’ के नारे के साथ देशवासियों को स्वतंत्रता के लिए अंतिम संघर्ष के लिए प्रेरित किया। यह नारा केवल आह्वान नहीं था बल्कि यह उस समय के भारत के आत्मविश्वास और संकल्प का प्रतीक बन गया। इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह एक पूर्ण जन-आंदोलन बन गया था।

9 अगस्त 1942 की सुबह ही गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजों का उद्देश्य था कि नेतृत्व को खत्म कर आंदोलन को दबा दिया जाए लेकिन इसका उल्टा प्रभाव हुआ। नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन और अधिक उग्र और व्यापक हो गया। देश के विभिन्न हिस्सों में जनता स्वतः सड़कों पर उतर आई। छात्रों, मजदूरों, किसानों और महिलाओं ने बड़ी संख्या में इस आंदोलन में भाग लिया।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई स्थानों पर हिंसक घटनाएं भी हुई। रेलवे लाइनों को नुकसान पहुंचाया गया, टेलीफोन और तार सेवाएं बाधित की गई और सरकारी इमारतों पर हमले किए गए। हालांकि महात्मा गांधी का आंदोलन अहिंसात्मक था लेकिन जनता के भीतर दबी हुई आक्रोश की भावना कई स्थानों पर उग्र रूप में सामने आई। ब्रिटिश सरकार ने भी इस आंदोलन को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाए। पुलिस और सेना ने बल प्रयोग किया, हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई स्थानों पर गोलीबारी हुई, जिसमें सैंकड़ों लोग शहीद हो गए। इस आंदोलन में महिलाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। अरुणा आसफ अली, उषा मेहता, सुचेता कृपलानी जैसी अनेक महिलाओं ने न केवल आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई बल्कि नेतृत्व भी किया। उषा मेहता ने ‘कांग्रेस रेडियो’ के माध्यम से आंदोलन की जानकारी और संदेश पूरे देश में पहुंचाए। यह दर्शाता है कि यह आंदोलन केवल पुरुषों तक सीमित नहीं था बल्कि इसमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी थी।

भारत छोड़ो आंदोलन का महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि इसने ब्रिटिश शासन को अहसास करा दिया कि अब भारत पर शासन करना संभव नहीं है। यह आंदोलन भले तत्काल स्वतंत्रता नहीं दिला सका लेकिन इसने अंग्रेजों की प्रशासनिक और मानसिक पकड़ को कमजोर कर दिया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने यह समझ लिया कि भारत में उनका शासन लंबे समय तक टिक नहीं सकता। इस आंदोलन का प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी देखा गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन पहले ही आर्थिक और सैन्य दबाव में था। भारत में इस तरह के व्यापक जन-आंदोलन ने उसकी स्थिति को और कमजोर कर दिया। युद्ध के बाद जब ब्रिटेन की स्थिति और खराब हुई तो भारत को स्वतंत्रता देना उसके लिए एक अनिवार्यता बन गया।

भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे बड़ा योगदान यह था कि इसने भारतीय जनता को आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का पाठ पढ़ाया। इस आंदोलन ने यह सिद्ध कर दिया कि जब जनता एकजुट होकर किसी लक्ष्य के लिए खड़ी होती है तो सबसे शक्तिशाली साम्राज्य भी उसके सामने टिक नहीं सकता। यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम और निर्णायक चरण था, जिसने 1947 में मिली स्वतंत्रता की नींव को मजबूत किया।

आज जब हम ‘भारत छोड़ो आंदोलन दिवस’ मनाते हैं तो यह केवल इतिहास को याद करने का अवसर नहीं है बल्कि हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत भी है। यह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल एक अधिकार नहीं बल्कि उन अनगिनत बलिदानों का परिणाम है, जिन्हें हमें हमेशा संजोकर रखना चाहिए। वर्तमान समय में जब देश विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब इस आंदोलन की भावना (एकता, साहस और संकल्प) हमारे लिए मार्गदर्शक बन सकती है।

भारत छोड़ो आंदोलन केवल अतीत की एक घटना मात्र नहीं है बल्कि यह एक विचार, एक प्रेरणा है, जो हमें अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का बोध कराती है। ‘करो या मरो’ का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जो हमें अपने राष्ट्र के प्रति समर्पण और जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित करता है। यही इस ऐतिहासिक आंदोलन की सबसे बड़ी विरासत है, जिसे हमें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश