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लूट का कारोबार बनते प्राइवेट स्कूल

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लूट का कारोबार बनते प्राइवेट स्कूल


-डॉ. सत्यवान सौरभ

हर साल अप्रैल और मई का महीना आते ही देशभर के लाखों अभिभावकों के घरों में अदृश्य आर्थिक संकट शुरू हो जाता है। यह संकट किसी बीमारी, बेरोजगारी या प्राकृतिक आपदा का नहीं बल्कि बच्चों के नए शैक्षणिक सत्र का होता है। स्कूल खुलते ही फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, कॉपियाँ, ट्रांसपोर्ट और अलग-अलग अनिवार्य खर्चों की लंबी सूची अभिभावकों के हाथ में थमा दी जाती है। सबसे बड़ा झटका किताबों के नाम पर लगता है। जिन किताबों की वास्तविक कीमत 50 या 100 रुपये होती है, वे स्कूल द्वारा तय दुकानों पर कई गुना ज्यादा दरों में बेची जाती है। छोटे बच्चों की किताबों का पूरा सेट 7 से 8 हजार रुपये तक पहुँच जाता है। मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए यह सीधी आर्थिक लूट से कम नहीं।

विडंबना यह है कि शिक्षा को अधिकार और सेवा कहा जाता है लेकिन निजी स्कूलों ने इसे खुले बाजार का व्यापार बना दिया है। आज शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना कम और मुनाफा कमाना ज्यादा दिखाई देता है। किताबों के नाम पर जो खेल चल रहा है, वह केवल अभिभावकों की जेब काटने का मामला नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था की नैतिक गिरावट का भी बड़ा उदाहरण है।

देश में एनसीईआरटी की किताबें उपलब्ध हैं, जो सस्ती भी हैं और राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त भी। सरकार स्वयं समय-समय पर एनसीईआरटी पाठ्यक्रम को लागू करने की बात करती है। फिर सवाल यह उठता है कि आखिर निजी स्कूल इन किताबों से परहेज क्यों करते हैं? इसका उत्तर सीधा है- कमीशन और मुनाफा। अनेक निजी स्कूल निजी प्रकाशकों के साथ समझौता कर लेते हैं। स्कूल अपने छात्रों पर उन्हीं प्रकाशकों की किताबें थोपते हैं और बदले में मोटा कमीशन प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि हर साल नए संस्करण और नए पैटर्न के नाम पर किताबें बदली जाती हैं ताकि पुरानी किताबें किसी और बच्चे के काम न आ सकें।

यह केवल आर्थिक शोषण नहीं बल्कि योजनाबद्ध व्यवसायिक मॉडल है। स्कूल, प्रकाशक और कुछ बुक डिपो मिलकर ऐसा नेटवर्क बना चुके हैं जिसमें अभिभावक केवल ग्राहक बनकर रह गया है। उसे मजबूर किया जाता है कि वह किताबें केवल स्कूल द्वारा निर्धारित दुकान से खरीदे। यदि कोई अभिभावक बाहर से वही किताबें लेने की कोशिश करे तो या तो किताबें उपलब्ध नहीं होतीं या फिर स्कूल के शिक्षक बच्चों पर दबाव बनाते हैं कि सही किताबें वही हैं जो स्कूल ने बताई हैं।

स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि कई परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं। एक मजदूर, किसान, छोटा दुकानदार या नौकरीपेशा व्यक्ति जब दो या तीन बच्चों के स्कूल खर्च का हिसाब लगाता है तो उसकी आधी कमाई केवल शिक्षा पर चली जाती है। फीस अलग, किताबें अलग, यूनिफॉर्म अलग और गतिविधियों के नाम पर अलग वसूली। यह कैसी शिक्षा व्यवस्था है जिसमें बच्चा स्कूल जाने से पहले ही परिवार पर आर्थिक बोझ बन जाता है?

सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरे खेल में सरकार और प्रशासन अक्सर मूकदर्शक बने रहते हैं। हर साल शिकायतें होती हैं, मीडिया में खबरें आती हैं, कुछ अधिकारी बयान देते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं बदलता। शिक्षा विभाग के नियम स्पष्ट हैं कि स्कूल किसी विशेष दुकान से किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। लेकिन वास्तविकता यह है कि नियम कागजों तक सीमित हैं और निजी स्कूलों की मनमानी लगातार बढ़ती जा रही है।

असल समस्या यह है कि शिक्षा अब सेवा नहीं, ब्रांड बन चुकी है। बड़े-बड़े निजी स्कूल खुद को “इंटरनेशनल”, “वर्ल्ड क्लास” और “स्मार्ट एजुकेशन” जैसे नामों से प्रचारित करते हैं। भव्य इमारतें, वातानुकूलित क्लास रूम व बसें और अंग्रेजी का आकर्षण दिखाकर अभिभावकों को प्रभावित किया जाता है। इस चमक-दमक के पीछे शिक्षा का असली उद्देश्य कहीं खो गया है। बच्चा कितना सीख रहा है, यह महत्वपूर्ण नहीं रह गया; महत्वपूर्ण यह हो गया है कि स्कूल कितनी कमाई कर रहा है।

विडंबना यह है कि जिन किताबों को महंगे दामों में बेचा जाता है, उनकी गुणवत्ता हमेशा बेहतर नहीं होती। कई निजी प्रकाशकों की किताबों में भाषा संबंधी गलतियाँ, अनावश्यक सामग्री और रटंत शिक्षा को बढ़ावा देने वाली सामग्री भरी होती है। दूसरी ओर एनसीईआरटी की किताबें विशेषज्ञों द्वारा तैयार की जाती हैं और उनकी कीमत बेहद कम होती है। इसके बावजूद निजी स्कूल उन्हें अपनाने से बचते हैं क्योंकि वहाँ से मोटा मुनाफा नहीं मिलता।

यह केवल किताबों तक सीमित समस्या नहीं है। यूनिफॉर्म का खेल भी कम खतरनाक नहीं। स्कूल हर साल यूनिफॉर्म का डिज़ाइन थोड़ा बदल देते हैं ताकि पुराने कपड़े दोबारा इस्तेमाल न हो सके। कुछ स्कूल केवल तय दुकानों से यूनिफॉर्म खरीदने का दबाव डालते हैं, जहाँ सामान्य कपड़े की कीमत कई गुना बढ़ा दी जाती है। जूते, बैग, बेल्ट, टाई और यहाँ तक कि कॉपियों तक पर स्कूलों की अनिवार्यता लागू होती है।

शिक्षा के इस बाजारीकरण ने सामाजिक असमानता को और गहरा कर दिया है। अमीर परिवार किसी तरह यह खर्च उठा लेते हैं लेकिन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह भारी मानसिक तनाव का कारण बनता है। कई बार माता-पिता अपनी जरूरतें काटकर बच्चों की फीस भरते हैं। कोई माँ अपने गहने गिरवी रखती है, कोई पिता अतिरिक्त मजदूरी करता है, कोई परिवार कर्ज में डूब जाता है। लेकिन शिक्षा माफिया के लिए यह सब केवल बिजनेस है।

प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा केवल अमीरों के लिए रह जाएगी? यदि यही स्थिति जारी रही तो भविष्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा गरीबों की पहुँच से पूरी तरह बाहर हो जाएगी। यह खतरनाक संकेत है। संविधान सभी बच्चों को समान शिक्षा का अधिकार देता है लेकिन निजी स्कूलों की मनमानी इस अधिकार को धीरे-धीरे खोखला कर रही है।

सरकार को अब केवल दिशा-निर्देश जारी करने से आगे बढ़ना होगा। सबसे पहले सभी स्कूलों में एनसीईआरटी किताबों को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। यदि अतिरिक्त सामग्री जरूरी हो तो उसकी कीमत और गुणवत्ता पर सरकार का नियंत्रण होना चाहिए। स्कूलों और निजी प्रकाशकों के बीच होने वाले आर्थिक समझौतों की जांच होनी चाहिए। जो स्कूल अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से किताबें खरीदने के लिए मजबूर करें, उन पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई होनी चाहिए।

इसके साथ ही जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग को नियमित निरीक्षण करने चाहिए। अभिभावकों की शिकायतों के लिए हेल्पलाइन और त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए। अक्सर अभिभावक डर के कारण खुलकर शिकायत नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कहीं स्कूल उनके बच्चे को मानसिक रूप से परेशान न करे। इसलिए सरकार को अभिभावकों की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करनी होगी।

समाज को भी इस मुद्दे पर जागरूक होना होगा। अभिभावकों को संगठित होकर अपनी आवाज उठानी होगी। जब तक लोग अलग-अलग डरते रहेंगे, तब तक स्कूलों की मनमानी चलती रहेगी। शिक्षा कोई लक्जरी वस्तु नहीं बल्कि मौलिक अधिकार है। इसे बाजार की वस्तु बनाना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।

आज जरूरत इस बात की है कि शिक्षा को फिर से सेवा बनाया जाए, व्यापार नहीं। स्कूलों का उद्देश्य बच्चों के भीतर ज्ञान, नैतिकता और सोच विकसित करना होना चाहिए, न कि अभिभावकों की जेब खाली करना। जिस देश में करोड़ों लोग आज भी गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे हों, वहाँ शिक्षा के नाम पर ऐसी लूट सामाजिक अपराध से कम नहीं। यह समझना होगा कि स्कूल ज्ञान के मंदिर हैं, बाजार नहीं। बच्चों की किताबें सीखने का माध्यम हैं, कमाई का साधन नहीं। जिस दिन शिक्षा व्यवस्था से लालच और कमीशन का यह खेल खत्म होगा, उसी दिन समाज सच मायनों में शिक्षित और संवेदनशील बन पाएगा।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश