थकी हुई वर्दी, टूटता हुआ मन
- डॉ. सत्यवान सौरभ
किसी भी देश की कानून-व्यवस्था का सबसे दृश्यमान चेहरा पुलिस होती है। जब कोई अपराध होता है, दुर्घटना घटती है, दंगा भड़कता है, प्राकृतिक आपदा आती है या किसी नागरिक को तत्काल सहायता की आवश्यकता होती है तो सबसे पहले पुलिस ही सामने दिखाई देती है। समाज उससे हर समय तत्पर, अनुशासित, निष्पक्ष और संवेदनशील रहने की अपेक्षा करता है। विडंबना यह है कि जो व्यवस्था पूरे समाज को सुरक्षा का भरोसा देती है, उसी व्यवस्था के भीतर काम करने वाले पुलिसकर्मियों की मानसिक सुरक्षा और भावनात्मक आवश्यकताओं पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है। बाहर से रोबदार दिखने वाली वर्दी के भीतर भी एक संवेदनशील मन धड़कता है, जो लगातार बढ़ते तनाव, कार्यभार, पारिवारिक दूरियों और संस्थागत दबावों के बीच धीरे-धीरे टूटता चला जाता है।
हाल ही में पुलिस इंस्पेक्टर श्रवण कुमार बिश्नोई की आत्महत्या की खबर ने पूरे समाज को स्तब्ध कर दिया। किसी भी आत्महत्या के पीछे के कारणों का अंतिम निर्धारण केवल आधिकारिक जांच से ही संभव है इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं होगा। फिर भी यह दुखद घटना पुलिस बल में मानसिक तनाव, कार्य संस्कृति और मनोवैज्ञानिक सहयोग की आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। यह केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं बल्कि उस व्यवस्था का आईना भी है, जहाँ कर्तव्य निभाते-निभाते कई बार इंसान स्वयं अपने भीतर हारने लगता है।
हमारे समाज में पुलिस की छवि अक्सर अधिकार, शक्ति और कठोरता से जुड़ी रही है। आम नागरिक मान लेते हैं कि पुलिसकर्मी भावनाओं से परे होते हैं, उन्हें दर्द नहीं होता, वे कभी नहीं टूटते। यही सबसे बड़ी भूल है। पुलिसकर्मी भी उसी समाज के सदस्य हैं। वे भी किसी के बेटे-बेटी, पति-पत्नी, माता-पिता और मित्र होते हैं। उन्हें भी अपनों की चिंता होती है, आर्थिक जिम्मेदारियाँ होती हैं, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ होती हैं और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है। अंतर केवल इतना है कि वे अपने दुख को अक्सर वर्दी के भीतर छिपाकर रखना सीख जाते हैं।
पुलिस सेवा का वास्तविक स्वरूप फिल्मों और धारावाहिकों से बिल्कुल अलग है। अधिकांश पुलिसकर्मियों का दिन कब शुरू होता है और कब समाप्त, इसका निश्चित समय नहीं होता। आठ घंटे की ड्यूटी का सिद्धांत व्यवहार में शायद ही कहीं पूरी तरह लागू दिखाई देता है। त्योहार हो, चुनाव हो, वीआईपी दौरे हों, धरना-प्रदर्शन हो, प्राकृतिक आपदाएँ हों या अपराध की गंभीर घटनाएँ- हर स्थिति में सबसे पहले पुलिस को तैनात किया जाता है। कई बार लगातार चौबीस-चौबीस घंटे तक ड्यूटी करनी पड़ती है। पर्याप्त नींद, नियमित भोजन और पारिवारिक समय उनके जीवन में विलासिता बन जाते हैं।
विश्व भर के मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि लगातार नींद की कमी, अत्यधिक कार्यभार और भावनात्मक तनाव किसी भी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। पुलिसकर्मी प्रतिदिन हत्या, आत्महत्या, सड़क दुर्घटना, घरेलू हिंसा, यौन अपराध और अन्य दर्दनाक घटनाओं का सामना करते हैं। सामान्य नागरिक जिन दृश्यों को केवल समाचारों में देखते हैं, पुलिस उन्हें प्रत्यक्ष रूप से झेलती है। ऐसे अनुभव धीरे-धीरे मन पर गहरे घाव छोड़ते हैं। यदि समय पर भावनात्मक सहयोग न मिले तो यही दबाव अवसाद, चिंता, चिड़चिड़ेपन और कई बार आत्मघाती विचारों तक पहुँच सकता है।
पुलिस व्यवस्था की आंतरिक संरचना भी कई बार तनाव को बढ़ा देती है। वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव, समयबद्ध परिणाम देने की अपेक्षा, राजनीतिक हस्तक्षेप, संसाधनों की कमी और निरंतर जवाबदेही अधीनस्थ कर्मचारियों के मानसिक बोझ को कई गुना बढ़ा देती है। अनुशासन किसी भी सुरक्षा बल की आवश्यकता है लेकिन अनुशासन और मानवीय संवेदनशीलता का संतुलन भी उतना ही आवश्यक है। यदि अधीनस्थ कर्मचारी अपनी समस्याएँ खुलकर साझा करने से डरने लगें तो तनाव भीतर ही भीतर विस्फोटक रूप ले सकता है।
पारिवारिक जीवन भी पुलिस सेवा की सबसे बड़ी कीमत चुकाता है। पुलिसकर्मी अपने बच्चों के साथ समय नहीं बिता पाते, माता-पिता की बीमारी में उपस्थित नहीं हो पाते और कई बार पारिवारिक समारोहों तक में शामिल नहीं हो पाते। लगातार अनुपस्थिति से परिवारों में भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है। कई पुलिसकर्मी अपने व्यक्तिगत तनाव को परिवार से छिपाते हैं ताकि घर वाले चिंतित न हों, जबकि परिवार अपनी समस्याएँ उनसे इसलिए नहीं कह पाता कि वे पहले ही बहुत तनाव में हैं। यह मौन धीरे-धीरे मानसिक अकेलेपन में बदल जाता है।
समाज भी इस समस्या को पूरी गंभीरता से नहीं समझता। जब पुलिस कोई गलती करती है तो आलोचना स्वाभाविक है। जवाबदेही लोकतंत्र का आवश्यक तत्व है। लेकिन हर पुलिसकर्मी को केवल कठोर, असंवेदनशील या भ्रष्ट मान लेना न्यायसंगत नहीं है। हजारों पुलिसकर्मी सीमित संसाधनों और अत्यधिक दबाव के बीच ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। वे भी सम्मान और संवेदनशील व्यवहार के अधिकारी हैं।
चिंताजनक बात यह है कि पुलिस बल में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुलापन आज भी पर्याप्त नहीं है। यदि कोई कर्मचारी मनोवैज्ञानिक सहायता लेना चाहता है तो कई बार उसे कमजोरी समझ लिया जाता है। परिणामस्वरूप अनेक लोग अपने भीतर की पीड़ा को वर्षों तक दबाए रखते हैं। वे मुस्कुराते हुए ड्यूटी करते हैं लेकिन भीतर से टूटते रहते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर चुप्पी किसी भी संस्था के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है।
अब समय केवल संवेदना व्यक्त करने का नहीं बल्कि ठोस सुधारों का है। सबसे पहले पुलिसकर्मियों के कार्य घंटे यथासंभव मानवीय बनाए जाने चाहिए। पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति कर कार्यभार का न्यायसंगत वितरण किया जाए। लगातार ड्यूटी के बाद अनिवार्य विश्राम सुनिश्चित हो। साप्ताहिक अवकाश और पारिवारिक समय केवल कागजों तक सीमित न रहें।
प्रत्येक जिले में पेशेवर मनोवैज्ञानिक परामर्श की व्यवस्था होनी चाहिए। गोपनीय काउंसलिंग, तनाव प्रबंधन कार्यक्रम, हेल्पलाइन और नियमित मानसिक स्वास्थ्य परीक्षण पुलिस व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बनाए जाने चाहिए। जैसे शारीरिक फिटनेस आवश्यक है, वैसे ही मानसिक फिटनेस भी पुलिस सेवा की अनिवार्य शर्त होनी चाहिए।
पुलिस नेतृत्व को भी अपनी कार्यशैली में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा। अच्छे नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं बल्कि अपने अधीनस्थों की परिस्थितियों को समझना भी है। यदि वरिष्ठ अधिकारी संवाद, सहयोग और विश्वास का वातावरण बनाएँ तो अनेक मानसिक संकट प्रारंभिक स्तर पर ही समाप्त हो सकते हैं।
तकनीकी सुधार भी तनाव कम करने में सहायक हो सकते हैं। डिजिटल रिकॉर्ड, आधुनिक संचार प्रणाली, पर्याप्त वाहन, बेहतर उपकरण और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सरलीकरण पुलिसकर्मियों के अनावश्यक बोझ को कम कर सकते हैं। जब कार्यकुशलता बढ़ेगी तो मानसिक दबाव भी घटेगा।
पुलिस परिवारों को भी सहायता तंत्र से जोड़ा जाना चाहिए। पारिवारिक परामर्श, सामुदायिक समर्थन समूह और नियमित संवाद कार्यक्रम पुलिसकर्मियों तथा उनके परिजनों को भावनात्मक सहारा प्रदान कर सकते हैं। एक मजबूत परिवार मानसिक तनाव के विरुद्ध सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच होता है।
मीडिया और समाज की भी बड़ी जिम्मेदारी है। पुलिस की कमियों को उजागर करना लोकतांत्रिक आवश्यकता है लेकिन उनकी मानवीय चुनौतियों को सामने लाना भी उतना ही आवश्यक है। संतुलित विमर्श समाज और पुलिस के बीच विश्वास को मजबूत करता है।
यह भी स्वीकार करना होगा कि मानसिक तनाव किसी व्यक्ति की कमजोरी नहीं बल्कि स्वास्थ्य संबंधी स्थिति है। जिस प्रकार बुखार या रक्तचाप का उपचार कराया जाता है, उसी प्रकार अवसाद, चिंता और भावनात्मक थकान का भी उपचार आवश्यक है। सहायता माँगना कमजोरी नहीं बल्कि साहस और जागरूकता का संकेत है।
श्रवण कुमार बिश्नोई जैसी घटनाएँ केवल समाचार बनकर न रह जाएँ। वे हमारे लिए चेतावनी बनें कि यदि हम अपने रक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा करेंगे तो इसकी कीमत केवल पुलिस विभाग ही नहीं, पूरा समाज चुकाएगा। एक मानसिक रूप से स्वस्थ पुलिस बल ही निष्पक्ष, संवेदनशील और प्रभावी कानून-व्यवस्था की आधारशिला बन सकता है।
वर्दी सम्मान का प्रतीक है लेकिन वह इंसान को मशीन नहीं बना देती। पुलिसकर्मी भी थकते हैं, निराश होते हैं, भावनात्मक सहारे की तलाश करते हैं और कभी-कभी भीतर से बिखर भी जाते हैं। इसलिए उन्हें केवल आदेश, अपेक्षाएँ और आलोचना ही नहीं बल्कि विश्वास, सम्मान, विश्राम और संवेदना भी मिलनी चाहिए।
किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वह अपने नागरिकों की कितनी सुरक्षा करता है बल्कि इससे भी होती है कि वह अपने रक्षकों का कितना ध्यान रखता है। यदि हम चाहते हैं कि पुलिस हर संकट में हमारे साथ मजबूती से खड़ी रहे तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी अपनी मानसिक दुनिया सुरक्षित, संतुलित और समर्थ बनी रहे। क्योंकि अंततः वर्दी के भीतर धड़कता हुआ दिल भी उसी इंसान का होता है, जो हमारे और हमारे समाज की सुरक्षा के लिए अपने सुख, अपने परिवार और कई बार अपना पूरा जीवन दाँव पर लगा देता है। ऐसी वर्दी को केवल सलाम नहीं बल्कि संवेदनशील व्यवस्था और मानवीय सम्मान भी मिलना चाहिए।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

