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दूरगामी सोच का परिणाम है प्रधानमंत्री की अपील

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दूरगामी सोच का परिणाम है प्रधानमंत्री की अपील


डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

ऐसा नहीं है कि भारत विदेशी मुद्रा मामले में संकट में हो बल्कि वास्तविकता यह है कि 10 अप्रैल, 2026 के आंकड़ों की ही बात करें तो भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार आज उच्चतम स्तर पर है। 700 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भण्डार भारत के पास है। एक अनुमान के अनुसार आगामी 11 माह से अधिक समय तक आयात मांग की पूर्ति इस राशि से आसानी से हो सकती है। विदेशी मुद्रा भण्डार से एफसीए यानी कि विदेशी मुद्रा संपत्ति, स्वर्ण भण्डार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में आरक्षित राशि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। इसके सबके बावजूद भविष्य के संभावित संकट के हालातों से निपटने की आवश्यक तैयारियां समय रहते पूरी की जाती है तो यही दूरदृष्टि कहलाती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भविष्य के वैश्विक हालात साफ दिखाई दे रहे हैं। इसमें सुधार की संभावना निकट भविष्य में दिखाई भी नहीं दे रही है। ऐसे में उन्होंने देशवासियों से केवल एक वर्ष के लिए अनावश्यक खर्चों में कटौती का आग्रह किया है। इसमें ईंधन बचाना, सोना नहीं खरीदने, विदेशी यात्राओं व विदेशों में शादी नहीं करने, खाने के तेल के उपयोग में 10 प्रतिशत तक की कटौती व खेती में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत तक की कटौती का सुझाव प्रमुख है। प्रधानमंत्री के देशवासियों से आग्रह को आलोचक भले मुद्दा बनाने का प्रयास करें पर वैश्विक हालात आज सबके सामने है।

देशवासियों को मालूम है कि पेट्रोलियम उत्पादों इनमें कच्चे तेल से लेकर गैस आदि शामिल है, उसके लिए आयात पर निर्भरता अधिक है। देश में 979 अरब अमेरिकी डॉलर का सालाना आयात होता है जिसमें करीब 38 प्रतिशत आयात केवल पेट्रोलियम पदार्थों पर हो रहा है। सोना-चांदी और इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ फर्टिलाइजर के मामले में भी विदेशों पर निर्भरता अधिक है। करीब 10 प्रतिशत राशि सोने के आयात पर खर्च होती है। यदि समग्र रुप से देखा जाए तो प्रधानमंत्री मोदी ने तेलंगाना के सिकन्दराबाद से देशवासियों से जो आग्रह किया है वह ऐसा नहीं है जो किसी भी तरह से देशवासियों के लिए दुविधाजनक हो।

वैश्विक संकट के चलते देश-दुनिया की इकोनॉमी पर पड़ने वाले संभावित असर को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी की देशवासियों से दूरदृष्टियुक्त अपील से कोरोना काल की याद ताजा हो रही है तो पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री की तत्कालीन अन्न संकट के दौरान सप्ताह में एक दिन के उपवास के आग्रह की ओर चला जाता है। ईरान के साथ अमेरिका-इजराइल के सीज़फायर के आसार अभी दिखाई नहीं दे रहे हैं तो दूसरी ओर दोनों पक्षों की हठधर्मिता के कारण हार्मुज जलडमरुमध्य से परिवहन बाधित होने का परिणाम दुनिया के देशों के सामने है। दुनिया के देशों को यह समझ लेना होगा कि अमेरिका-ईरान युद्ध केवल दो या तीन देशों के बीच सीमित ना होकर इसके असर से आज कोई देश अछूता नहीं है। यह दो देशों की अहम की लड़ाई न होकर समूची मानवता को प्रभावित करने वाले हालात हैं।

आज दुनिया के देशों की एक-दूसरे पर निर्भरता बढ़ी है। बिना किसी अन्य देश के सहयोग के कोई भी देश अपने स्तर पर अपने देशवासियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की स्थिति में नहीं है। आर्थिक उदारीकरण के बाद से आज दुनिया एक विश्व ग्राम में परिवर्तित हो गयी है। एक बात यह भी साफ हो जानी चाहिए कि आज ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल संकट का हल निकल भी आता है तब भी वैश्विक हालात सामान्य होने में लंबा समय लग जाएगा। युद्धरत देश यह समझने की कोशिश नहीं कर रहे कि उनके चलते दुनिया आज सालों पीछे जा रही है। विकास बाधित हो रहा है, आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं और हालात दिन-प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे हैं।

सबको मालूम है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते रास्ता अवरुद्ध होने के कारण आज कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का आयात प्रभावित है। हार्मुज का रास्ता अवरुद्ध है। हालात की गंभीरता इसी से समझी जा सकती है कि ईरान को प्रतिदिन 2800 करोड़ रुपए के कच्चे तेल को समुद्र में बहाना पड़ रहा है। तेल उत्पादक अन्य देश भी संकट के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कमी लाने, सार्वजनिक परिवहन वाहनों के उपयोग और वाहन पूलिंग का एक साल का सुझाव या आग्रह दूरदृष्टिपूर्ण व देशहित में माना जाना चाहिए। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग का बढ़ावा देना भविष्य के पर्यावरण संकट से बचाव और हरित उर्जा को बढ़ावा देने में ही सहायक हो सकेगा।

हमारे देश मेंं सोने की खरीद के प्रति खास मोह रहा है पर हालात को देखते हुए व्यापक राष्ट्रहित में एक साल के लिए सोना नहीं खरीदें तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। उसी प्रकार केवल शान-ओ-शौकत के लिए विदेशी यात्रा करने से बचने की सलाह और विदेशों में शादी करने के स्थान पर स्थानीय पर्यटन और देश में ही एक से एक बेहतरीन वेडिंग डेस्टिनेशंस पर शादी करने से जहां खर्च कम होगा, देश के डेस्टिनेशनों की वैश्विक पहचान के साथ विदेशी पूंजी भी बचेगी। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से खेती और खेतों की उर्वरा शक्ति प्रभावित होने से आज देश दो चार हो रहा है। जैविक खाद और जैविक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को सीमित करने का आग्रह निश्चित रुप से सकारात्मक ही है। जहां तक मीटिंग्स का प्रश्न है, कोविड के बाद से सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर अधिकांश मीटिंग्स अब हाईब्रीड मोड पर ही होने लगी है। वर्क फ्रॉम होम को अवश्य प्रोत्साहित किया जा सकता है।

लब्बोलुआब यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से जो आग्रह किया है उनमें से एक भी ऐसा आग्रह नहीं है जिससे हमारी जीवनचर्या प्रभावित हो रही हो। सीधे-सीधे एक साल के लिए अपनी आदत व आवश्यकताओं में जरुरी बदलाव के लिए कहा जा रहा है ताकि वैश्विक संकट का असर देश की अर्थव्यवस्था व देश के आमलोगों को प्रभावित ना कर सके। एक साल सोना नहीं खरीदने या ईवी वाहन या सार्वजनिक वाहन का उपयोग या विदेशों में शादी आदि कार्यक्रम आयोजित ना करने या विदेश घूमने नहीं जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है। इन सबसे बचने से देश वैश्विक हालातों का अधिक कुशलता से मुकाबला कर सकेगा और सबसे बड़ी बात कि स्वदेशी को बढ़ावा मिलेगा।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश