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पितृपक्ष : श्रद्धा, तर्पण और पितृऋण से जुड़ी सनातन परंपरा

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पितृपक्ष : श्रद्धा, तर्पण और पितृऋण से जुड़ी सनातन परंपरा


पितृपक्ष : श्रद्धा, तर्पण और पितृऋण से जुड़ी सनातन परंपरा


पितृपक्ष : श्रद्धा, तर्पण और पितृऋण से जुड़ी सनातन परंपरा


उदय कुमार सिंह

भारतीय सनातन परंपरा में पितरों का विशेष स्थान माना गया है और पितृपक्ष पूर्वजों के स्मरण, उनके प्रति कृतज्ञता और पितृऋण से उऋण होने की भावना का विशेष काल माना गया है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत परिजनों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। ब्राह्मण भोजन, दक्षिणा तथा जीव-जंतुओं को अन्न देने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किया गया श्राद्ध पितरों की तृप्ति और उनके आशीर्वाद का माध्यम बनता है।

शास्त्रीय परंपरा में कहा गया है “श्रद्धया इदं श्राद्धम्”, अर्थात श्रद्धा से पितरों के निमित्त किया गया कर्म ही श्राद्ध है। पितृपक्ष का मूल भाव इसी श्रद्धा में निहित है। यह केवल कर्मकांड का समय नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, पूर्वजों और पारिवारिक संस्कारों को स्मरण करने का अवसर भी है।

पितृपक्ष में क्यों किया जाता है श्राद्ध?हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष में पितरों का विशेष स्मरण किया जाता है। इस अवधि में पूर्वजों के निमित्त जल अर्पित करने, तिलांजलि देने और पिंडदान करने की परंपरा है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों को तृप्ति और शांति मिलती है तथा परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

शास्त्रों में पितरों के लिए श्रद्धा और उचित विधि से कर्म करने पर विशेष जोर दिया गया है। इसी भाव को इस उक्ति में व्यक्त किया गया है “पितरो वाक्यमिच्छन्ति भावमिच्छन्ति देवता:” अर्थात देवताओं के लिए भाव और पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक किया गया कर्म महत्वपूर्ण माना गया है।

पितृपक्ष में अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार, श्राद्ध करना प्रमुख परंपरा है। यदि किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं हो तो सर्वपितृ अमावस्या को उनके निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है।

पितृदोष की धार्मिक मान्यतापितृदोष शब्द का संबंध पितरों या पूर्वजों से माना जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय परंपराओं में इसकी अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। एक मान्यता के अनुसार, जिन पूर्वजों के निमित्त उचित धार्मिक कर्म नहीं हो पाते अथवा जिनकी आत्मिक शांति से संबंधित कर्म अधूरे रह जाते हैं, उनसे जुड़ी स्थिति को पितृदोष के रूप में देखा जाता है।

ज्योतिषीय मान्यताओं में पितृदोष को परिवार में आने वाली कुछ परेशानियों से जोड़ा जाता है। इनमें पारिवारिक मतभेद, आर्थिक अस्थिरता, कार्यों में बाधा, संतान संबंधी चिंता और जीवन में बार-बार आने वाली कठिनाइयों का उल्लेख मिलता है। हालांकि ये धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं हैं, इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कारण-परिणाम संबंध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसी प्रकार कुछ ज्योतिषीय परंपराएं कालसर्प योग को भी पितृदोष से जोड़ती हैं। इस संबंध में विभिन्न ज्योतिषीय मतों में भिन्न धारणाएं हैं।

आत्मा और पितृलोक की अवधारणाहिंदू दर्शन में आत्मा को नश्वर शरीर से अलग माना गया है। भगवद्गीता में शरीर परिवर्तन की तुलना पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करने से की गई है। इसी दार्शनिक दृष्टि के आधार पर धार्मिक परंपरा में माना जाता है कि मृत्यु के बाद स्थूल शरीर का अंत होता है, जबकि आत्मा की यात्रा आगे जारी रहती है।

पितृलोक की अवधारणा भी इसी धार्मिक दर्शन का हिस्सा है। विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में पितृलोक की स्थिति तथा वहां पितरों के निवास की अलग-अलग व्याख्या मिलती है। श्राद्धकर्म को इसी धार्मिक विश्वास से जोड़कर देखा जाता है कि पितरों तक श्रद्धा और तर्पण का भाव पहुंचता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, मनुष्य का स्थूल शरीर नष्ट होने के बाद सूक्ष्म अस्तित्व बना रहता है। श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को उस सूक्ष्म अस्तित्व की तृप्ति तथा उसके कल्याण से जोड़ा गया है।

श्राद्ध के कितने प्रकार?विभिन्न धर्मग्रंथों में श्राद्ध के अलग-अलग प्रकार बताए गए हैं। मत्स्य पुराण में नित्य, नैमित्तिक और काम्य श्राद्ध का उल्लेख मिलता है, जबकि यमस्मृति में वृद्धि और पार्वण श्राद्ध सहित पांच प्रकार बताए गए हैं।

नित्य श्राद्ध: प्रतिदिन किए जाने वाले श्राद्ध को नित्य श्राद्ध कहा जाता है। इसमें विश्वदेव की स्थापना नहीं की जाती और केवल जल से भी यह कर्म संपन्न करने का विधान बताया गया है।

नैमित्तिक या एकोद्दिष्ट श्राद्ध: किसी विशेष व्यक्ति को निमित्त बनाकर किया जाने वाला श्राद्ध नैमित्तिक कहलाता है। मृत्यु के बाद दशाह, एकादशाह आदि कर्म इसी श्रेणी में रखे जाते हैं।

काम्य श्राद्ध: किसी विशेष कामना की पूर्ति के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध काम्य श्राद्ध कहलाता है।

वृद्धि श्राद्ध: पुत्र जन्म, विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक अवसरों पर पितरों की प्रसन्नता के लिए किया जाने वाला श्राद्ध वृद्धि श्राद्ध कहलाता है। इसे नान्दी या नान्दीमुख श्राद्ध भी कहा जाता है।

पार्वण श्राद्ध: किसी पर्व, अमावस्या या पितृपक्ष जैसी विशेष तिथि पर किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाता है। इसमें विश्वदेव की स्थापना का भी विधान बताया गया है।

इसके अलावा सपिण्डन, गोष्ठी, शुद्ध्यर्थ, कर्मांग, यात्रार्थ और पुष्ट्यर्थ श्राद्ध का भी उल्लेख मिलता है। सपिण्डन में प्रेत पिंड का पितृ पिंडों के साथ सम्मेलन कराया जाता है। समूह में किए जाने वाले श्राद्ध को गोष्ठी श्राद्ध कहा जाता है।

धर्मसिंधु में श्राद्ध के 96 अवसरों का उल्लेख मिलता है। इनमें अमावस्या, संक्रांति, मन्वादि और अन्य विशेष तिथियों तथा योगों के साथ पितृपक्ष, अष्टका, अन्वष्टका आदि को शामिल किया गया है।

पुराणोक्त श्राद्ध कर्मपुराणों और विभिन्न धार्मिक परंपराओं में एकोद्दिष्ट श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, नागबलि, नारायणबलि, त्रिपिण्डी श्राद्ध और महालय श्राद्ध का उल्लेख मिलता है। इनके विधान संप्रदाय और कुल-परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। इसीलिए धार्मिक आचार में कुल परंपरा के अनुसार श्राद्धकर्म करने पर विशेष जोर दिया जाता है। विशेष कर्मकांड के लिए योग्य आचार्य या पुरोहित के मार्गदर्शन का पालन करना उचित माना जाता है।

गयाजी में पिंडदान का विशेष महत्वश्राद्ध और पिंडदान की चर्चा गयाजी के बिना अधूरी मानी जाती है। बिहार का गयाजी क्षेत्र हिंदू धर्म में प्रमुख पितृतीर्थों में शामिल है। यहां विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी और बोधगया सहित अनेक स्थानों पर पिंडदान और तर्पण की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिह्न हैं। श्रद्धालु यहां अपने पितरों के निमित्त पूजा और पिंडदान करते हैं।

फल्गु नदी से भी पितृकर्म की प्राचीन परंपरा जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भगवान राम ने माता सीता के साथ यहां अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान किया था। इसी पौराणिक परंपरा के कारण गयाजी में पिंडदान को विशेष महत्व प्राप्त हुआ।

गयाजी के नाम से जुड़ी पौराणिक कथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। मान्यता है कि असुर गयासुर के शरीर पर भगवान विष्णु का चरण पड़ा और इसी घटना से गयाजी क्षेत्र की पवित्रता जुड़ी हुई है। आज भी देश के विभिन्न हिस्सों से लोग पितरों के निमित्त पिंडदान करने गयाजी पहुंचते हैं।

मोक्ष की भूमि गयाजी में विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला 25 सितंबर से शुरू होगा। 10 अक्टूबर तक चलने वाले इस मेले में देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करेंगे। सामान्य श्रद्धालुओं के लिए पितृपक्ष मेला 16 दिनों का होगा, जबकि त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वाले श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक अनुष्ठान 11 अक्टूबर तक जारी रहेगा।

अलग-अलग तिथियों पर निर्धारित हैं पिंडदान के कर्मकांड25 सितंबर को अनन्त चतुर्दशी के दिन पुनपुन में पिंडदान और गयापाल तीर्थपुरोहित की पांव पूजा का विधान है। 26 सितंबर को फल्गु स्नान, श्राद्ध और पांव पूजा होगी। 27 सितंबर को ब्रह्मकुंड में जौ के चूर्ण से पिंडदान के साथ प्रेतशिला, रामशिला और रामकुंड में श्राद्ध तथा काकबली में पिंडदान किया जाएगा।

28 सितंबर को पंचतीर्थ श्राद्ध के तहत उत्तरमानस, उदीची, कनखल, दक्षिणमानस और जिह्वालोल में कर्मकांड होगा। 29 सितंबर को सरस्वती स्नान, पंचरत्न दान, मातंगवापी और धर्मारण्य कूप में श्राद्ध तथा बोधगया में बोधितरू दर्शन का विधान है। 30 सितंबर को ब्रह्मसरोवर और काकबली श्राद्ध के साथ आम्रसिंचन में पिंडदान किया जाएगा।

01 अक्टूबर को रुद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद में श्राद्ध होगा। इस दिन खीर और मावा के पिंड से पिंडदान तथा गयापाल तीर्थपुरोहित की पांव पूजा होगी। 2 अक्टूबर को कार्तिकपद, दक्षिणाग्निपद और गार्हपत्याग्निपद श्राद्ध तथा 3 अक्टूबर को सूर्यपद, चंद्रपद, गणेशपद, संध्याग्निपद, आवसंध्यग्निपद और दधीचीपद में श्राद्ध किया जाएगा।

04 अक्टूबर को अष्टमी और नवमी के अवसर पर कण्वपद, मातंगपद, क्रौंचपद, अगस्त्यपद, इन्द्रपद, कश्यपपद और गजकर्णपद में श्राद्ध होगा। सीताकुंड में बालू से पिंडदान, रामगया श्राद्ध, दूध तर्पण और अन्नदान का भी विधान है।

05 अक्टूबर को गयासिर और गयाकूप में त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाएगा, जिसे पितृदोष और प्रेतदोष निवारण से जुड़ा कर्मकांड माना जाता है। 6 अक्टूबर को मुण्डपृष्ठा, आदि गदाधर और धौतपद में श्राद्ध होगा। 7 अक्टूबर को भीमगया, गौप्रचार और गदालोल श्राद्ध, जबकि 8 अक्टूबर को भगवान विष्णु का पंचामृत स्नान-पूजन और फल्गु में दुग्ध तर्पण किया जाएगा।

09 अक्टूबर को वैतरणी सरोवर पर गोदान और तर्पण तथा 10 अक्टूबर को अमावस्या के दिन अक्षयवट में श्राद्ध, खीर से पिंडदान, सुफल और पितृ विसर्जन का विधान है। त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वालों के लिए 11 अक्टूबर को गायत्री घाट पर दही-चावल से पिंडदान, आचार्य को दक्षिणा और पितृ विदाई का कर्मकांड होगा।

किस तिथि को किसका श्राद्धधार्मिक परंपरा में सामान्यतः पूर्वज की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, पितृपक्ष में उसी तिथि को श्राद्ध करने का विधान बताया गया है। कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए अलग तिथियां निर्धारित मानी जाती हैं।

पंचमी: अविवाहित अवस्था में मृत्यु प्राप्त लोगों के श्राद्ध के लिए पंचमी का उल्लेख मिलता है।

नवमी: मातृ नवमी के रूप में प्रसिद्ध नवमी तिथि महिलाओं और विशेष रूप से माता के श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

एकादशी और द्वादशी: संन्यास ग्रहण कर चुके लोगों के श्राद्ध से इन तिथियों को जोड़ा जाता है।

त्रयोदशी: बच्चों के श्राद्ध के लिए त्रयोदशी तिथि का उल्लेख मिलता है।

चतुर्दशी: अकाल या असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु प्राप्त लोगों के श्राद्ध के लिए चतुर्दशी का विधान बताया गया है।

सर्वपितृ अमावस्या: जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं हो अथवा किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका हो, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है।

श्राद्ध के दौरान किन बातों का रखें ध्यानधार्मिक परंपरा में श्राद्ध के दिन सात्विक और संयमित आचरण को महत्व दिया गया है। इस दौरान क्रोध, कलह और अनावश्यक विवाद से बचने की सलाह दी जाती है। पिंडदान के समय सफेद या पीले वस्त्र धारण करने, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितृकर्म करने और तुलसी दल का प्रयोग करने की परंपरा है। गयाजी, पुष्कर, प्रयागराज और हरिद्वार जैसे तीर्थों में श्राद्ध करने का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।

श्राद्ध के दिन ब्रह्मचर्य और संयम का पालन करने की परंपरा है। पितरों के निमित्त भोजन सामग्री अर्पित करने के लिए मिट्टी, पत्ते या लकड़ी के पात्रों के प्रयोग का भी उल्लेख मिलता है। कई परिवारों में भोजन बनने के बाद गाय, कुत्ते और पक्षियों आदि के लिए अन्न निकालने की परंपरा है। इसे भी पितृकर्म का हिस्सा माना जाता है। शाम को घर के द्वार पर दीपक जलाकर पितरों का स्मरण करने की परंपरा भी प्रचलित है।

पितृपक्ष का सामाजिक और सांस्कृतिक संदेशश्राद्ध का मूल संदेश आडंबर से अधिक श्रद्धा, स्मरण, संयम और कृतज्ञता में निहित है। धार्मिक विश्वास चाहे जिस रूप में हो, यह परंपरा मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि उसका वर्तमान अकेले उसका बनाया हुआ नहीं है। उसके अस्तित्व के पीछे अनेक पीढ़ियों का योगदान है। इसी भाव से पितृपक्ष में तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध के माध्यम से पूर्वजों को स्मरण किया जाता है। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा से किया गया पितृकर्म पितरों को शांति और वंशजों को उनका आशीर्वाद प्रदान करता है। यही पितृपक्ष की सनातन परंपरा का मूल भाव है।(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / उदय कुमार सिंह