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संसद परिसर में स्वांग प्रकरणः सभ्यों से बनती है सभा, उच्यते सभासु

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संसद परिसर में स्वांग प्रकरणः सभ्यों से बनती है सभा, उच्यते सभासु


हृदयनारायण दीक्षित

संसद देशकाल का दर्पण होती है। अपनी संसद डेढ़ अरब लोगों की भाग्य विधाता है। संसद के पास नए कानून बनाने की क्षमता के साथ संविधान संशोधन के भी अधिकार हैं। भारत में विचार-विमर्श की परंपरा है ही। वेदों में भी साथ साथ चलने और परामर्श करने के मंत्र हैं। संसद आदर योग्य है। संसदीय व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं। संसद अपने सदस्यों से बनती है। सदस्यों द्वारा आदर पाती है। यह सर्वोच्च जनप्रतिनिधि संस्था है। लेकिन पीछे कुछ वर्षों से संसद की गरिमा और महिमा को अपमानित किया जा रहा है। जान पड़ता है कि शब्दों का अकाल है। जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर चलने वाली फिल्में गाली-गलौच और हिंसा से लबालब भरी होती हैं। वैसे ही दुर्भाग्य से हमारी संसद में वाणी संयम नहीं है। मर्यादा का अभाव है।

वैदिक काल परिपूर्ण संसदीय था। लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप ने लिखा, “भारत में वैदिक युग से ही गणतांत्रिक स्वरूप, प्रतिनिधित्व विचार विमर्श और स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ थीं। ऋग्वेद, अथर्ववेद में सभा समिति के उल्लेख हैं। ऐतरेय ब्राह्मण, पाणिनि की अष्टाध्यायी, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, महाभारत और अशोक स्तम्भों, जैन पाठ्यों में उत्तर वैदिक काल के गणतंत्रों के उल्लेख हैं।“

सभा सभ्यों से ही बनती है। ऋग्वेद (ऋ 6.28.6) कहता है, “पहले हम घर को भद्र बनाएँ-भद्रं गृहं कृणुथ, वाणी भद्र बनाएँ-भद्रवाचो, सभा में भद्र आचरण हो-उच्यते सभासु।“ लेकिन आज निजी जीवन में अपराध है। मानसतंत्र में क्रोध और तनाव है, ऐसे माननीयों से सभा में अमृत घट लुढ़काने की उम्मीदें करना व्यर्थ है। अथर्ववेद (8.10) में सभ्यता और सामाजिक संस्थाओं के विकास का प्रीतिकर वर्णन है, “अराजक से उत्क्रान्ति हुई, गार्हपत्य (परिवार) आया। गार्हपत्य से आहवनीय (आह्वान से जनसंगठन) फिर दक्षिणाग्नि (योग्य, अग्रणी) और इसके बाद सभा समिति का विकास हुआ।“ अथर्वा कहते हैं, “जो यह जानता है वह सभा का सभ्य बनता है।“ सभ्य सभा और सभ्य सभासदों (सभ्य सभा में पाहि ये च सभ्याः सभासद) की प्रार्थना हजारों बरस प्राचीन अथर्ववेद में भी है।

भारत के संविधान निर्माताओं ने गहन विचार-विमर्श के बाद ब्रिटिश तर्ज की संसदीय प्रणाली अपनाई। भारत के लिए संसदीय पद्धति का कोई विकल्प नहीं था और न है। भारत का लोकजीवन सनातन काल से संसदीय है। तर्क-प्रतितर्क विचार-विमर्श यहाँ के जन-जन की जीवन शैली है। संसद भारत के कोटि-कोटि लोगों की जीवन स्पंदन है। आमजनों के हर्ष-विषाद, अभाव, प्रभाव और दुष्प्रभाव, राग, द्वेष, रोष की अभिव्यक्ति का केन्द्र है। संसद देशकाल का मुख है। सनातन-अधुनातन का मिलन-क्षितिज है। विभिन्न भाषा-भाषी, मत-मजहब आस्था के लोग यहाँ एक जन, एक संस्कृति और एक राष्ट्र के रूप में समवेत होते हैं।

जनप्रतिनिधि के नाते वे अपने-अपने क्षेत्रों के दुख-सुख के प्रवक्ता हैं और एकजुट एकात्म भाव से राष्ट्र के गति नियंता। इसीलिए वे मान्यवर हैं, इसी वजह से उन्हें विशेषाधिकार है। उनके हावभाव, रूपरंग से राष्ट्र को अभिव्यक्ति मिलती है। डेढ़ अरब से अधिक भारतजन अपने भविष्य के लिए संसद की तरफ टकटकी लगाए देखते हैं लेकिन संसद उन्हें निराश करती है, हताश करती है, राजनीति के प्रति घृणाभाव देती है।

ये अठारहवीं लोकसभा है। इसके दृश्य लोकतंत्र के लिए डरावने हैं। एक-एक घटना का विवेचन और विश्लेषण इस छोटे से आलेख में रख पाना असंभव है। जान पड़ता है कि सदस्यों के पास अपनी भाषा के मर्यादित शब्दों का अभाव हो गया है। सदस्य अपनी बात चिल्ला कर ही कहते हैं। संसद के भीतर अनुशासन बनाए रखने की समस्या बड़ी है। अध्यक्ष नियंत्रण की कोशिश करते हैं लेकिन कामयाबी नहीं मिलती। संसद के परिसर में भी मर्यादा का संकट है। संसदीय पद्धति के अनुसार पूरे परिसर में अध्यक्ष का नियंत्रण रहता है। सदस्यों ने परिसर का दुरुपयोग कभी नहीं किया लेकिन बीते शुक्रवार को परिसर में जो नौटंकी हुई, उससे सारी दुनिया में देश की बदनामी हुई है। माननीय सदस्यों ने श्रीराम जन्मभूमि के वर्तमान विवाद का स्वांग बनाया है। करोड़ों भारतवासियों की आस्था पर सीधे हमला बोला। संत परंपरा का अपमान किया। एक सांसद ने साधु का वेश बना कर दान लेने और लेकर भाग जाने का नाटक किया। अयोध्या से सांसद ने भी इस ड्रामे में हिस्सा लिया। उन्होंने साधुवेश वाले कथित चोर को दौड़ाया। इसके पहले अनेक सांसदों ने दान देने का नाटक किया। संसद और संसदीय शिष्टाचार की गरिमा तार-तार हो गई।

राष्ट्र स्तब्ध और सन्न है। संविधान निर्माताओं ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि हमारे सांसद ही भारतीय संस्कृति और परम्परा का अपमान करेंगे। संविधान की मुख्य धारा सांस्कृतिक है। भारतीय संस्कृति एक सतत संगीत है। कह सकते हैं एक वीणा। वीणा के तार संघर्षण से बजते हैं। स्वर से स्वर नहीं आते। बांसुरी में स्वर से स्वर निकलते हैं। तब संगीत आता है। वीणा वाद्य यंत्र है। यहाँ संघर्षण और छेड़खानी ही संगीत देती है। भारतीय संस्कृति एक वीणा है। भारत ने इसीलिए ज्ञान, वाणी और विद्या की देवी सरस्वती के हाथ में वीणा पकड़ाई। वीणा प्रतीक है संघर्षन में संगीत की खोज का। सतत् खोजी, सदा आनन्द अभीप्सु सनातन तार्किक, निरंतर लोकतंत्रीय-भारत की यही प्रकृति संस्कृति कहलाती है।

ध्यान रहे व्यक्ति की तरह देश के भी वैशिष्ट्य होते हैं। व्यक्ति के वैशिष्ट्य व्यक्ति का व्यक्तित्व बनते हैं। राष्ट्र के वैशिष्ट्य राष्ट्र का राष्ट्रीयत्व बनते हैं। भारत का वैशिष्ट्य भारत की यही सनातन संस्कृति है। इसीलिए भारतीय राष्ट्र का प्राण संस्कृति है। संविधान की पहली प्रति में सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। यहां भारतीय संस्कृति को सुदृढ़ करने वाले तमाम चित्र हैं। श्रीराम के चित्र उल्लेखनीय हैं। इसी संविधान की शपथ लेकर चुनाव लड़ने वाले माननीय सदस्यों ने श्रीराम की मर्यादा और संसद का अपमान किया है। नेता विरोधी दल सम्माननीय आदर्श संवैधानिक दायित्व होता है। संसदीय व्यवस्था में नेता विरोधी दल प्रतीक्षारत सरकार का मुखिया होता है। संसद की ताजा नौटंकी में उनका भी सम्मिलित होना बहुत त्रासद है। भारत के मन को आहत करने वाला है।

वैसे तो इस घटना ने अनेक प्रश्न उठाए हैं, लेकिन मूलभूत प्रश्न है कि क्या भारतीय धर्म आस्था संस्कृति और समूची भारतीय परंपरा को अपमानित करना संसदीय विशेषाधिकार है। क्या संसद के परिसर में ऐसी आपराधिक घटनाएं रोकी नहीं जा सकतीं? यह संसदीय गरिमा को भी चोट पहुंचाने वाला है। यह संसद के विशेषाधिकार का अवमान है। इस स्वांग पर विशेषाधिकार हनन का प्रश्न उठाया जाना आवश्यक है।

संसद के सदस्य माननीय होते हैं। उनसे संविधान के सामान्य ज्ञान की अपेक्षा की जाती है। उनसे संसदीय प्रक्रिया की जानकारी की अपेक्षा स्वाभाविक ही है। संविधान सभा के समापन भाषण में सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि, ”सदस्यों के लिए कोई न्यूनतम शिक्षा का विचार हमलोग नहीं कर पाए।” लोकसभा के 18 चुनाव हो चुके हैं। शिक्षित सदस्यों की संख्या बढ़ी है लेकिन संसदीय मर्यादा और गरिमा घटी है। वे भूल जाते हैं कि संसद के सदस्य होने के कारण उनको सम्मान किया जाता है। जिस संसद की सदस्यता के कारण उनका सम्मान और प्राधिकार बढ़ता है, वे उसी संसद की मर्यादा, गरिमा और महिमा को तार-तार करने में संकोच नहीं करते। वे संसद और परम्परा को अपमानित करने के बाद विजेता की मुद्रा में रहते हैं। प्रधानमंत्री संसदीय सदन का नेता होता है। उसे भी गलियाँ दी जाती हैं। संविधान का मजाक बनाया जाता है। सदस्यों को संसद की गरिमा तार-तार किए जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। भारत के करोड़ों लोगों की आस्था को अपमानित करने का प्रश्न बड़ा है।

(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश