आपातकाल को याद करेंगे, तो इन चेहरों को कैसे भूलेंगे
अजय सेतिया
26 और 27 जून, 1975 को दिल्ली विश्वविद्यालय से 186 लोग गिरफ्तार किए गए थे, जिनमें से सवा सौ के करीब अध्यापक थे, बाकी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ए.बी.वी.पी.) के सदस्य छात्र थे। गुजरात और बिहार का आंदोलन वास्तव में विद्यार्थी परिषद ने ही शुरू किया था। इन दोनों ही आंदोलनों में विद्यार्थी परिषद के रामबहादुर राय की अहम भूमिका थी। बाद में बिहार के आंदोलन में उनके साथ गोविंदाचार्य ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसलिए सबसे ज्यादा कहर देश भर में विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं पर ही टूटा था। देशभर में विद्यार्थी परिषद के दस हजार से ज्यादा कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए थे। मेरे साथ फिरोजपुर जेल में बंद रहे तीनों प्रोफेसर स्वदेश नंदा, बी.एल. रिणवा और प्रीतम लाल चावला भी विद्यार्थी परिषद के पदाधिकारी थे। कांग्रेस बेहद खफा थी, क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय में कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों का कब्जा खत्म करके 1971 से ही अध्यक्ष पद पर विद्यार्थी परिषद का उम्मीदवार जीतने लगा था और दिल्ली का संदेश सारे देश में जाता ही है। देशभर के विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी परिषद की तूती बोलने लगी थी, इसलिए विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव राजकुमार भाटिया, दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के सचिव हेमंत बिश्नोई, ए.बी.वी.पी. के नेता मदन भाटिया, रजत शर्मा और दिल्ली विश्वविद्यालय अध्यापक संघ के अध्यक्ष ओ.पी. कोहली की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने बहुत ही अमानवीय अत्याचार किए थे।
1971 में जब ओ.पी. कोहली दिल्ली प्रदेश ए.बी.वी.पी. के अध्यक्ष थे, तब पहली बार कांग्रेस के छात्र संगठन एन.एस.यू.आई. को हराकर ए.बी.वी.पी. के भगवान् सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव जीते थे, जबकि उससे पहले कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों का ही कब्जा रहता था। 1972 में जब प्रभु चावला ए.बी.वी.पी. की दिल्ली प्रदेश इकाई के अध्यक्ष और बलबीर पुंज सचिव थे, तब ए.बी.वी.पी. के श्रीराम खन्ना एन.एस.यू.आई. के उम्मीदवार को हराकर डूसू के अध्यक्ष पद का चुनाव जीते। दिल्ली विश्वविद्यालय की एक हड़ताल से क्रोधित उपकुलपति स्वरूप सिंह (बाद में लोकदल के राज्यसभा सदस्य रहे) ने जब छात्रसंघ के सारे पदाधिकारियों को निलंबित कर दिया था तो विद्यार्थी परिषद ने डी.यू. के इतिहास की सबसे लंबी 75 दिन तक की हड़ताल की थी। इसका नतीजा यह निकला कि 1973 में दिल्ली विश्वविद्यालय अध्यापक संघ (डूटा) का चुनाव भी विद्यार्थी परिषद के पूर्व अध्यक्ष ओ.पी. कोहली जीत गए (जो बाद में राज्यसभा सदस्य और राज्यपाल भी रहे), उस साल डूसू के अध्यक्ष पद का चुनाव ए.बी.वी.पी. के आलोक कुमार (जो दिल्ली विधानसभा के स्पीकर बने और अभी 2025 में विश्व हिंदू परिषद् के अध्यक्ष हैं) और 1974 में अरुण जेटली डूसू अध्यक्ष पद का चुनाव जीते थे जो बाद में केंद्रीय मंत्री और भाजपा के महासचिव रहे। बिहार आंदोलन अपने चरम पर था और उस वर्ष विद्यार्थी परिषद के अरुण जेटली अध्यक्ष और हेमंत बिश्नोई सचिव चुने गए थे।
हेमंत बिश्नोई उस समय रोहतक में चल रहे एक महीने के संघ शिविर में थे, 14 जून को उन्हें एक परीक्षा में बैठना था, इसलिए वह एक दिन के लिए दिल्ली आए और उसी शाम को वापस रोहतक चले गए, संघ शिविर 30 जून तक चलना था, लेकिन 25 जून रात को आपातकाल लगने के बाद पुलिस ने उसे 28 जून को ही बंद करवा दिया था। इस बीच दिल्ली पुलिस ने अरुण जेटली के घर पर छापा मारा था, वह घर पर नहीं थे तो पुलिस उनके पिता महाराज किशन जेटली को गिरफ्तार करके ले जाने लगी, जोकि वकील थे। अगले दिन अरुण जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय में जोरदार प्रदर्शन करके अपनी गिरफ्तारी दी थी। ओ.पी. कोहली भी गिरफ्तार कर लिये गए थे। कोहली और राजकुमार भाटिया को बहुत यातनाएं दी गईं। राजकुमार भाटिया को 36 घंटे तक खड़ा रखा गया, पीटा गया और गंदी-गंदी गालियां निकाली गईं। कोहली पोलियो पीड़ित थे, उनकी एक टांग काम नहीं करती थी, वह लंगड़ाकर चलते थे। उन्हें 24 घंटे तक खड़ा रखा गया। पिटाई करते समय वह गिर जाते थे, तो उन्हें फिर से खड़ा करके पिटाई की जाती थी। उन्हें उर्दू में लिखे एक बयान पर दस्तख्त करने के लिए कहा गया, लेकिन वह उर्दू जानते नहीं थे, इसलिए उन्होंने दस्तख्त नहीं किए। उनकी पिटाई लगातार जारी रही, लेकिन उनकी किस्मत शायद कुछ अच्छी थी कि तभी उनका मीसा का वारंट आ गया और उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
डूटा के अध्यक्ष ओ.पी. कोहली जब जेल चले गए तो दिल्ली विश्वविद्यालय ने उनका वेतन रोक दिया, पत्नी के लिए घर चलाना मुश्किल हो गया। जेल से कोहली ने दिल्ली विश्वविद्यालय कवर करने वाले 'इंडियन एक्सप्रेस' के रिपोर्टर मित्र देवसागर सिंह को पत्र लिखा कि वह उपकुलपति से मिलकर उनकी मदद करें। लेकिन वह पत्र देवसागर सिंह को कभी नहीं मिला, जबकि आई.बी. के एक अफसर ने उन्हें बताया था कि ओ.पी. कोहली ने जेल से उन्हें एक पत्र लिखा है, वह जरा बचकर रहे हैं। देवसागर सिंह ने मुझे बताया कि आपातकाल के बाद जब उन्होंने ओ.पी. कोहली से पूछा तो उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि उन्होंने जेल से उन्हें पत्र लिखा था। डूसू के महासचिव हेमंत बिश्नोई रोहतक से लौटकर अपने घर नहीं गए थे, वह विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं से संपर्क साधने में जुट गए और एक ऐसे मित्र के घर ठहरे थे, जो विद्यार्थी परिषद में सक्रिय नहीं था। वह विद्यार्थी परिषद के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष ओम प्रकाश कोहली और सचिव राजकुमार भाटिया से संपर्क साधने में सफल हो गए। कोहली, भाटिया और बिश्नोई ने आगे की रणनीति पर विचार किया और देश भर में विद्यार्थी परिषद के सदस्यों से संपर्क बनाने के लिए दरियागंज में एक गुप्त कार्यालय खोल लिया, जिसमें फोन भी लगा हुआ था। वही फोन बाद में मुसीबत का कारण भी बना।
10 जुलाई की रात को पुलिस ने दरियागंज के कार्यालय पर छापा मारकर राजकुमार भाटिया और दो अन्य कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद पुलिस का एक अधिकारी वहीं फोन पर बैठ गया। सबसे पहले नानाजी देशमुख के यहां से एक फोन आया, लेकिन बातचीत में आशंका पैदा हुई तो नानाजी देशमुख ने तुरंत अपना स्थान बदल लिया, अन्यथा वह भी उसी दिन गिरफ्तार कर लिये जाते। उस दिन जिस-जिस ने भी कार्यालय में फोन किया या जो-जो भी वहां पहुंचा, उसे गिरफ्तार कर लिया गया। हेमंत बिश्नोई ने भी फोन किया था, लेकिन वह पहचान गया था कि फोन उठाने वाला अपरिचित है, इसलिए वह कार्यालय गए ही नहीं। हेमंत बिश्नोई जगह बदल-बदलकर रहते थे, कहीं भी दो रातें एक जगह पर नहीं बिताई। लेकिन उनका संपर्क और भूमिगत आंदोलन प्रचार का काम आगे बढ़ता रहा। इस बात का ध्यान रखा जाता था कि किसी को भी भूमिगत आंदोलन की पूरी जानकारी न हो, ताकि अगर कोई पकड़ा जाए तो उसके पास पुलिस को देने के लिए ज्यादा जानकारी हो ही नहीं। 16 जुलाई से विश्वविद्यालय की छुट्टियां खत्म हो रही थीं, कॉलेज खुलते ही बड़ा आंदोलन शुरू होने की आशंका को देखते हुए पुलिस ने 13-14-15 जुलाई की रात को विद्यार्थी परिषद और दिल्ली विश्वविद्यालय प्राध्यापक संघ से जुड़े 50 के करीब छात्रों और प्राध्यापकों को उनके घरों पर छापा मारकर गिरफ्तार कर लिया। एक अध्यापक गणेश शंकर पालीवाल अपने घर पर पौधों को पानी दे रहे थे, पुलिस आई और उन्हें गिरफ्तार करके ले गई। उनकी पत्नी अपने किसी रिश्तेदार को मिलने गई थी, घर में दो छोटे बच्चे थे। बच्चों ने जब देखा कि उनके पिता कहीं नहीं दिख रहे तो वे रोने लगे। उनके रोने की आवाज सुनकर पड़ोसी वहां पहुंचे, लेकिन किसी को नहीं पता था कि पालीवाल अचानक कहां गायब हो गए? इस तरह के सैकड़ों और उदाहरण हैं, जो पूरे देश से बाद में सुनने को मिले।
पुलिस की धरपकड़ में सनातन धर्म कॉलेज छात्रसंघ के सचिव और विद्यार्थी परिषद के नेता मदन भाटिया भी आए, जिनके साथ पुलिस ने बहुत ही घटिया किस्म का अमानवीय व्यवहार किया, क्योंकि मदन भाटिया के कब्जे से 'लोक संघर्ष समिति' के पंफलेट पकड़े गए थे। पुलिस ने मदन भाटिया को बहुत पीटा, लेकिन उन्होंने कोई सूचना नहीं दी। तब पुलिस उन्हें उनके घर ले गई और उनके परिवार के सामने उनकी पिटाई की गई। पड़ोसियों ने पुलिस की दहशत के मारे अपने घरों के दरवाजे बंद कर लिये थे। पुलिस उन्हें दिल्ली कैंट के टॉर्चर सेल में ले गई, जहां मोमबत्ती से उनके बालों को जलाया गया। कुछ दिनों के बाद वह बहुत बुरी हालत में तिहाड़ जेल पहुंचे थे। तिहाड़ जेल में पहुंचने पर उनकी हालत देखकर विद्यार्थी परिषद के सब कार्यकर्ताओं की आंखों में आंसू थे। लालकिले के पास चांदनी चौक में पुलिस ने एक ऐसे स्कूटर की पहचान कर ली थी, जिसका नंबर उसके पास नोट था। वहां कुछ छात्र पंफलेट्स के साथ पकड़ लिये गए थे। उनमें से एक छात्र थोड़ा कमजोर निकला। पुलिस टॉर्चर में उसने बता दिया था कि उन्हें राजकुमार भाटिया के माध्यम से पंफलेट्स मिले थे। पुलिस राजकुमार भाटिया के परिवार के सभी पुरुष सदस्यों को पकड़ लाई, उनपर भयंकर अत्याचार किए गए, कुछ दिन लॉक-अप में रखने के बाद उन्हें छोड़ा गया।
रजत शर्मा (इंडिया न्यूज और आपकी अदालत वाले) विद्यार्थी परिषद के अग्रणी नेताओं में से थे। वह बहुत ही दुबले-पतले थे, जब वह पुलिस के हत्थे चढ़ गए तो सबको चिंता थी कि वह पुलिस के टॉर्चर से बच भी पाएंगे या नहीं? लेकिन वह मजबूत निकले, उन्होंने पुलिस के सामने भूमिगत आंदोलन का एक शब्द भी नहीं उगला। 'लोक संघर्ष समिति' और विद्यार्थी परिषद ने 25-26 जुलाई को विश्वविद्यालय बंद का आह्वान किया था। हेमंत बिश्नोई ने पंफलेट छपवाए थे और विश्वविद्यालय में छात्रों को वितरित किए गए थे। पुलिस पता नहीं लगा सकी कि ये पंफलेट कहां से छपे थे? लेकिन उसे यह पता चल गया था कि यह काम हेमंत बिश्नोई का था। हेमंत बिश्नोई के घर जाकर पुलिस ने उनके पिता को धमकाया और कहा कि हेमंत बिश्नोई को भगोड़ा घोषित किया जा चुका है, उसको गोली मारने के आदेश हो चुके हैं, आपका घर सील होगा। हेमंत के पिता ने तुरंत अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां उन्होंने कहा कि यह घर हेमंत बिश्नोई का नहीं है, इसलिए इसे कैसे सील किया जा सकता है? अदालत से उन्हें राहत मिल गई। बाद में जब हेमंत बिश्नोई पकड़े गए , तो उन पर भयंकर अमानवीय अत्याचार किए गए |
सनद रहे कि इंदिरा गांधी ने 26 जून को कैबिनेट के सामने तर्क दिया था कि उन्होंने जयप्रकाश नारायण के सेना को भड़काने वाले भाषण के कारण आपातकाल लगाने की सिफारिश की थी, लेकिन आपातकाल की ज्यादतियों की जांच के लिए बने 'शाह आयोग' के सामने सिद्धार्थ शंकर रे की गवाही ही उनके इस दावे को धराशायी करती है। सिद्धार्थ शंकर रे ने शाह आयोग के सामने कहा कि असल में वह इंदिरा गांधी के साथ 25 जून को सुबह 9 बजे राष्ट्रपति से मिलने जा रहे थे, तभी रास्ते में इंदिरा गांधी ने कहा कि क्या राष्ट्रपति बिना कैबिनेट की मंजूरी हुए आंतरिक आपातकाल लागू कर देंगे। इस पर सिद्धार्थ शंकर ने उन्हें इस पक्ष पर कानूनी राय लेने के लिए कुछ वक्त मांगा, तो वे रास्ते से ही प्रधानमंत्री आवास लौट आए थे। बाद में उन्होंने इंदिरा गांधी को बताया कि कार्य संचालन नियमावली के नियम 12 के मुताबिक वे कैबिनेट बैठक से पहले भी राष्ट्रपति से आग्रह कर सकती हैं। शाम को जब वे दोनों राष्ट्रपति से मिले तो आपातकाल की सिफारिश में जयप्रकाश नारायण के भाषण को मुख्य आधार बना दिया गया था, जबकि आपातकाल लगाने का फैसला 24 जून को ही ले लिया गया था।
उस समय के वरिष्ठ पत्रकार डी.आर. मानकेकर ने अपनी पुस्तक 'डेक्लाइन एंड फाल ऑफ इंदिरा गांधी' में लिखा है कि जयप्रकाश नारायण का भाषण खत्म होने के बाद रात करीब साढ़े आठ बजे सिद्धार्थ शंकर रे को अपने साथ लेकर इंदिरा गांधी राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलीं (सिद्धार्थ शंकर रे उस समय कैबिनेट के मंत्री भी नहीं थे, वह पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे) और उन्हें जयप्रकाश नारायण की ओर से देश की सेना को सरकार के आदेश न मानने की सलाह देने का हवाला देते हुए देश के हालात का ब्योरा दिया। उन्होंने राष्ट्रपति से कहा कि संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत 'आंतरिक आपातकाल' लागू करना जरूरी हो गया है। वह इंदिरा गांधी की कृपा से ही राष्ट्रपति बने थे, उनका ना-नुकर करने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद रात 11 बजे गृहमंत्री ब्रह्मानंद रेड्डी को प्रधानमंत्री आवास बुलाया गया, जहां इंदिरा गांधी ने उन्हें 'आंतरिक आपातकाल' लगाने और राष्ट्रपति की सहमति की जानकारी दी। कई जगह पर यह जिक्र आया है कि गृहमंत्री के नाम से एक चिट्ठी टाइप करवाई गई थी, हालांकि, वह चिट्ठी अभी तक बाहर नहीं आई है। इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति के नाम अपनी ओर से एक चिट्ठी टाइप करवाई थी, जिसमें उन हालातों का जिक्र किया गया था, जिन हालातों में कैबिनेट की बैठक नहीं बुलाई जा सकी थी।
उन्होंने राष्ट्रपति से वादा किया था कि वह जल्द से जल्द कैबिनेट की मंजूरी लेकर सूचना माध्यमों से देश की जनता को फैसले से अवगत करवा देंगी। रात ग्यारह बजे आर.के. धवन सादे कागज पर टाइप की हुई इंदिरा गांधी के बिना दस्तखत वाली चिट्ठी और 'आंतरिक आपातकाल' लगाने के आदेश का ड्राफ्ट लेकर राष्ट्रपति भवन गए, जो सादे कागज पर प्रधानमंत्री आवास में ही टाइप हुआ था। राष्ट्रपति के दस्तखत वाला सादे कागज पर टाइप किया गया वह आदेश और राष्ट्रपति क्या सोचते थे, राष्ट्रपति भवन में उस दिन क्या हुआ था, यह भी इतिहास के पन्नों में दर्ज होना चाहिए। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने रात लगभग 11:15 बजे अपने सचिव के. बालचंद्रन को बुलाया। दस मिनट बाद बालचंद्रन ने राष्ट्रपति भवन स्थित अपने आधिकारिक आवास के निजी बैठक कक्ष में पाजामा पहने राष्ट्रपति से मुलाकात की। राष्ट्रपति ने अपने सचिव को इंदिरा गांधी का एक पेज का पत्र सौंपा, जिस पर 'अति गोपनीय' लिखा था। उस दिन पहले प्रधानमंत्री की राष्ट्रपति के साथ हुई चर्चा का हवाला देते हुए, पत्र में कहा गया था कि उन्हें सूचना मिली है कि आंतरिक अशांति भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक आसन्न खतरा पैदा कर रही है। इसमें अनुरोध किया गया था कि यदि राष्ट्रपति इस मुद्दे पर संतुष्ट हों तो अनुच्छेद 352(1) के अंतर्गत आपातकाल की घोषणा कर दी जाए। वह पहले मंत्रिमंडल से परामर्श करना पसंद करतीं, लेकिन समय गंवाने का कोई सवाल ही नहीं था। इसलिए, वह नियम 12 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए कार्य संचालन नियमों को दरकिनार करने का निवेदन कर रही थीं।
''राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने रात लगभग 11.15 पर अपने सचिव बालचंद्रन को बुलाया, दस मिनट के अंदर वह उन्हें मिलने पहुंच गए, राष्ट्रपति उस समय राष्ट्रपति भवन के अपने व्यक्तिगत सीटिंग रूम में पाजामा पहने हुए बैठे थे। राष्ट्रपति ने इंदिरा गांधी का वह पत्र उनको दिया और उस पर उनकी राय मांगी। बालचंद्रन ने कहा कि ऐसी घोषणा एक से ज्यादा आधारों पर संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है। इस पर राष्ट्रपति ने कहा कि वह संविधान की प्रति देखना चाहते हैं। बालचंद्रन संविधान की प्रति ढूंढ़ने के लिए अपने कार्यालय में चले गए। इसी बीच, राष्ट्रपति सचिवालय में उप-सचिव संविधान की प्रति लेकर आ पहुंचे। राष्ट्रपति के कमरे में पहुंचने से पहले दोनों ने सलाह की, तब दोनों ने राष्ट्रपति को जाकर बताया कि देश में आंतरिक अशांति पर राष्ट्रपति की व्यक्तिगत संतुष्टि का कोई मतलब नहीं है, संवैधानिक तौर पर मंत्रिमंडल की सलाह जरूरी है। इस पर जब राष्ट्रपति ने कहा कि वह प्रधानमंत्री से फोन पर बात करना चाहते हैं तो बालचंद्रन वहां से चले गए। दस मिनट बाद जब वह फिर से कमरे में दाखिल हुए तो राष्ट्रपति अहमद ने उन्हें बताया कि आर. के. धवन आपातकाल की घोषणा का मसौदा लेकर आए थे, जिस पर उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए हैं। फिर राष्ट्रपति ने एक ट्रैंक्विलाइजर निगल लिया और सोने के लिए बेडरूम में चले गए।''
संवैधानिक औचित्य के प्रति राष्ट्रपति के स्टाफ की यह देर रात की चिंता समझने वाली बात है। संविधान की एक प्रति ढूंढ़ी गई, उसके पन्ने पलटकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि प्रधानमंत्री की तरफ से जो ड्राफ्ट भेजा गया था, वह कानून के मुताबिक सही है भी या नहीं? क्या मंत्रिमंडल की मंजूरी के बिना आपातकाल की घोषणा किया जाना ठीक है? चर्चा का सार आपातकाल की घोषणा करने में अपनाई जानेवाली प्रक्रियाओं की कानूनी वैधता से संबंधित था, लेकिन फखरुद्दीन अली अहमद ने फोन पर इंदिरा गांधी से बात करने के बाद इन बारीकियों में जाना उचित नहीं समझा। उन्होंने इंदिरा गांधी के गुलाम की तरह उनकी हां में हां मिला दी, जबकि उन्होंने संविधान की रक्षा की शपथ ली थी, न कि प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत सुरक्षा की। क्या वह संतुष्ट थे कि जे.पी. का आंदोलन देश में अशांति फैसला रहा था? क्या कहीं बहुत बड़ी हिंसा की घटना हुई थी? अगर बिहार में छिटपुट घटनाएं हुई थीं तो कानून व्यवस्था राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। सारे देश में कौन सी हिंसा हो रही थी? इंदिरा गांधी ने संविधान में लिखे इस वाक्य का दुरुपयोग किया था कि 'आंतरिक अशांति' के कारण 'आंतरिक आपातकाल' लगाया जा सकता है। आपातकाल के बाद बनी मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने सबसे पहला काम यह किया कि संविधान संशोधन करके 'आंतरिक अशांति' की जगह पर 'सेना का विद्रोह' कर दिया। अब 'आंतरिक आपातकाल' तभी लग सकता है, जब सेना विद्रोह करे।
(अजय सेतिया की पुस्तक , 'आपातकाल : आन्दोलन और विश्वासघात की अंतर्कथा' के अंश। इसका प्रकाशन प्रभात प्रकाशन ने किया है।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद

