भारत फिर से ‘सुजलाम् सुफलाम्’ कैसे बनेगा ?
प्रो. अरविंद कडबे, ओलावा फाउंडेशन
‘सुजलाम् सुफलाम्’ के रूप में गौरवान्वित भारत के सामने आज जल का गंभीर संकट खड़ा है। देश में हर वर्ष बड़ी मात्रा में वर्षा होती है। हिमालय से निकलने वाली नदियों को वर्षा के साथ-साथ गर्मियों में हिम पिघलने से भी पानी मिलता है। इसके बावजूद अनेक नदियाँ, नाले और छोटी जलधाराएँ आज मौसमी हो गई हैं। भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, अनेक जलस्रोत प्रदूषित हो चुके हैं और कृषि के सामने पानी की गंभीर चुनौती खड़ी है।
मूल समस्या केवल वर्षा की मात्रा की नहीं है; समस्या है वर्षा के पानी का जमीन में समाना, उसका संरक्षण, भूजल का पुनर्भरण और नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखना।
भारत में लंबे समय तक पारंपरिक, प्राकृतिक और स्थानीय संसाधनों पर आधारित कृषि की जाती रही। स्थानीय जलवायु, मिट्टी और पानी की उपलब्धता के अनुसार विभिन्न फसलों की खेती होती थी। कृषि और पशुधन एक-दूसरे के पूरक थे।
स्वतंत्रता के बाद औद्योगिकीकरण के साथ कृषि उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता महसूस हुई। हरित क्रांति के दौर में रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों और सिंचाई का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हुआ। पंजाब, हरियाणा और देश के अन्य क्षेत्रों में इस कृषि मॉडल से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
हालाँकि, समय के साथ इस कृषि मॉडल के कुछ दुष्प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता महसूस हुई। रासायनिक कृषि के साथ बढ़ी सिंचाई की आवश्यकता, भूजल का अत्यधिक दोहन, मिट्टी में जैविक कार्बन एवं जैव विविधता का ह्रास तथा रासायनिक प्रदूषण ने पर्यावरण पर प्रभाव डाला है।
कृषि के लिए पानी की आवश्यकता बढ़ने के कारण कुओं, बोरवेल, नहरों और बाँधों पर निर्भरता भी बढ़ती गई। जिन क्षेत्रों में नहर का पानी नहीं पहुँच सका, वहाँ भूजल आधारित सिंचाई का विस्तार हुआ। परिणामस्वरूप अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार नीचे चला गया।
वर्षा का पानी जमीन में समाना क्यों आवश्यक है?
वर्षा का पानी सीधे बह जाने के बजाय बड़ी मात्रा में जमीन में समाना प्राकृतिक जलचक्र की अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
स्वस्थ, जैविक पदार्थों से समृद्ध और जैविक रूप से सक्रिय मिट्टी वर्षा के पानी को अधिक प्रभावी ढंग से सोख सकती है। मिट्टी में मौजूद केंचुए, सूक्ष्मजीव, जैविक पदार्थ और मिट्टी की संरचना पानी के रिसाव और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जब वर्षा का पानी जमीन में समाता है, तो भूजल भंडार का पुनर्भरण होता है। इसी भूजल का कुछ भाग प्राकृतिक झरनों, नालों और नदी के प्रवाह के रूप में सतह पर आता है। इससे नदी केवल वर्षा ऋतु में बहने वाली जलधारा न रहकर वर्षभर प्रवाहित रहने में सक्षम हो सकती है।
इसके विपरीत, यदि मिट्टी का क्षरण बढ़े, उसकी जलधारण क्षमता कम हो और वर्षा का पानी तेजी से बह जाए, तो एक ओर बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है और दूसरी ओर गर्मियों में जलस्रोत सूख सकते हैं।
इसलिए यदि नदी को बचाना है तो नदी के उद्गम से लेकर उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र की कृषि भूमि तक संपूर्ण जलचक्र को समझना और उसका संरक्षण करना आवश्यक है।
भूजल : जमीन के नीचे का अदृश्य जलाशय
भूजल भारत की जल सुरक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार है। लेकिन अनेक क्षेत्रों में कुओं और बोरवेल के माध्यम से भूजल का दोहन प्राकृतिक पुनर्भरण की क्षमता से अधिक हो गया है।
कृषि, उद्योग और बढ़ती शहरी आबादी के कारण पानी की माँग लगातार बढ़ रही है। इसके साथ वर्षा के बदलते स्वरूप, बढ़ते तापमान, जल प्रदूषण और जल प्रबंधन की कमियों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
केवल नए बोरवेल खोदकर इस संकट का समाधान नहीं किया जा सकता। जितना पानी हम जमीन से निकालते हैं, उसके अनुपात में पर्याप्त पानी वापस जमीन में पहुँचाना भी आवश्यक है।
बाँध, नहरें और शहरों की बढ़ती पानी की आवश्यकता
पिछले कई दशकों में सिंचाई के लिए देश में बड़े पैमाने पर बाँध और नहरें बनाई गई हैं। इन जल संरचनाओं ने कृषि, उद्योग और शहरों को पानी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण अनेक जलाशयों पर कई प्रकार की जल आवश्यकताओं का दबाव बढ़ गया है।
शहरों को पेयजल, उद्योगों को पानी और किसानों को सिंचाई—इन सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हुए जल संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। इसलिए केवल बड़े बाँध बनाना जल संकट का अंतिम समाधान नहीं हो सकता।
बड़े जलाशयों के साथ-साथ छोटे जलसंधारण कार्य, खेतों में पानी रोकना, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जलग्रहण क्षेत्र का प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
नदी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कौन ?
जब नदी प्रदूषित होती है तो हम अक्सर सरकार की ओर देखते हैं। सरकार की जिम्मेदारी निश्चित रूप से है; लेकिन नागरिक के रूप में हमारी भी जिम्मेदारी है।
घरेलू सीवेज, प्लास्टिक, ठोस कचरा, औद्योगिक अपशिष्ट, रासायनिक प्रदूषक और नदी क्षेत्रों में होने वाला अतिक्रमण- इन सभी का संयुक्त प्रभाव नदी पर पड़ता है।
भारत की आबादी बहुत बड़ी है। इसलिए प्रत्येक नागरिक की गतिविधि का सामूहिक प्रभाव भी बहुत बड़ा होता है।
नदी को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है; नदी तक पहुँचने वाले प्रदूषण को रोकना समाज की भी सामूहिक जिम्मेदारी है।
शहरों को इस्तेमाल किए गए पानी का पुनः उपयोग करना होगा
शहरी क्षेत्रों का सीवेज एक बड़ी समस्या है, लेकिन उचित तकनीक और प्रबंधन के माध्यम से इसे संसाधन में बदला जा सकता है।
बड़े आवासीय परिसरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट प्रभावी रूप से चलाना, उपचारित पानी का बागवानी, फ्लशिंग, औद्योगिक उपयोग अथवा अन्य उपयुक्त कार्यों में पुनः उपयोग करना आवश्यक है।
इसी प्रकार महानगरपालिका, नगरपालिका और नगर परिषदों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता बढ़ानी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बिना उपचारित सीवेज नदी या नाले में न जाए।
उद्योगों के लिए भी ‘Recycle and Reuse’ के सिद्धांत को प्राथमिकता देना आवश्यक है। जहाँ संभव हो, Zero Liquid Discharge अथवा न्यूनतम तरल अपशिष्ट उत्सर्जन वाली तकनीकों को अपनाने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
कृषि को नए दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता
भारतीय कृषि आज पानी, उत्पादन लागत, बाजार मूल्य, मिट्टी की घटती उर्वरता, जलवायु परिवर्तन और छोटे किसानों की समस्याओं जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है।
भारत में बड़ी संख्या में किसान छोटे और सीमांत भू-स्वामी हैं। इसलिए प्रत्येक किसान के लिए बड़े पैमाने पर कुआँ, खेत-तालाब या सिंचाई व्यवस्था बनाना संभव नहीं है।
सरकार को जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने, मृदा संरक्षण और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप फसल नियोजन को प्रोत्साहित करना चाहिए।
यदि जैविक या प्राकृतिक कृषि की ओर संक्रमण करना है, तो केवल किसानों को सलाह देने से काम नहीं चलेगा। उन्हें प्रशिक्षण, बाजार, संक्रमण काल के लिए आर्थिक सहायता, स्थानीय जैविक संसाधन और उचित तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराना होगा।
स्वतंत्र ‘किसान बजट’ की आवश्यकता
भारत की खाद्य सुरक्षा किसान पर निर्भर है। इसलिए किसान की आय, उत्पादन लागत और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण—इन तीनों को एक साथ ध्यान में रखना आवश्यक है।
कृषि उपज को उचित मूल्य मिलना, उत्पादन लागत कम करना, पानी और बिजली का कुशल उपयोग, भंडारण एवं प्रसंस्करण उद्योग बढ़ाना और किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना—इन विषयों पर नीतिगत प्राथमिकता आवश्यक है।
किसान सशक्त होगा तो वह केवल अपने जीवन स्तर को ही बेहतर नहीं करेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा।
गाँवों की ओर फिर से लौटने का समय
भारत का विकास केवल महानगरों के विस्तार पर आधारित नहीं होना चाहिए। शहरों की ओर बढ़ता पलायन, बढ़ती आबादी, यातायात, पानी, कचरा और रोजगार की समस्याओं को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और मूलभूत सुविधाओं को बढ़ाना आवश्यक है।
गाँवों में कृषि, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण, लघु उद्योग, जैविक उत्पाद और स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएँ तो शहरों की ओर होने वाला अनावश्यक पलायन कम किया जा सकता है।
गाँव बचेंगे तो खेती बचेगी; खेती बचेगी तो खाद्य सुरक्षा बचेगी; और जलस्रोत बचेंगे तो गाँव बचेंगे।
‘बायोसैनिटाइज़र’ और जैविक तकनीक की अवधारणा
नदी, सीवेज और कृषि के बीच जैविक संबंध को पुनर्स्थापित करने के लिए जैविक तकनीक के उपयोग की अवधारणा सामने आ रही है। इसी संदर्भ में ‘Biosanitizer’ नामक जैविक स्वच्छता-सहायक तकनीक के उपयोग का प्रस्ताव रखा जाता है।
सीवेज ट्रीटमेंट को अधिक प्रभावी बनाना, उपचारित पानी का पुनः उपयोग बढ़ाना और नदियों में जाने वाले प्रदूषकों की मात्रा कम करना—इन उद्देश्यों के लिए ऐसी तकनीकों का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया जा सकता है।
हालाँकि, किसी भी तकनीक को अपनाने से पहले उसकी वैज्ञानिक जाँच, पर्यावरणीय प्रभाव, सुरक्षा, प्रभावशीलता और लागत-प्रभावशीलता का स्वतंत्र मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है। नदी पुनर्जीवन के लिए किसी एक तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन, सीवेज ट्रीटमेंट, जल पुनः उपयोग, मृदा संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण को एकीकृत रूप से लागू करना आवश्यक है।
पशुधन, जैविक संसाधन और कृषि
पारंपरिक भारतीय कृषि में पशुधन का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। गोबर, गोमूत्र और अन्य जैविक संसाधनों का उपयोग मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने के लिए किया जाता था।
आज इस पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से फिर से देखने की आवश्यकता है। पशुधन, जैविक खाद, कम्पोस्ट, जैविक कृषि-इनपुट और मिट्टी के स्वास्थ्य के बीच संबंधों का अध्ययन करके स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त कृषि मॉडल विकसित किए जा सकते हैं।
परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच संघर्ष करने के बजाय दोनों का विवेकपूर्ण समन्वय समय की आवश्यकता है।
भारत को फिर से ‘सुजलाम् सुफलाम्’ बनाने का मार्ग
भारत को जल संकट से बाहर निकालने के लिए केवल अधिक बाँध, अधिक बोरवेल या अधिक जलापूर्ति योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं।
हमें संपूर्ण जलचक्र पर ध्यान देना होगा—
वर्षा के पानी को जमीन में अधिक से अधिक समाहित करना।
भूजल पुनर्भरण बढ़ाना।
मिट्टी का स्वास्थ्य सुधारना।
कृषि में पानी का कुशल उपयोग करना।
रासायनिक कृषि-इनपुट का विवेकपूर्ण उपयोग तथा जैविक/प्राकृतिक कृषि को वैज्ञानिक आधार देना।
औद्योगिक अपशिष्ट जल पर कठोर नियंत्रण रखना।
शहरों में सीवेज का उपचार करके उसका पुनः उपयोग करना।
नदियों, नालों और जलस्रोतों में ठोस कचरा तथा अनुपचारित सीवेज जाने से रोकना।
स्थानीय स्तर पर जलसंधारण और जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन को मजबूत करना।
किसानों को उचित आर्थिक और तकनीकी सहायता देना।
वर्षा प्रकृति का वरदान है; लेकिन यदि वर्षा का पानी जमीन पर गिरकर बह जाए तो उसका बड़ा हिस्सा हम खो देते हैं। यही पानी यदि मिट्टी में समाए, भूजल भंडार बढ़ाए, झरनों और नालों को पुनर्जीवित करे और नदी को वर्षभर प्राकृतिक प्रवाह प्रदान करे, तो जलचक्र अधिक मजबूत होगा।
नदी को बचाना है तो केवल नदी में पानी छोड़ना पर्याप्त नहीं; नदी के आसपास के क्षेत्र में पानी को जमीन में उतारना भी आवश्यक है।
भारत की भविष्य की जल सुरक्षा केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर नहीं है। इसमें किसान, उद्योग, स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ और प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
गौमाता, भूमाता और गंगामाता—इन भावनात्मक प्रतीकों से आगे बढ़कर इनके पीछे मौजूद जैविक, पर्यावरणीय और आर्थिक संबंधों को समझने की आवश्यकता है।
भारत को फिर से ‘सुजलाम् सुफलाम्’ बनाना है तो हमें प्रकृति से संघर्ष करने के बजाय प्रकृति के जलचक्र के अनुरूप विकास का मार्ग अपनाना होगा।
पानी बचाना केवल पानी को संग्रहित करना नहीं है;
जहाँ पानी गिरता है, वहीं उसे जमीन में उतारना,
जहाँ पानी उपयोग होता है, वहाँ उसका पुनः उपयोग करना,
और जहाँ नदी बहती है, वहाँ उसके प्राकृतिक जीवन को बनाए रखना ही वास्तविक जल संरक्षण है।
यही भारत के जल भविष्य की सही दिशा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुलकर्णी

