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सीसैटः संसद से उठी व्यवस्था बदलने की मांग

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सीसैटः संसद से उठी व्यवस्था बदलने की मांग


अभिषेक शुक्ल

पहली अक्टूबर 2026 को संघ लोक सेवा आयोग ने अपनी स्थापना के 100 गौरवशाली वर्ष पूरे कर लिए हैं। एक सदी से भारतीय प्रशासन का 'लौह ढांचा' तैयार करने वाला यह संस्थान आज अपनी ही मूल्यांकन पद्धति विशेषकर प्रारंभिक परीक्षा (सीसैट) के कारण गहरे सवालों के घेरे में है। इसी परिप्रेक्ष्य में, बृजलाल की अध्यक्षता वाली संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 160वीं रिपोर्ट में सीसैट के वर्तमान स्वरूप पर गहरी चिंता जताई है। समिति के अनुसार, सीसैट का कठिन गणितीय स्तर मानविकी, हिंदी माध्यम और ग्रामीण छात्रों के लिए एक अनुचित बाधा बन गया है। आंकड़े बताते हैं कि वर्तमान में चयनित 65-70% अभ्यर्थी तकनीकी (इंजीनियरिंग/मेडिकल) पृष्ठभूमि से हैं। संघ लोक सेवा आयोग के 100वें वर्ष में पनपा यह रुझान प्रशासन में सामाजिक और वैचारिक विविधता के लिए एक बड़ा संकट है।

मार्च 2026 में, राज्यसभा सदस्य और पूर्व पुलिस अधिकारी बृजलाल के नेतृत्व वाली कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 160 वीं रिपोर्ट में अभिवृत्ति परीक्षा (सीसैट) के वर्तमान ढांचे पर गहरी चिंता जताई है। समिति का स्पष्ट मत है कि परीक्षा का उच्च गणितीय और विश्लेषणात्मक स्तर मानविकी, गैर-इंजीनियरिंग, हिंदी माध्यम और ग्रामीण क्षेत्रों के अभ्यर्थियों के लिए एक अनुचित और पार न करने योग्य बाधा बन गया है। सांख्यिकीय आंकड़ों पर गौर करें तो, वर्तमान में सिविल सेवाओं में चयनित होने वाले लगभग 65 - 70 प्रतिशत अभ्यर्थी इंजीनियरिंग और चिकित्सा जैसी तकनीकी पृष्ठभूमि से संबंध रखते हैं। यह रुझान प्रशासन में वैचारिक विविधता और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व के समक्ष एक बड़ा संकट खड़ा कर रहा है। यह रिपोर्ट इस परीक्षा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इसके क्रमिक विकास, कानूनी विवादों, कट-ऑफ पर इसके सांख्यिकीय असर और संसदीय समिति के सुझावों की गहन समीक्षा करती है।

भारतीय सिविल सेवा परीक्षा का ढांचा समय-समय पर विशेषज्ञ समितियों के सुझावों के आधार पर बदलता रहा है। इसका मूल ध्येय प्रशासन की नई चुनौतियों के अनुसार अधिक दक्ष अधिकारियों का चयन करना रहा है। वर्ष 1976 में डी. एस. कोठारी समिति की अनुशंसाओं के आधार पर प्रारंभिक, मुख्य और साक्षात्कार वाले त्रिस्तरीय प्रारूप को अपनाया गया था। इसके बाद, 1989 में सतीश चंद्र समिति ने निबंध के अनिवार्य प्रश्नपत्र को जोड़ा।

इस दिशा में सबसे बड़ा वैचारिक बदलाव 2001 में प्रोफेसर वाई. के. अलघ समिति की रिपोर्ट से आया। इस समिति ने वकालत की कि प्रारंभिक स्तर पर अभ्यर्थियों का मूल्यांकन उनके वैकल्पिक विषयों के बजाय एक साझा प्रश्नपत्र के जरिए होना चाहिए। इसका उद्देश्य सभी अभ्यर्थियों को समान अवसर उपलब्ध कराना था, ताकि अलग-अलग विषयों के कारण अंकों के मानकीकरण में आने वाली विसंगतियों को खत्म किया जा सके। इसके बाद, वर्ष 2009 - 10 में प्रोफेसर एस. के. खन्ना की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनी, जिसने इस नए अभिवृत्ति परीक्षण का पाठ्यक्रम तैयार किया। अंततः वर्ष 2011 में प्रारंभिक परीक्षा से वैकल्पिक विषय को हटाकर इसे सामान्य अध्ययन के द्वितीय प्रश्नपत्र के रूप में लागू कर दिया गया। शुरुआत के कुछ वर्षों (2011 - 2014) में इसके अंक मेरिट में जोड़े जाते थे, जिसने परीक्षा की पूरी दिशा ही बदल दी।

इस नई व्यवस्था के लागू होने के कुछ ही वर्षों में इसके दूरगामी परिणाम दिखने लगे। इंजीनियरिंग, प्रबंधन और विज्ञान के छात्रों ने गणित, तार्किक क्षमता और अंग्रेजी बोधगम्यता वाले हिस्सों में बहुत अधिक अंक हासिल किए। इसके उलट, मानविकी और भारतीय भाषाओं के अभ्यर्थियों की सफलता दर तेजी से गिरी। अरुण निगवेकर समिति (2011) ने भी माना कि यह प्रारूप शहरी और अंग्रेजी माध्यम के अभ्यर्थियों के पक्ष में झुका हुआ है।

वर्ष 2013 - 2014 आते-आते यह असंतोष एक बड़े छात्र आंदोलन में बदल गया। दिल्ली के मुखर्जी नगर जैसे केंद्रों पर भारी प्रदर्शन हुए। इसका एक बड़ा कारण मशीनी अनुवाद की भयंकर गलतियां थीं। उदाहरण के तौर पर, अंग्रेजी के 'इस्पात संयंत्र' वाले शब्द को हिंदी में 'लोहे का पौधा' अनुवादित कर दिया गया। ऐसी गलतियों ने हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए तार्किक प्रश्नों को समझना असंभव बना दिया। भारी राजनीतिक दबाव के बाद, सरकार ने वर्ष 2015 से इस अभिवृत्ति परीक्षण को पूरी तरह से अर्हकारी (केवल पास करने योग्य) बना दिया। नए नियमों के तहत अभ्यर्थियों को 200 में से केवल 33 प्रतिशत (छियासठ दशमलव छह सात अंक) लाना अनिवार्य कर दिया गया और मेरिट केवल प्रथम प्रश्नपत्र के आधार पर बनने लगी।

शुरुआती वर्षों में अभ्यर्थियों ने इस अर्हकारी प्रश्नपत्र को आसानी से पार कर लिया, लेकिन वर्ष 2021 से आयोग ने इसके प्रश्नों की जटिलता और विषयवार भारांक में भारी बदलाव करना शुरू कर दिया। वर्ष 2023 और 2024 के प्रश्नपत्रों ने यह साबित कर दिया कि यह परीक्षा अब दसवीं कक्षा के अपने निर्धारित स्तर से बहुत आगे निकल चुकी है।

विषयवार रुझानों का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि यह प्रश्नपत्र अब छंटनी का सबसे बड़ा हथियार बन गया है। वर्ष 2021 में जहाँ गणित के 35 और तर्कशक्ति के 18 प्रश्न पूछे गए थे, वहीं 2023 में गणित के सर्वाधिक 43 प्रश्न पूछे गए, जो पूरे प्रश्नपत्र का आधे से अधिक था। इस दौरान बोधगम्यता के प्रश्न 26 के आसपास स्थिर रहे, लेकिन तर्कशक्ति के प्रश्न घटकर 11 रह गए। सबसे अधिक ध्यान संख्या पद्धति और क्रमचय-संचय जैसे उच्च स्तरीय विषयों पर केंद्रित कर दिया गया। प्रश्नों के स्वरूप में भी बदलाव आया; अब 'आंकड़े की पर्याप्तता' और 'कथन आधारित' प्रश्न अधिक पूछे जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर प्रबंधन (कैट) और प्रौद्योगिकी संस्थानों की संयुक्त प्रवेश परीक्षाओं से प्रेरित लगते हैं। बोधगम्यता के अनुच्छेदों को भी दार्शनिक और अत्यधिक गूढ़ बना दिया गया है। नकारात्मक अंकन (प्रत्येक गलत उत्तर पर शून्य दशमलव आठ तीन अंक की कटौती) के चलते सीमित समय में इन्हें हल करना गैर-विज्ञान पृष्ठभूमि वालों के लिए विनाशकारी साबित हुआ है।

भले ही इसके अंक अंतिम मेरिट में नहीं जुड़ते, लेकिन प्रथम प्रश्नपत्र की कट-ऑफ पर इसका असर बहुत गहरा है। सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 में सामान्य वर्ग का कट-ऑफ 98 अंक था, जो धीरे-धीरे गिरकर 2022 में 88.22 पर आ गया। लेकिन 2023 में यह ऐतिहासिक रूप से गिरकर 75.41 पर आ गया। 2024 में थोड़ा संतुलन आने पर सामान्य वर्ग का कट-ऑफ फिर से 87.98 पर पहुंचा। कट-ऑफ में आई इस भारी गिरावट का मुख्य कारण यह था कि प्रथम प्रश्नपत्र में बहुत अच्छे अंक लाने वाले मेधावी छात्र अर्हकारी प्रश्नपत्र की न्यूनतम अर्हता भी प्राप्त नहीं कर सके और दौड़ से बाहर हो गए।

आयोग की 73 वीं और 74 वीं वार्षिक रिपोर्ट स्पष्ट रूप से एक तकनीकी नौकरशाही के उभार की पुष्टि करती है। अंतिम रूप से सफल होने वाले अभ्यर्थियों में इंजीनियरिंग और विज्ञान के छात्रों का दबदबा 65 से 75 प्रतिशत तक पहुँच गया है, जबकि मानविकी पृष्ठभूमि वालों की हिस्सेदारी गिरकर 23 प्रतिशत रह गई है।

विडंबना यह है कि 74 वीं रिपोर्ट के अनुसार सफलता दर मानविकी विषयों में कहीं अधिक है। हिंदी साहित्य में यह लगभग 14.6 प्रतिशत, लोक प्रशासन में 8.8 प्रतिशत, राजनीति विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंध में लगभग 8 प्रतिशत, समाजशास्त्र में 7.8 प्रतिशत और भूगोल में 7.5 प्रतिशत रही। इसका सीधा अर्थ है कि समस्या मानविकी के पाठ्यक्रम में नहीं है, बल्कि प्रारंभिक स्तर की परीक्षा में है, जो कला के वास्तविक स्नातकों को पहले ही चरण में बाहर कर देती है।

इस पूरी व्यवस्था का सबसे नकारात्मक असर हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों पर पड़ा है। संसदीय आंकड़ों के अनुसार, जहां पहले हिंदी माध्यम से 15 - 20 प्रतिशत छात्र चयनित होते थे, वहीं अब यह संख्या नगण्य हो गई है। 2021 में मुख्य परीक्षा देने वाले 538 हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों में से केवल 10 को शीर्ष प्रशासनिक एवं पुलिस सेवा के लिए अनुशंसित किया गया। यह आंकड़ा 2022 में 27, 2023 में 14 रहा और 2024 में 1133 अभ्यर्थियों के मुख्य परीक्षा देने के बावजूद मात्र 5 अभ्यर्थी ही शीर्ष पदों तक पहुँच सके। इसके पीछे क्लिष्ट अनुवाद, पठन सामग्री का अभाव और स्कूली शिक्षा व्यवस्था की सीमाएं सबसे प्रमुख कारण हैं।

इन तमाम ढांचागत मुद्दों को संज्ञान में लेते हुए संसदीय स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि आयोग को इस परीक्षा के पाठ्यक्रम और कठिनाई स्तर की समग्र समीक्षा करनी चाहिए। इसे अनुभवजन्य तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर इस तरह तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए कि किसी विशेष शैक्षणिक पृष्ठभूमि को अनुचित लाभ न मिले।

संसदीय रिपोर्ट ने एक बार फिर इस बहस को जीवित कर दिया है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश को किस प्रकार के प्रशासकों की आवश्यकता है। प्रशासन केवल गणितीय पहेलियों को सुलझाने का काम नहीं है; इसके लिए समाजशास्त्रीय समझ, समावेशी दृष्टिकोण और हाशिए पर खड़े लोगों के प्रति गहरी संवेदना की आवश्यकता होती है। वर्तमान स्वरूप ने अनजाने में ऐसी नौकरशाही को जन्म दिया है, जहां विचारों की विविधता का अभाव हो सकता है।

आज के आंकड़ा-संचालित युग में त्वरित निर्णय लेने की क्षमता का परीक्षण जरूरी है, लेकिन अर्हकारी परीक्षा को ऐसी बाधा दौड़ नहीं बनाना चाहिए जिसे केवल तकनीकी रूप से प्रशिक्षित लोग ही पार कर सकें। आयोग और संबंधित विभागों को संसदीय समिति के सुझावों पर त्वरित और साक्ष्य-आधारित कार्यवाही करनी चाहिए। अनुवाद की गुणवत्ता सुधारने और भाषाई समानता सुनिश्चित करने से ही भारत का प्रशासनिक ढांचा सच्चे अर्थों में समावेशी, संवेदनशील और राष्ट्र की विविधता का प्रतिनिधि बन सकेगा।

अपने 100वें वर्ष के ऐतिहासिक मुकाम पर खड़े संघ लोक सेवा आयोग के लिए, 160वीं संसदीय समिति की यह रिपोर्ट महज एक सुझाव नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है। भारत जैसे विविधतापूर्ण और जटिल समाज को केवल उच्च-स्तरीय गणितीय पहेलियां सुलझाने वाले 'तकनीकी प्रशासकों' की आवश्यकता नहीं है; उसे ऐसे संवेदनशील अधिकारियों की जरूरत है जो समाज के हाशिए पर खड़े लोगों का दर्द समझ सकें।

सीसैट के वर्तमान स्वरूप ने अनजाने में ही सही, लेकिन भारतीय प्रशासन से विचारों की विविधता और भाषाई समानता को तेजी से खत्म करने का काम किया है। यदि कला, मानविकी और हिंदी माध्यम के मेधावी छात्र प्रारंभिक प्रवेश द्वार से ही बाहर होते रहे, तो हमारी प्रशासनिक नीतियां केवल यांत्रिक बनकर रह जाएंगी और अपनी मानवीय संवेदना खो देंगी।

अब समय आ गया है कि संघ लोक सेवा आयोग और सरकार संसदीय समिति की सिफारिशों पर त्वरित अमल करें। सीसैट के कठिनाई स्तर को तर्कसंगत बनाना और अनुवाद की विसंगतियों को दूर करना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता है। व्यवस्था में यह सुधार ही सुनिश्चित करेगा कि भारत का लौह ढांचा तकनीकी रूप से दक्ष होने के साथ-साथ, सही मायनों में समावेशी हो और राष्ट्र की असली विविधता का प्रतिनिधित्व करे।

(लेखक, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद