(नव संवत्सर गुड़ी पड़वा पर विशेष) संभावना के महासागर का मंथन
डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा
हमारी गौरवमयी एवं समृद्ध सनातन सांस्कृति परंपरा के महान पर्व गुड़ी पड़वा, हिंदू नववर्ष पर सब तरफ हर्षोल्लास का वातावरण निर्मित होता हुआ दिखाई देता है। नववर्ष आगमन में प्रकृति ने नूतन साज शृंगार कर लिया है, चन्द्रमा की ओजपूर्ण किरणें वनस्पति जगत सहित हमारे तन मन को आप्लावित करने लगी है, कहीं किसी वृक्ष पर बैठी कोयल मीठे स्वरों में कुहुकने लगी है, गुलाब मोगरा, चमेली, आम, नीम, महुआ की मदमय सुगंध सुरभि जीवन को नई ऊर्जा, नई चेतना एवं नया आयाम देने लगी है, किंशुक सुमन ने अपने मनभावन ओर आग उगलते रंग से हमारे मनोभावों को उद्दीप्त कर दिया है और अमलतास एवं गुलमोहर का उन्मादित सौंदर्य सिर चढ़कर बोलने लगा है। नियति के ऐसे मनमोहक परिदृश्य को निहारते हुए अरण्य निवासी योवनाओं के प्रणय गीतों का गुंजायमान मद्धिम स्वर भी सुनाई देने लगा है। ऐसे रसमय वातावरण में लगता है कि सनातन संस्कृति के प्रतीक नव संवत्सर के स्वागत हेतु नियति नटी ने अपना वैभव लुटाना शुरू कर दिया है। अतः प्रकृति की इस वैभवी कृपा को प्रणाम करते हुए, नव संवत्सर २०८३ का हर्षोल्लास पूर्वक स्वागत अभिनन्दन किया जाना चाहिए।
उत्सव प्रधान हमारे देश में उत्सवी दिनों को पूरी जिंदादिली से मनाया जाता रहा है, और चूंकि हिंदू नववर्ष गुड़ी पड़वा हमारी गौरवमयी एवं समृद्ध सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्व है, इसलिए गुड़ी पड़वा पर हमारी उत्सव धर्मिता की अभिव्यक्ति भी स्वाभाविक ही है। हिंदू नववर्ष के शानदार आगाज से अंतर्मन आनंद की उन्मादकारी सीमाओं को छू लेने को आतुर है, ऐसे रंगारंग उत्सवी माहौल में हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी हमें अपने महाभावों को अभिव्यक्त करने हेतु प्रेरित करती है। अतः महान आध्यात्मिक वैभव से युक्त पंचाक्षर नमः शिवाय और सनातन आध्यात्मिक संस्कृति के महानतम वंदनीय वाक्यों जय श्री राम और जय श्री कृष्ण के महाबोधि संबोधन से हम समवेत स्वरों में सनातन संस्कृति के महापर्व नववर्ष २०८३ गुड़ी पड़वा का स्वागत अभिनन्दन करते हुए नववर्ष के आगमन पर विश्व में शांति और सभी प्राणियों के कल्याण के निमित्त अति प्रासंगिक एवं समीचीन यह शुभमङ्गलकामना करते हैं, कि सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी का जीवन मंगलमय हो, और किसी को भी कोई दुःख न हो।
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः,सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भागभवेत्।
गुड़ी पड़वा से आरंभ नव संवत्सर संपूर्ण विश्व के लिए सुख समृद्धि दायक, अहिंसा, शांति और सौहार्द का संदेश वाहक तथा वैभव कारक होगा और हम जीवन में सर्वोच्च सफलताओं की और अपने कदम बढ़ाते हुए अविरल गति से निरंतर आगे बढ़ते जाएंगे।
जीवन में सर्वोच्चता की और बढ़ने की यह संकल्प शक्ति ही यकीनन हमें एक बेहतर कल की तरफ ले जाती है, जहां से उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, और उस मार्ग पर चलते हुए हम अपनी मंजिल तक पहुंचने में कामयाब हो सकते है, किंतु जीवनपथ में आने वाली वास्तविकताओं को भी हम नहीं नकार सकते, इसलिए उन्हें दृष्टिगत रखते हुए ही हमें अपने उद्देश्य प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होना है।
जीवन के आलोक पथ पर अग्रसर होते हुए मानसिक स्तर पर चाहे हम सागर की अनंत गहराइयों को पा जाएं अथवा विंध्याचल की शैल शृंंखलाओं को अपनी फौलादी बांहों में भर लें, किंतु वास्तविकताओं की विराटता भी हमें बार बार अपनी जमीनी हकीकत बताती ही रहती है, ऐसे में जीवन की वास्तविकताओं से रूबरु होते हुए एवं एक एक दिन के मैदानी अनुभव से ही श्रेष्ठता के आयामों को छुआ जा सकता है। महान् उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उठे कदम अंततः अपनी मंजिल पर पहुंच ही जाते हैं, किंतु जीवन पथ पर आगे बढ़ते हुए हमें यह समझना होगा कि रास्ते कभी भी सीधे सपाट नहीं हुआ करते हैं, इसलिए कठिन रास्तों से गुजरने की क्षमताएं भी हमें पहले ही विकसित करनी होगी, साथ ही हौसलों की बुलंदियों को बरकरार रखना होगा, क्योंकि एक वह हौसला ही तो है, जो भूतकाल की असफलताओं को नई सफलताओं में तब्दील कर देता है, और एक मुकम्मल जहां हमारे हाथों में सौंप देता है।
जीवन में आगे बढ़ते हुए कदाचित् ऐसे से मोड़ भी आते हैं जब धैर्य ही हमारा आदर्श मित्र साबित होता है, क्यौकि धैर्यहीनता ही एक ऐसी बेड़ी है, जो हमारे कदमों को बरबस ही थाम लेती है, तब दिखाई दे रही मंजिल भी सहसा ही दूर दिखाई देने लगती है, और तब उस गतिमान समय की परिधि में आबद्ध हम लोग सहसा ही विचलित हो कर नियति पर नाराज हो जाते हैं, और तब व्यथा की विपरीतता में कह उठते हैं कि एक एक क्षण पहाड़ बन गया है, और जब खुशी का अवसर मिलता है तो कहने लगते हैं कि समय कितना जल्दी व्यतीत हो गया, ऐसा लगता है कि जैसे बात आजकल की ही हो, किंतु वह क्षण न तो पहाड़ की मानिंद था, और न ही चींटी द्वारा ले जाए जा रहे एक महीन कण की तरह अतिलघु ही था, वक्त का वह कतरा परिंदे की तरह आसमान को अपने आगोश में भर लेने के कथित मानसिक भावों से युक्त भी नहीं था, वास्तविकताओं में हमने ही उसे अपने संकीर्ण सुख-दुःखों से, हानि लाभ से या फिर जय-पराजय से संयुक्त कर दिया था, शायद इसीलिए वह शुचि वक्त अच्छा या खराब नाम पा गया। दरअसल वह कालचक्र के परिक्रमा पथ का एक नन्हा सा हिस्सा था, समय का वह एक कतरा था, जिस पर दौड़ते हुए हम कभी उत्कर्ष पर पहुंचे थे, और वह भी समय का ही एक कतरा था, जिस पर चलते हुए कदाचित हम लड़खड़ाते हुए गिर पड़े थे, और तब उस गतिमान शुचि समय को हमारे ही द्वारा कई संज्ञाओं से विभूषित कर दिया गया था, जबकि समय के उसी प्रवाह ने अन्य अनगिनत लोगों को अमृत तत्व से अभिसिंचित भी किया। निश्चित तौर पर उस एक ही समय को देखने का हमारा नजरिया तात्कालिक लाभ हानि के अल्पकालिक प्रवाह से ही संयुक्त था, शायद इसीलिए अनुभूतियां भी पृथक पृथक रूप ग्रहण कर गईं।
समय के उसी महावैभवी पथ पर एक तरफ जहां फूलों की सौंदर्य सुरभि समाई है, वहीं कंटक भी बिखरे पड़े हैं। यह वही पथ है जो एकबारगी हमें लहूलुहान कर देता है, किंतु संभावनाओं का अनन्त सागर भी तो वहीं से आकार ग्रहण करता है। यही है वह अरण्यपथ जो कठिन है, किंतु असीम संभावनाओं एवं उपलब्धियों से युक्त भी है। शायद यही है वह उपलब्धियो से ओतप्रोत रास्ता जिस पर चलते हुए दुविधाओं की सड़ांध समाप्त हो जाती है, और उद्देश्य पूर्ण यात्रा के फूल खिलते हुए दिखाई देते हैं, किंतु हमें यह समझना होगा कि यात्रा की इस सुख सुरभि में कांटों की वेदना भी समाई होती है, इसलिए प्रत्येक कदम सम्हाल कर रखने की जरूरत पेश आती है, क्योंकि कठिन कंटकाकीर्ण मार्ग को, अरण्यपथ को चुन लिया है जिसने, परीक्षाओं के सिलसिले उसके समक्ष कतारबद्ध खड़े नजर आते ही हैं। सफलताओं के ये आसान से लगने वाले रास्ते परीक्षाओं की वह पूर्व दिशा है, जिसे बादलों ने आच्छादित कर रखा है, किंतु सतत प्रयासों रुपी पुरुषार्थ उन्हें छिन्न भिन्न कर देता है, ओर सफलता रुपी स्वर्णिम प्रभात की नूतन रश्मियां प्रस्फुटित हो ही जाती है। कठिनाइयों के उन बेतरतीब सिलसिलों से होकर ही सफलताओं के महाद्वार खुलते हैं। यही है, वह दिव्यतम सुख की अनुभूति का महाद्वार, जहां से आसमानी बुलंदियां हमारे स्वागत समारंभ हेतु तत्पर दिखाई देती है। यही है वह चिरंतन शाश्वत सत्य के अनुसंधान का पथ जहां पर आगे बढ़ जाने पर फिर होकर भी नहीं होने की विराट संभावनाएं दस्तक देने लगती है। यही है वह अमृत का महाकोश, युग युगान्तर से जिसे हम खोजते आए हैं, और जिसकी छत्रछाया ने अनगिनत मानवों को महामानव के रूप में स्थापित कर दिया है।
आलोक पथ की ओर अग्रसर होते हुए तथा अपने कर्तव्य बोध, कर्मशीलता और राष्ट्र हित के महाभावों को सर्वोपरि स्थान प्रदान करते हुए हम पुनः नव संवत्सर 2083 का स्वागत अभिनन्दन करते हैं।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. उमेश चंद्र शर्मा

