नेपाल त्रासदी के सबक
-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
दुनिया के देशों के लिए नेपाल त्रासदी को कमतर करके देखना, बड़ी भूल होगी। साल 2020 की कनाडा की रॉक स्लाइड और 2023 की सिक्किम में साउथ ल्होनक झील की ग्लेशियल फटने की घटना हमारे सामने हैं। यह पहली या अंतिम घटना नहीं है अपितु देखा जाए तो समय रहते प्रयास नहीं किये गये तो ऐसी घटनाओं की आवृति जल्दी-जल्दी और अति विनाशकारी होगी। जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले सालों में जिस तरह से प्रकृति का विकराल रुप देखने को मिल रहा है वह चाहे तूफानों के रुप में हो, चाहे जंगलों में लगती आग के कारण हो, ग्लेशियरों के पिघलने की हो, ग्लेशियलों के फटने की हो, भूकंपों की हो, बैमौसम आंधी बरसात की हो, अतिवृष्टि या अनावृष्टि की हो, मौसम चक्र में भले ही आंशिक परिवर्तन की हो या समुद्र्री तूफानों की बढ़ती फ्रिक्वेंसी की हो बेहद गंभीर हो जाती है।
वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों की लगातार चेतावनी को नजरअंदाज करने का ही परिणाम है कि नेपाल जैसी त्रासदियांं आम हो रही है। यह केवल नेपाल या इससे जुड़े क्षेत्र के लिए ही गंभीर हालात नहीं अपितु अमेरिका, चीन, भारत सहित दुनिया के दस देश नेपाल जैसी त्रासदी के मुहाने पर खड़े हैं। ग्लेशियल फटने या यों कहें किग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी कि ग्लोफ जैसे हालात कभी भी इनके दायरे में आने वाले देशों में हो सकते हैं।
चिंता की बात है कि अभी तक भारत-नेपाल ही नहीं दुनिया के इस दायरे में आने वाला कोई देश इन आपदाओं से निपटने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो सका है। जानकारों की मानें तो भारत, चीन, पाकिस्तान, पेरु के एक करोड़ 50 लाख लोग इनके दायरे में सीधे-सीधे आ रहे हैं। यह वह लोग हैं जो इन ग्लेशियलों के एक किलोमीटर से 10 किलोमीटर के दायरे में रह रहे हैं। आज ग्लोफ खतरे के दायरे में भारत, पाकिस्तान, कनाडा, पेरु, अमेरिका, चिली, इटली, नेपाल और कोलंबिया आए हुए हैं।
आज संवाद या विचार का विषय यह नहीं रह गया है कि नेपाल त्रासदी में कितने लोगों ने जान गंवाई या जन-धन की कितनी हानि हुई है अपितु यह है कि इस तरह की त्रासदी से निपटने के लिए हम कहां तक तैयार हैं। सवाल यह भी है कि ऐसे हालात क्यों होते जा रहे हैं। उत्तराखंड त्रासदी हमारे सामने है और उस त्रासदी के परिणाम सामने होने के बावजूद लगभग साल-दर-साल भूस्खलन के मामले सामने आ रहे हैं।
साफ है कि प्रकृति से एक सीमा से अधिक खिलवाड़ किया जाता है तो विकृति का सामना करना ही पड़ेगा। प्रकृति अपने विकराल रुप में पलटवार करती है। ऐसे में समय के साथ सबक लेना जरुरी है। आज सारी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण की बात तो की जाती है पर उस पर अमल नहीं पा रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो हालात यही रहे तो सदी के अंत तक समुद्र का जलस्तर दो मीटर तक बढ़ सकता है। दूसरी ओर अभी से समुद्र तटीय कई शहर डूबने की जद में आने की चेतावनियां दी जा रही है।
नेपाल की हालिया त्रासदी का कारण ग्लेशियल का फटना माना जा रहा है। दरअसल, ग्लेशियर और ग्लेशियल में हमें भेद करके चलना होगा। ग्लेशियर भौगोलिक संरचना होती है। यह पहाड़ों और ध्रुवों पर लंबे समय से जमा बर्फ खण्ड होते हैं। यह अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण जमे रहते हैं पर जलवायु परिवर्तन और तापमान के बढ़ने के कारण आज बड़ी मात्रा में ग्लेशियर के पिघलने की गति तेज होती जा रही है। ग्लेशियरों के बड़े खण्डों के पिघल कर गिरने से ग्लेशियल झील बनती है। ग्लेशियल झील को हिमनदी झील भी कह सकते हैं। नेपाल की हालिया त्रासदी ग्लेशियल झील के फटने के कारण ही हुई है। वैज्ञानिकों की माने तो ग्लेशियलों के निर्माण की गति में काफी तेजी आई है। यदि हम हिमालय क्षेत्र की ही बात करें तो सतलुज बेसिन में 2019 में 560 ग्लेशियल झीलें थी जो चार साल यानी 2023 तक 1048 हो गई है।
नेपाल त्रासदी ग्लेशियल लेक आदटबर्स्ट फ्लड यानी की ग्लोफ का परिणाम है। साधारण शब्दों में कहा जाए तो यह ग्लेशियल झील के फटने का परिणाम है। ऐसा नहीं है कि वैज्ञानिक इन हालातों पर नजर नहीं रख रहे हैं बल्कि लीड्स विश्वविद्यालय के ग्लेशियल फ्लडिंग के विशेषज्ञ डॉ. जानाथन कारीविक पहले ही इसे लेकर चेता चुके हैं। हमारे देश के ही राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एनडीएमए के विशेषज्ञों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी को रिपोर्ट प्रस्तुत कर हालात से रुबरु कराने के साथ ठोस सुझाव भी दिए हैं।
दरअसल एक सीमा से अधिक प्रकृति से छेड़छाड़ का ही परिणाम इस तरह की त्रासदियां होती हैं। आज लाख चेताने के बावजूद सतलुज बेसिन में बांधों के साथ साथ विद्युत परियोजनाओं सहित विकास परियोजनाओं का दखल बढ़ा है। एक सीमा से अधिक मानवीय दखल बढ़ी है। इससे तापमान में स्वाभाविक रुप से बढ़ोतरी होने के साथ अपशिष्ट भी फैल रहा है।
प्रकृति से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से छेडछाड़ बढ़ रही है। एनडीएमए ने साफ-साफ कहा है कि सतलुज बेसिन में नए निर्माण कार्यां या नई परियोजनाओं की स्वीकृति से पहले उनके परिणामों का भली प्रकार से अध्ययन और विश्लेषण किया जाए। परिणामों का आकलन कर गुणावगुण के आधार पर और पर्यावरणीय परिणामों को देखकर ही निर्णय लिए जाएं। यह भी देखा जाए कि ऐसे स्थानों में मानवीय दखल को सीमित दायरे तक ही रखा जाए। इसके साथ ही जलवायु व पर्यावरण विशेषज्ञों का दायित्व अधिक हो जाता है और आवश्यकता होने पर प्रकृति को बचाने के लिए इस क्षेत्र में कार्य कर रहे गैरसरकारी संगठनों को भी आगे आना होगा। आपदा प्रबंधन का भी ऐसा सिस्टम विकसित करना होगा जिससे ऐसी घटनाओं की समय रहते चेतावनी मिल सके और कम-से-कम जन हानि हो।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

