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हिमनद फटने से आई नेपाल में आपदा

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हिमनद फटने से आई नेपाल में आपदा


प्रमोद भार्गव

नेपाल में तिब्बत से आई बाढ़ से मची तबाही का मूल कारण भूकंप नहीं बल्कि हिमनद का फटकर बाढ़ में परिवर्तित हो जाना है। अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण ने अपना आरंभिक आकलन बदलते हुए कहा है कि यह आपदा भूकंप के कारण नहीं, अपितु एक हिमनद के बम की तरह फटकर ढहने और उसके मलबे के तेज बहाव के कारण आई है। इसके पहले इसी एजेंसी ने गोसाईं कुंड के लगभग 47 किमी उत्तर में 4.4 तीव्रता से आए भूकंप को हिमनद के टूटने का संभावित कारण बताया था। नेपाल के अखबार ‘काठमांडू पोस्ट‘ के अनुसार 7,245 मीटर ऊंची लांगटांग लिरुंग चोटी के उत्तरी हिस्से पर यह हिमस्खलन हुआ है। इससे पहले 2015 में आए भूकंप के केंद्र में भी यही पहाड़ था। हालांकि अभी भी नेपाल से सटे तिब्बत में हिमालय की ऊंचाई पर हिमनद के टूटने से जो बाढ़ आई है, उसके कारणों की पड़ताल की जा रही है। बढ़ते वैश्विक तापमान के चलते जलवायु परिवर्तन भी इस आपदा का कारण माना जाता रहा है। ऐसा है तो दुनिया के विकसित देशों को इस जल प्रलय का समाधान खोजने की जरूरत है।

फिलहाल हिमालयी पर्यावरण बिगाड़ने में चीन का सर्वाधिक योगदान है। इस तबाही की शुरूआत भी नेपाल-चीन सीमा पर बहने वाली ल्हेंदे नदी में बाढ़ के मलबे में आई रुकावट से मानी जा रही है। इस रुकावट के टूटने से पहले एक बड़ी हिमनद झील बन गई थी। इसके फटने से भोटेकोशी नदी में कीचड़ और बड़े-बड़े पत्थरों का सैलाब आ गया था। इसके नीचे नेपाल की बस्तियों में बहने से तबाही मची। नतीजतन 359 लोग बाढ़ ने लील लिए और 826 लापता हैं, इनमें भारत समेत अन्य देशों के 590 पर्यटक हैं। इस घटना से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन का सीधा असर उच्च हिमालयी क्षेत्रों पर तेज गति से हो रहा है। यहां तक कि जिन हिमनद (ग्लेशियर) झीलों के आसपास मानव की आवाजाही अत्यंत सीमित है, वहां भी अब जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम का मिजाज खतरे की घंटी बजाने लगा है।

नेपाल में जिस हिमनद के टूटने से जल-प्लावन आया है, वह 17 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित थी और मानव बस्तियां भी नहीं थीं। अधिक ऊंचाई पर होने के कारण आवाजाही भी कम थी। इंटरनेशनल सेंटर फाॅर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट और नेपाल सरकार के विज्ञानियों द्वारा किए आकलन से पता चला है कि ऐसी 47 हिमनद झीलें हैं, जिन्हें खतरनाक माना गया है। चेतावनी दी गई है कि इनसे नेपाल की नदी प्रणालियों में इन हिमनदों के फटने से भयानक बाढ़ आ सकती है। इनमें से 21 झीलें हिमनद नेपाल में हैं और 25 झीलें तिब्बत की सीता पर स्थित हैं। ये हिमनद उन नदियों के उद्गम स्थलों पर हैं, जो दक्षिण की ओर नेपाल में बहती हैं। अतएव इनके फटने से बाढ़ आती है तो नीचे की ओर बसे जन समुदायों और बुनियादी संरचना के लिए बड़ा संकट पैदा हो सकता है। यही संकट वर्तमान में नेपाल की संरचनात्मक तबाही में देखा जा रहा है। यह चेतावनी यदि अनुमान पर खरी उतरती है तो कहा जा सकता है कि नेपाल बर्बादी के मुहाने पर बसा है।

भारत में भी इसरो और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़े डराने वाले हैं। भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 7,500 से अधिक हिमनद झीलें हैं, इनमें से 189 ‘रेड जोन‘ में रेखांकित की गई हैं। इस संकेत से पता चलता है कि ये झीलें कभी भी फटकर उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में तबाही का कारण बन सकती हैं। क्योंकि इन झीलों में बढ़ते वैश्विक तापमान के चलते बर्फ पिघलने से पानी की मात्रा लगातार बढ़ रही है। यही नहीं, अध्ययन बताते हैं कि सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्रों की चोटियों पर छोटी-बड़ी हजारों झीलें हैं। ये झीलें पहाड़ों पर अत्यंत तेज गति से प्राकृतिक रूप में आकार ले रही हैं। लद्दाख में ही ऐसी 3,219 झीलों की पहचान की गई है। हिमालय के भारतीय क्षेत्र में कुल हिमनदों की संख्या में से 2,431 ऐसे हिमनद हैं, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के चलते 10 हेक्टेयर क्षेत्र में फैल गई हैं। इन्हें सर्वेक्षणों ने अत्यधिक जोखिम भरी झीलों की श्रेणी में रखा है। हालांकि कुछ हिम झीलों का आकार तेजी से सिकुड़ भी रहा है।

हिमनद झीलों के अनियंत्रित ढंग से बढ़ते आकार की ठोस सच्चाई इसरो के उपग्रहों से लीं गईं तस्वीरों के अध्ययन से सामने आई है। इस स्थिति ने विज्ञानियों की चिंता बढ़ा दी है। हिमाचल प्रदेश की गेफांग घाट झील का आकार सर्वाधिक 178 प्रतिशत बढ़ा है। इसका कुल क्षेत्रफल 101.3 हेक्टेयर हो गया है। हिमालयी क्षेत्र में 10 लाख लोग ग्लेशियर झीलों के 10 किमी के दायरे में रहते हैं। पिछले साल 05 अगस्त 2025 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में धराली गांव के खीर क्षेत्र में बादल फटने के कारण भीषण बाढ़ और मलबे में यह पूरा क्षेत्र डूब गया था। बादल फटने से हुई तेज बारिश ने गंगोत्री और हर्शिल के क्षेत्र में आने वाली हिमनद झीलों को नाले में बदल दिया था।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2020 में किए गए एक अध्ययन से भी स्पष्ट हुआ था कि जलवायु परिवर्तन और पानी का अटूट संबंध है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया को 2030 तक बाढ़ों की कीमत प्रत्येक वर्ष चुकानी पड़ेगी। इनसे करीब सालाना 15.6 लाख करोड़ की हानि उठानी पड़ सकती है। साफ है, वैश्विक तापमान के बढ़ते खतरे ने आम आदमी के दरवाजे पर दस्तक दे दी है। दुनिया में कहीं भी एकाएक बारिश, बाढ़, बर्फबारी, बादल फटने या फिर सूखे का कहर का सामना करना पड़ सकता है। आंधी, तूफान और फिर यकायक ज्वालामुखियों के फटने की हैरतअंगेज घटनाएं भी यही संकेत दे रही हैं कि अदृष्य खतरे इर्द-गिर्द ही कहीं मंडरा रहे हैं। समुद्र और अंटार्कटिका जैसे बर्फीले क्षेत्र भी इस बदलाव के संकट से दो-चार हो रहे हैं।

दरअसल, वायुमंडल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड महासागरों में भी अवषोशित होकर गहरे समुद्र में बैठ जाती है। यह वर्षों तक जमा रहती है। पिछली दो शताब्दियों में 525 अरब टन कचरा महासागरों में विलय हुआ है। इसके इतर मानवजनित गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का 50 फीसदी भाग भी समुद्र की गहराइयों में समा गया है। इस अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड के जमा होने के कारण अंटार्कटिका के चारों ओर फैले दक्षिण महासागर में इस कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने की क्षमता निरंतर कम हो रही है। इस स्थिति का निर्माण खतरनाक है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण महासागर कार्बन डाइऑक्साइड से लबालब हो गया है। नतीजतन अब समुद्र इसे अवषोशित करने की बजाय वायुमंडल में ही उगलने लग गया है। अगर इसे जल्दी नियंत्रित नहीं किया गया तो वायुमंडल का तापमान तेजी से बढेगा, जो न केवल मानव बल्कि सभी प्रकार के जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरनाक होगा।

हिमालय पर कई वर्षों से अध्ययन कर रहे ‘वाडिया भू-विज्ञान संस्थान’ की रिपोर्ट के अनुसार हिमालय के हिमखंडों में काले कार्बन की मात्रा लगातार बढ़ रही है। यह मात्रा सामान्य से ढाई गुना बढ़कर 1899 नैनोग्राम हो गई है। दरअसल काले कार्बन से तापमान में वृद्धि होती है। यह सूर्य के प्रकाश को अवशोसित करने में अत्यंत प्रभावी है। इससे हिमालय और आर्कटिक जैसे हिमखंडों में बर्फ पिघलने लगती है। यदि किसी साल बरसात में औसत से कम बारिश होती है तो बर्फ पिघलने की मात्रा और अधिक बढ़ जाती है। वायु प्रदूषण से भी हिमखंड दूषित कार्बन की चपेट में आए हैं।

उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र ने निष्कर्ष निकाला है कि पिछले 37 सालों में हिमाच्छादित क्षेत्रफल में 26 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। इस क्षेत्र में पहले स्थाई स्नोलाईन 5700 मीटर थी, जो अब 5200 मीटर के बीच घट-बढ़ रही है। यही बजह है कि नंदादेवी जैव-मंडल (बायोस्फियर) आरक्षित ऋषि गंगा के दायरे का कुल 243 वर्ग किमी क्षेत्र बर्फ से ढंका था, लेकिन यह साल 2020 में 217 वर्ग किमी ही रह गया है। साफ है, तापमान बढ़ने का सिलसिला बना रहा और यदि बर्फ इसी तरह पिघलती रही तो जीव-जंतुओं और वनस्पतियां ही नहीं नेपाल की तरह मानव आबादियां भी जल प्रलय की चपेट में आती जाएंगी।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश