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एमआरपी का मायाजाल: आखिर उपभोक्ता कब तक लुटता रहेगा?

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एमआरपी का मायाजाल: आखिर उपभोक्ता कब तक लुटता रहेगा?


-संगीता शर्मा

बाजार में बिकने वाली लगभग हर वस्तु पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए शुरू की गई यह व्यवस्था अब कई सवालों के घेरे में है, विशेषकर दवाइयों और रोजमर्रा के उपयोग के सामानों की कीमतों को लेकर। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में कंपनियां मनमाने तरीके से एमआरपी तय कर रही हैं, जिससे आम आदमी आर्थिक शोषण का शिकार हो रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार एमआरपी वह अधिकतम कीमत होती है, जिस पर कोई वस्तु उपभोक्ता को बेची जा सकती है। इसमें उत्पादन लागत, पैकेजिंग, परिवहन, टैक्स और विक्रेता का लाभ शामिल होता है। एमआरपी व्यवस्था लागू होने से पहले अलग-अलग राज्यों और शहरों में एक ही उत्पाद की कीमत अलग-अलग होती थी। इसी असमानता को समाप्त करने के लिए सरकार ने उत्पादों पर एमआरपी अंकित करना अनिवार्य किया था। लेकिन अब उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि यह व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है।

सबसे अधिक सवाल दवाइयों की कीमतों को लेकर उठ रहे हैं। एक ही साल्ट की दवा अलग-अलग ब्रांड नामों से बाजार में कई गुना अधिक कीमत पर बेची जा रही है। जहां जन औषधि केंद्रों पर वही दवा बेहद कम कीमत पर उपलब्ध होती है, वहीं निजी मेडिकल स्टोर्स पर उपभोक्ताओं को उसी दवा के लिए कई गुना अधिक भुगतान करना पड़ता है। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि दवा का मूल तत्व समान होने के बावजूद कीमतों में इतना बड़ा अंतर केवल ब्रांडिंग, मार्केटिंग और वितरण व्यवस्था के कारण है।

बाजार में आज ऐसी स्थिति बन गई है कि कंपनियां पहले उत्पाद पर अत्यधिक ऊंची एमआरपी छापती हैं और फिर भारी छूट का दावा कर उपभोक्ताओं को आकर्षित करती हैं। उपभोक्ता को लगता है कि उसे सस्ता सामान मिल रहा है, जबकि वास्तविकता में वस्तु की मूल कीमत कहीं कम होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि एमआरपी अब उपभोक्ता हितों की सुरक्षा से अधिक कंपनियों के मुनाफे का माध्यम बनता जा रहा है।

उपभोक्ता अधिकारों पर काम करने वाले संगठनों का कहना है कि अधिकांश लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हैं। बहुत से उपभोक्ता बिना बिल के सामान खरीद लेते हैं और बाद में शिकायत करने की स्थिति में उनके पास कोई प्रमाण नहीं होता। दवाइयों के मामले में भी लोग केवल ब्रांड नाम देखकर दवा खरीद लेते हैं और उसके साल्ट या जेनेरिक विकल्प के बारे में जानकारी नहीं लेते। यही कारण है कि उपभोक्ता अक्सर अधिक कीमत चुकाने को मजबूर हो जाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई दुकानदार एमआरपी से अधिक कीमत वसूलता है या बिल देने से मना करता है तो उपभोक्ता राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन, उपभोक्ता आयोग, लीगल मेट्रोलॉजी विभाग या औषधि नियंत्रक विभाग से शिकायत कर सकता है। ऑनलाइन शिकायत की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं लेकिन जागरूकता की कमी के कारण अधिकांश लोग इन अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाते।

इसी मुद्दे को लेकर उपभोक्ता जागरूकता अभियान चला रही संस्था अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने सरकार से एमआरपी व्यवस्था पर सख्त कानून बनाने की मांग की है। संगठन का कहना है कि वर्तमान में एमआरपी तय करने की कोई प्रभावी सीमा या पारदर्शी व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण कंपनियां मनमाने तरीके से कीमतें निर्धारित कर रही हैं। संगठन यह भी मांग कर रहा है कि उत्पादों पर केवल एमआरपी ही नहीं बल्कि उत्पादन लागत भी अंकित की जाए ताकि उपभोक्ता वास्तविक मूल्य को समझ सके।

इन मांगों को लेकर अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत 12 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना आयोजित करने जा रही है। संगठन का कहना है कि सरकार को एमआरपी निर्धारण, उसकी समीक्षा और नियंत्रण के लिए स्पष्ट कानून बनाना चाहिए, ताकि उपभोक्ताओं को अनुचित मूल्य वसूली से बचाया जा सके। संगठन के पदाधिकारियों के अनुसार विशेष रूप से दवाइयों, सौंदर्य प्रसाधनों और रोजमर्रा के उपभोक्ता उत्पादों में मूल्य निर्धारण की पारदर्शिता बेहद आवश्यक है।

(लेखिका, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश