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मोदी बोलें या मौन रहें, चुभन तो होगी

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मोदी बोलें या मौन रहें, चुभन तो होगी


-सियाराम पांडेय ‘शांत’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब बोलते हैं तो कुछ लोग परेशान हो उठते हैं और जब वे मौन हो जाते हैं, तब भी ऐसा ही कुछ मंजर देखने को मिलता है। देश को प्रेरित करने वाले उनके वाक्यों में भी कुछ लोग राजनीति के दीदार करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी। प्रधानमंत्री मोदी के साथ भी कुछ ऐसा ही है। उनके जितने प्रशंसक हैं, उतने ही विरोधी भी हैं। इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता। विरोधियों के आरोपों के कीचड़ में कमल खिलाने के गुर उन्हें पता है। विपक्ष को यह समझना होगा कि पहाड़ जितना ऊंचा होता है, उतनी ही गहरी उसकी खाई होती है। पहाड़ पर चढ़ना आसान होता है लेकिन उसकी छोटी पर बने रहना कठिन क्योंकि शीर्ष से गिरे व्यक्ति को वहां तक पहुंचने में उतना ही श्रम फिर करना पड़ता है। कांग्रेस को यह बात समझनी होगी। दूसरों को कोसने से बात नहीं बनेगी बल्कि अपने गुण-दोष पहचान कर पूरी शक्ति से आगे बढ़ना होगा।

मौन साधना है। शक्ति संचय का अवसर है लेकिन किसके लिए। कुछ लोगों का जवाब होगा- साधकों के लिए और कुछ लोग कह सकते हैं कि सबके लिए। वैसे तो दोनों जवाब अपनी जगह सही है। बोलना और मौन रहना दोनों जरूरी है क्योंकि यह हानि-लाभ से जुड़ा मामला है। सुविधा और असुविधा के संतुलन से जुड़ा प्रकरण है। इसलिए इसे हल्के में लेने की कतई जरूरत नहीं है। हर नागरिक को बोलने और न बोलने का औचित्य समझना चाहिए। कब बोलना है, कहां बोलना है। कितना बोलना है, क्या बोलना है और क्यों बोलना है, इसकी वैज्ञानिक योजना तो हर आम और खास के मस्तिष्क में होनी ही चाहिए अन्यथा स्थितियां अनर्थकारी हो सकती हैं।

धर्मग्रंथ बताते हैं कि द्रौपदी का एक मजाक महाभारत का सबब बन गया था। वैसे भी जब दो अजीज दोस्तों के बीच झगड़ा हो। दोनों एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएं तो ऐसी हालत में चुप्पी साध लेना ही श्रेयस्कर होता है। कुछ भी बोलने का मतलब है, एक की नाराजगी मोल लेना। बहुधा देखने को मिलता है कि झगड़ा छुड़ाने के चक्कर में मध्यस्थ की ही जान चली जाती है। दो सांडों के संघर्ष में बचकर निकल लेने में ही भलाई है। नीति कहती है कि ज्यादा बोलना और ज्यादा चुप रहना ठीक नहीं है। ‘अति का भला न बोलना, अति का भला न चुप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।’ संस्कृत ग्रंथों में ‘अति सर्वत्र’ वर्जयेत कहकर हर व्यक्ति को सतर्क किया गया है।

वीणा के तारों को ज्यादा कसने पर जिस तरह उनके टूटने का खतरा रहता है। ढोलक की डोर कसते हुए उसे सुर में लाते वक्त कस कर ठोंकने पर जिस तरह उसके टूटने का खतरा रहता है, वैसा ही खतरा देश-विदेश में होने वाली घटनाओं पर त्वरित प्रतिक्रिया देने में होता है। सत्ताशीर्ष पर बैठे लोगों को कुछ भी कहने से पूर्व उसके फलाफल का विचार जरूर करना चाहिए। क्योंकि जितने खतरे बोलने के होते हैं, उससे कम खतरे मौन के भी नहीं है। आजकल विपक्षी दल चाहते हैं कि देश-विदेश में होने वाली हर छोटी-मोटी घटना पर प्रधानमंत्री बिना एक मिनट का विलंब किए जवाब दें। विपक्ष की बात में कुछ हद तक दम हो सकता है लेकिन क्या प्रधानमंत्री को ऐसा करना चाहिए। यह देश के व्यापक हित में होगा, यह गहन आत्म मंथन का विषय है।

चुप्पी सभी को खलती है। विपक्ष इसका अपवाद नहीं हो सकता। फिर यह अपेक्षा उस प्रधानमंत्री से है जो बोलते ही रहते हैं। लोग अपने मन की बात छिपाते हैं और वह उसे भी रेडियो पर व्यक्त करते हैं लेकिन महत्व के मुद्दों पर जब वे मौन साध लेते हैं तो किसी भी व्यक्ति का शंकासिक्त हो उठना स्वाभाविक है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने अपने एक लेख में कहा है कि इजराइल द्वारा गाजा में किए जा रहे हमले पर मोदी सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता नैतिक रूप से निंदनीय व राष्ट्रीय हित की दृष्टि से समझ से परे है। उनका आरोप है कि मोदी सरकार ने खुद को अपने पारंपरिक सहयोगियों फिलिस्तीन, ईरान और वृहद पश्चिम एशिया से अलग-थलग कर लिया है। वैश्विक जनमत से दूरी बना ली है और पाकिस्तान को मध्यस्थ की भूमिका निभाने का अवसर दे दिया। कांग्रेस नेता इस तरह की बातें लंबे समय से कर रहे हैं कि मोदी सरकार में भारत की विदेश नीति कमजोर हुई है लेकिन जिस तरीके से प्रधानमंत्री मोदी को अनेक देशों के सर्वोच्च पुरस्कार मिल चुके हैं और अनवरत मिलते जा रहे हैं, उससे ऐसा तो नहीं लगता कि हम वैदेशिक कूटनीति के मोर्चे पर कहीं कमजोर हुए हैं।

अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच भी भारतीय तेल टैंकर बंद पड़े होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र से गुजरकर भारत पहुंचे हैं। हां, कुछेक तेलवाहक जहाजों पर हमले भी हुए हैं। कुछ दूसरे देशों के तेलवाहक जहाजों पर कभी ईरान और कभी अमेरिका की ओर से हमले भी हुए हैं और उस पर तैनात कुछ भारतीय नाविकों की मौत भी हुई है। इस पर भी विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की है। यह जानते हुए भी इसके लिए भारत सरकार कड़ा प्रतिवाद कर चुकी है और अमेरिकी राजदूत को तलब तक कर चुकी है। जबकि कांग्रेस या अन्य विरोधी दलों को पता है कि भारत के लोग दुनिया भर में काम करते हैं। किसी भी देश में कुछ भी होता है तो उसमें भारतीय नागरिकों के हताहत होने का खतरा होता है। भारत को तेल आदि बहुतेरी वस्तुओं को किसी न किसी देश से आयात करना पड़ता है। ऐसे में वह किसी एक देश के पक्ष में बोलकर दूसरे देश से बिगाड़ क्यों करना चाहेगा? लेकिन जिस तरह कांग्रेस या दूसरे राजनीतिक दल मोदी सरकार को घेर रहे हैं, उससे यही लगता है कि या तो वे भारत की आवश्यकताओं और समस्याओं से अनभिज्ञ हैं या फिर जानबूझकर उसे जलती आग में हाथ डालने की सलाह दे रहे हैं। हालांकि ऐसा करने में चित और पट दोनों विपक्ष के हित में है।

देश के हितों की चिंता करने वाला व्यक्ति ऐसी सलाह कभी नहीं देगा। यह इस बात का भी संकेत है कि विपक्ष, खासकर कांग्रेस के लिए भारत की विदेश नीति से अधिक वोटबैंक की राजनीति महत्वपूर्ण है। भारत ने गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दे पर कई अवसरों पर अपना स्पष्ट रुख रखा है और ठोस मानवीय सहायता भी उपलब्ध कराई है। संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम संबंधी प्रस्तावों के समर्थन में भारत का रुख किसी से छिपा नहीं है। फिलिस्तीन अगर भारत को अपना विरोधी समझता तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को फिलिस्तीन का सर्वाेच्च नागरिक सम्मान क्यों देता? विचार तो इस पर भी किया जाना चाहिए। भारत ने गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दे पर कई अवसरों पर अपना स्पष्ट रुख रखा है और उसे ठोस मानवीय सहायता उपलब्ध कराई है। वैश्विक संघर्षों में आमने-सामने खड़े देशों के साथ भी समान रूप से संबंध बनाए रखने की प्रधानमंत्री मोदी की निरंतर कोशिश रही है। इजराइल, फिलिस्तीन, ईरान, अमेरिका, रूस, यूक्रेन और पश्चिमी देशों से भारत का सतत संवाद संपर्क इस बात का प्रमाण है। अब तो दुनिया के देश भी यह स्वीकार कर रहे हैं। युद्धरत देशों में शांति बहाल करने में भारत की बड़ी भूमिका हो सकती है।

कांग्रेस चाहती तो अपने छह दशक से अधिक के शासनकाल में इजराइल के साथ संबंध विकसित कर सकती थी लेकिन उसने अपनी विदेश नीति में भी वोटबैंक की राजनीति को तरजीह दी। इजराइल से अच्छे संबंध के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने बेंजामिन नेतन्याहू को भी नसीहतों का कड़वा घूंट पिलाने में कभी संकोच नहीं किया। हमले तो इजराइल पर भी कम नहीं हुए, कांग्रेस को उस पर भी बोलना चाहिए था। जिस त्वरा के साथ उसने गाजा और रफा के मुसलमानों के लिए आवाज बुलंद की, वैसा ही कुछ वह यहूदियों की चिंता में करती तो लगता कि भारत की सबसे पुरानी पार्टी दुनिया में सबके साथ है। कांग्रेस ने दोस्ती की थी चीन से, चीन से उसे क्या मिला- धोखा। तिब्बत भारत के हाथ से चला गया। अक्साईचिन का बड़ा भूभाग चीन ने कब्जा लिया। अरुणाचल प्रदेश पर भी उसकी गिद्ध दृष्टि है। मोदी सरकार ने चीन को भूटान और गलवान में न केवल मुंहतोड़ जवाब दिया बल्कि उसकी हर चाल को बेकार भी किया है। जिन 30 से अधिक देशों ने प्रधानमंत्री मोदी को अपने देश के सर्वोच्च सम्मान दिए हैं, उनमें सर्वाधिक मुस्लिम देश हैं जिन्हें लगता है कि भारत में मुसलमान दुनिया के किसी भी देश की अपेक्षा कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं और भारत में बिना किसी धार्मिक विभेद के सभी सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

इसमें संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी का विरोध करते-करते सोनिया गांधी और उनका परिवार अब भारत विरोध पर आमादा हो गया है। सत्ता से दूर होने का तनाव उसके कार्य व्यवहार पर भी नजर आने लगा है। बेहतर यह होगा कि कांग्रेस आत्मावलोकन करे। कौन कब बोले या मौन रहे, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि कांग्रेस क्या बोले और क्यों बोले? बोलने और न बोलने की यह राजनीति देश को कहां ले जाएगी, आज का विचारणीय बिंदु यही है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश