सनातन संस्कृति के गौरव की पुनर्स्थापना के 12 वर्ष
-विकास सक्सेना
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश की बागडोर संभाले 12 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस कालखण्ड में देश की आर्थिक, राजनैतिक, कूटनीतिक, सामाजिक, तकनीकी, सामरिक, अंतरिक्ष विज्ञान, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्षमताओं का जो स्वरूप देखने को मिला है उसने देशवासियों में आत्मविश्वास और आत्मगौरव की भावना को संचार किया है। अबतक के अपने कार्यकाल में मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गंभीर चुनौतियों का सामना करने वाली ‘फ्रेजाइल फाइव’ अर्थव्यवस्थाओं में से निकाल कर दुनिया की सबसे तेजी गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना दिया। आज भारत तेजी से दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और फिर ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारतीय सेनाओं ने अपने साहस, पराक्रम और रणनीतिक तथा तकनीकी कुशलता के दम पर हथियारों की सटीकता और उन्नत रक्षा प्रणाली का पूरे विश्व में लोहा मनवाया है। इसी का नतीजा है कि तमाम देश भारत में निर्मित ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने को उत्सुक हैं।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने चंद्रयान-3 के जरिये चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरकर पूरी दुनिया को अचंभित कर दिया। अंतरिक्ष विज्ञान के सूरमा माने जाने वाले अमेरिका और रूस जैसे देश भी आज तक इस दिशा में सफलता हासिल नहीं कर सके हैं। इससे पहले इसरो ने अपने प्रथम प्रयास में ही मंगल ग्रह की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश करके अमेरिका और रूस जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया था।
इन तमाम उपलब्धियों के बीच मोदी सरकार ने बीते 12 वर्षों में जो सबसे बड़ा काम किया, वो है भारतीय जनमानस में आत्मविश्वास, आत्मगौरव और स्वामिमान की भावना का संचार। मोदी सरकार के सतत प्रयासों से भारतीय जनमानस में गुलामी के बारह सौ सालों में विकसित हुए हीनता की ग्रन्थी टूटी है और भारतीय मेधा नई ऊर्जा के साथ प्रत्येक क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है।
आठवीं शताब्दी के मध्य में भारत में विदेशी आक्रांताओं ने हमले शुरू किए। इन आक्रांताओं का लक्ष्य सिर्फ भारत की अपार धन संपदा को लूटना भर नहीं था बल्कि अपने मत मजहब को स्थापित करके ‘गजवा ए हिन्द’ की संकल्पना को साकार रूप देना था। सोलहवीं शताब्दी में व्यापार करने आई ईस्ट इण्डिया कम्पनी का भी उद्देश्य सिर्फ लाभ अर्जित करने तक सीमित नहीं रहा। उसके अधिकारी भी सुनियोजित तरीके से यहां ईसाइयत के विस्तार में जुट गए। लेकिन इस्लाम और ईसाइयत के व्यापक प्रसार में सबसे बड़ा रोड़ा दुनिया की प्राचीनतम सनातन संस्कृति की भारतीय जनमानस में मन मस्तिष्क और जीवनशैली में रची बसी गहरी जड़ें थीं। इनको नष्ट भ्रष्ट करने के लिए गौरी, गजनी, खिलजी और मुगल आक्रांताओं ने यहां के मंदिरों को तोड़ा ताकि यहां के उत्कृष्ट स्थापत्य कला को नष्ट करने के साथ ही भारतीय सांस्कृतिक आध्यात्मिक शक्ति पर आघात किया जा सके।
सनातन धर्मावलम्बियों में हीन भावना भरने के लिए तोड़े गए मंदिरों के अवशेषों पर इस प्रकार मस्जिदों का निर्माण किया गया जिससे मंदिरों के चिन्ह भी स्पष्ट तौर पर दिखते रहें। हजारों साल में संग्रहित भारतीय ज्ञान परंपरा के साहित्य को जलाया गया ताकि सनातन संस्कृति के सतत प्रसार को बाधित किया जा सके।
अपनी समृ़द्धि के कारण सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत में व्यापार करने आई ईस्ट इण्डिया कम्पनी का प्रभाव बढ़ने से पहले जो आक्रांता भारत आए उन्होंने ताकत और तलवार के दम पर इस्लाम के प्रसार का भरसक प्रयास किया। तमाम अत्याचार के बावजूद ये इस्लामिक आक्रांता सनातन संस्कृति, धर्म, भाषा, शिक्षा, चिकित्सा पद्धति और आध्यात्म को लेकर सनातन धर्मावलम्बियों के विश्वास और आत्मगौरव के भाव को डिगा नहीं सके। लेकिन ईस्ट इण्डिया कंपनी की जड़ें जैसे ही मजबूत हुईं, उसकी समझ में आ गया कि अगर भारत में लम्बे समय तक आर्थिक लाभ कमाने के साथ ईसाइयत को स्थापित करना है तो सबसे पहले सनातन धर्मावलम्बियों में हीनता की ग्रंथी विकसित करनी होगी। इसके लिए सनातन संस्कृति से जुड़ी ज्ञान परम्परा, साहित्य, चिकित्सा, आध्यात्म, पर्वों, उत्सवों और सामाजिक परंपराओं को हेय बताते हुए भारतीय लोगों में अपराधबोध और आत्मग्लानि की भावना विकसित करने के सुनियोजित प्रयास किए गए। सनातन साहित्य में मिलावट करके उन्हें षड्यंत्रपूर्वक दूषित किया गया।
यहां की चिकित्सा पद्धति को निष्प्रभावी बताने का प्रयास किया गया। विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव और देशकाल परिस्थितियों के कारण कुछ क्षेत्रों में विकसित हुई कुरीतियों को समाज सुधार के नाम पर अपने पिट्ठुओं से विरोध कराकर इनको इस प्रकार प्रचारित किया जैसे ये संपूर्ण सनातन धर्म की स्थापित प्रथा और अनिवार्य परंपराएं हैं। यहां तक कि हमारे गिल्ली-डंडा, कंचे, पतंगबाजी, बग्गा-बग्घी जैसे खेलों को बेवजह हेय दिखाने के सुनियोजित प्रयास किए गए। ईसाई मिशनरियों और ब्रिटिश सरकार के सतत प्रयास से देश में एक बड़ा वर्ग विकसित हो गया जो सनातन धर्म और संस्कृति को हेय दृष्टि से देखता था।
क्रांतिकारियों को बलिदान और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष के परिणामस्वरूप 1947 में जब देश को अंग्रेजों की सत्ता से आजादी मिली तो उसके साथ धर्म के आधार पर पुण्य मातृभूमि का विभाजन भी स्वीकार करना पड़ा। दुर्भाग्य से तत्कालीन नेतृत्व की भारतीय सनातन संस्कृति के प्रति संवेदनहीनता के चलते माता 51 शक्तिपीठों में से एक हिंगलाज माता मंदिर पाकिस्तान और सात शक्तिपीठ जेशोश्वरी माता मंदिर, सुगंधा माता मंदिर, अपर्णा माता मंदिर, जयंती माता मंदिर, महाशक्ति माता मंदिर, चट्टल भवानी माता मंदिर और त्रिस्रोता माता मंदिर बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में चले गए। इसके अलावा ढाकेश्वरी माता का मंदिर और सिखों का प्रमुख तीर्थ करतारपुर साहिब गुरूद्वारा पाकिस्तान को दे दिए गए लेकिन भारतीय नेतृत्व की ओर से इसे लेने के कोई सार्थक प्रयास नहीं किए गए।
दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब हमारी सेना के पराक्रम से नया बांग्लादेश बना तब भी न तो करतापुर साहिब को वापस लेने के प्रयास हुए न ही बांग्लादेश स्थित मंदिरों को वापस हासिल करने के कोशिश की गई। लेकिन वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनने के बाद हालात तेजी से बदले हैं। बीते 12 वर्षों में 500 साल के लम्बे संघर्ष के बाद अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ है। काशी विश्वनाथ धाम और उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के भव्य विस्तार के साथ महर्षि विश्वामित्र द्वारा पावागढ़ में स्थापित काली मां के मंदिर से 500 वर्ष बाद दरगाह को हटाकर शिखर ध्वज फहराना मोदी सरकार में ही संभव हो सका है। हाल ही में भोजशाला को भी न्यायालय ने वाग्देवी का मंदिर मानते हुए हिन्दुओं के पक्ष में निर्णय दिया है। भारत से चोरी हुई 642 प्राचीन वस्तुएं जिनमें अधिकांश देवी देवताओं की मूर्तियां हैं, कूटनीतिक प्रयासों से पिछले 12 वर्षो में वापस आई हैं जो किसी भी देश के लिए रिकार्ड है।
इसके अलावा सरकार के सतत प्रयास से आयुर्वेद और योग को अन्तरराष्ट्रीय पहचान मिली है। दुनियाभर में हर साल 21 जून को विश्व योग दिवस मनाया जाने लगा है। वर्ष 2024 में तकरीबन 150 देशों ने आयुर्वेद दिवस मनाकर भारतीय चिकित्सा पद्धति के महत्व को रेखांकित किया। सरकार के प्रयास से इस समय भारत में 43 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं जबकि 62 स्थल अस्थाई सूची में शामिल किए गए हैं। बौ़द्ध सर्किट और करतारपुर साहिब कॉरिडोर भी सरकार के इसी दिशा में किए गए प्रयासों की ओर इशारा करते हैं। प्रयागराज में कुम्भ मेले के भव्य आयोजन ने भी सनातन संस्कृति की वैश्विक पहचान को पुनर्स्थापित करने में विशेष योगदान दिया।
प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था के प्रतीक सेंगोल की नवनिर्मित संसद भवन में स्थापना से भी प्राचीन भारतीय परम्परा को नई पहचान मिली है। इसके अलावा काशी तमिल संगमम जैसे आयोजनों से सनातन धर्मावलम्बियों को क्षेत्र और भाषा आदि के नाम पर बांटने के प्रयासों की धार कुंद करने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। बीते 12 सालों में सरकार के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रयासों से सनातन संस्कृति के गौरव की पुनर्स्थापना के अनेक प्रयास किए गए हैं लेकिन अभी बहुत लंबी यात्रा बाकी है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

