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क्या विश्वस्तरीय है भारत के मेडिकल कॉलेजों की पढ़ाई का स्तर

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क्या विश्वस्तरीय है भारत के मेडिकल कॉलेजों की पढ़ाई का स्तर


-विवेक शुक्ला

भारत में मेडिकल शिक्षा का भविष्य बहुत सुनहरा दिखता है। हर साल नए कॉलेज खुल रहे हैं। सीटों की संख्या बढ़ रही है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ लगी रहती है। प्राइवेट कॉलेजों में इमारत भी बड़ी है और फीस भी। फिर भी कुछ सवाल जस के तस हैं। क्या हमारे सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की पढ़ाई विश्वस्तरीय है? क्या हम अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर के कॉलेजों के स्तर पर पहुँच गए हैं? सीधा जवाब यह है कि कुछ जगह हम उस स्तर के करीब हैं। बाकी ज्यादातर जगहों पर अभी लंबा रास्ता बाकी है।

विश्वस्तरीय पढ़ाई का मतलब सिर्फ बड़ी इमारत नहीं होता। अमेरिका और ब्रिटेन में छात्र किताब रट कर पास नहीं होते। उन्हें मरीज के सामने खड़े होकर फैसला लेना सिखाया जाता है। कौन-सी जाँच करनी है, कौन-सी दवा देनी है, कब रेफर करना है। सिंगापुर में क्लास छोटी होती है। टीचर पहले से तैयार होते हैं। हॉस्पिटल का काम पढ़ाई से जुड़ा रहता है। किताब अलग और वार्ड अलग, ऐसा नहीं चलता।

हमारे यहाँ विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकारी कॉलेज की असली ताकत मरीज है। एम्स और कुछ बड़े अस्पतालों से जुड़े कॉलेजों में हर तरह की बीमारी दिख जाती है। छात्र वार्ड में सीखते हैं। इतना एक्सपोजर कई अमेरिकी हॉस्पिटल में भी छात्रों को नहीं मिलता। मरीज ज्यादा हैं तो सीखने का मौका भी ज्यादा है।

इसी मुद्दे पर बीते दिनों राजधानी में पुष्पांजलि मेडिकॉन 2026 कांफ्रेस में दत्ता मेघे इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च के प्रो चांसलर डॉ. वेदप्रकाश मिश्र ने कहा कि करिकुलम और क्लिनिकल एजुकेशन को अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और सिंगापुर के बराबर लाना पहला लक्ष्य है। मतलब निशाना साफ है, मंजिल अभी बाकी है। उनकी बात का सीधा मतलब यह है कि हमारे यहाँ मेडिकल कॉलेजों की संख्या तो बढ़ गई, पर स्तर उसी गति से नहीं बढ़ा।

सरकारी अस्पताल मरीजों का इलाज करते हैं, यह उनकी ताकत है। कमी दूसरी जगह है। टीचर कम पड़ते हैं। लैब और शोध से जुड़ी सुविधाएँ कई जगह काफी नहीं हैं। पढ़ाई अक्सर लेक्चर पर टिकी रहती है। टीचर बोलते जाते हैं, छात्र लिखते जाते हैं। वार्ड में जो सीखा, उसकी कक्षा में ठीक से चर्चा नहीं हो पाती।

प्राइवेट कॉलेज भी सब एक जैसे नहीं हैं। देश में मेडिकल कॉलेज आठ सौ के पार हैं। बड़ी संख्या में साल 1991 के बाद खुली है और इनमें प्राइवेट कॉलेज ज्यादा हैं। कुछ जगह स्किल लैब, लाइब्रेरी और टाइमटेबल अच्छे हैं। पर हर कॉलेज में मरीज उतने नहीं मिलते। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल कहते हैं कि हमारे यहाँ कई मेधावी परिवारों के गरीब बच्चे मोटी फीस की वजह से मेडिकल कॉलेज से बाहर रह जाते हैं। ये गलत है इसलिए प्राइवेट कॉलेजों की फीस को भी देखना होगा। सीट भरना और अच्छा डॉक्टर बनना, दोनों एक बात नहीं है।

पढ़ाई को श्रेष्ठ और विश्वस्तरीय कैसे बनाएँ? विशेषज्ञ चार रास्ते बताते हैं। पहला, अंडरग्रेजुएट कोर्स कंपिटेंसी बेस्ड हो। आसान शब्दों में छात्र सिर्फ याद करके पास न हो। उसे पता हो कि मरीज देखकर क्या करना है। बुखार आए तो कौन-सी बात पूछनी है। साँस फूल रही हो तो पहला कदम क्या हो। हुनर पास हो, तभी डिग्री मिले।

दूसरा, टीचिंग इंटीग्रेटेड हो। मतलब विषय अलग-अलग भागों में न पढ़ाए जाएँ। आज एनाटॉमी, कल फिजियोलॉजी, परसों बीमारी, ऐसा न हो। एक मरीज के आसपास सब जुड़ जाए। दिल की बनावट, दिल का काम और दिल की बीमारी एक साथ समझ आए।

तीसरा, पढ़ाई मॉड्यूल में हो। मॉड्यूल यानी छोटे और पूरे हिस्से। जैसे एक महीना सिर्फ माँ और बच्चे की सेहत पर। दूसरा महीना साँस की बीमारियों पर। हर हिस्से का मकसद शुरू में साफ हो और अंत में पता चले कि छात्र ने वो हुनर सीख लिया या नहीं।

चौथा, सिस्टम क्रेडिट बेस्ड हो ताकि लचीलापन आए। क्रेडिट का सीधा मतलब है कि हर विषय के अंक या घंटे गिने जाएँ। छात्र एक रास्ते पर अटका न रहे। जो हिस्सा पूरा कर लिया, उसका हिसाब जुड़ता जाए। जरूरत पड़े तो गति अपनी रख सके। पढ़ाई कठोर ढाँचे में न बँधी रहे।

बारहवीं के बाद सुपर स्पेशलिटी तक अक्सर बारह साल लग जाते हैं। इसे करीब दस साल किया जा सकता है। बात साल काटने की नहीं है। हर साल का मकसद साफ होना चाहिए ताकि समय खाली लेक्चर में न कटे।

सबसे बड़ा काम टीचर का है। कॉलेज तेजी से खुले, टीचर उतनी तेजी से तैयार नहीं हुए। सिंगापुर और ब्रिटेन में टीचर बनने से पहले पढ़ाने की ट्रेनिंग जरूरी मानी जाती है। भारत में कई जगह अच्छा डॉक्टर अपने आप अच्छा टीचर मान लिया जाता है। बिना तैयार टीचर के नया करिकुलम भी पुरानी क्लास बन जाता है। आने वाले वर्षों में हर कॉलेज में टीचर ट्रेनिंग नियमित होनी चाहिए। एग्जाम भी हुनर और फैसला नापे, सिर्फ याददाश्त नहीं।

आगे क्या करना होगा? सरकारी कॉलेज अपने मरीजों की भीड़ को अच्छी टीचिंग से जोड़ें। प्राइवेट कॉलेज मरीज, रिसर्च और गाँव-मोहल्ले की पोस्टिंग बढ़ाएँ। सोशल वर्क और हमदर्दी पहले साल में पढ़ाई जाए ताकि इलाज के साथ देखभाल भी आए। शिक्षा पर देश की कमाई का छह प्रतिशत खर्च करने का वादा अब भी अधूरा है। वह पूरा हुआ तो सरकारी कॉलेज, लैब और टीचर का वेतन संभल सकता है। फीस और स्कॉलरशिप ऐसी हो कि प्रतिभा रुक न जाए।

हमारी ताकत मरीज की विविधता और युवाओं की संख्या है। अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर के स्तर तक पहुँचने के लिए नकल काफी नहीं। पाठ्यक्रम वैश्विक हो, टीचर तैयार हों, एग्जाम हुनर नापे, फीस होशियार बच्चे को न रोके। जब ये बातें कक्षा और वार्ड तक पहुँचेंगी, तभी कह सकेंगे कि हमारी मेडिकल शिक्षा विश्वस्तरीय है। अभी यह संभावना है, पूरा सच अभी नहीं।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश