लद्दाख की पुकार, संघवाद की परीक्षा
-डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में संघवाद का अर्थ केवल केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन नहीं बल्कि विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं, सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान करना भी है। देश के सभी क्षेत्रों पर एक समान प्रशासनिक व्यवस्था लागू करने के बजाय उनकी ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग स्तर की स्वायत्तता प्रदान करना असममित संघवाद कहलाता है। भारतीय संविधान में इसकी अभिव्यक्ति पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधानों, छठी अनुसूची तथा विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप बनाई गई व्यवस्थाओं में दिखाई देती है। लद्दाख की स्वायत्तता और संवैधानिक संरक्षण की मांग इसी व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण की प्रासंगिकता को रेखांकित करती है।
अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। इससे क्षेत्र का प्रशासनिक स्वरूप तो बदला लेकिन इसके साथ ही स्थानीय लोगों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, भूमि अधिकारों, सरकारी नौकरियों, सांस्कृतिक पहचान और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा से जुड़े प्रश्न भी अधिक मुखर हुए। वर्तमान व्यवस्था में लद्दाख के पास अपनी निर्वाचित विधानसभा नहीं है। प्रशासन का संचालन उपराज्यपाल के माध्यम से होता है, जबकि लेह और कारगिल की पर्वतीय विकास परिषदें स्थानीय शासन में भूमिका निभाती हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक पुनर्गठन के साथ स्थानीय जनता की लोकतांत्रिक भागीदारी और निर्णय लेने की क्षमता भी पर्याप्त रूप से मजबूत हुई है?
लद्दाख की मांगों को समझने के लिए उसके भूगोल और समाज की विशिष्टताओं पर ध्यान देना आवश्यक है। विशाल पर्वतीय क्षेत्र, सीमित कृषि योग्य भूमि, जलवायु परिवर्तन की तीव्र चुनौतियां, नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी और विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराएं इसे देश के अन्य क्षेत्रों से अलग बनाती हैं। यहां की आबादी का बड़ा हिस्सा जनजातीय समुदायों से संबंधित है। भोटी और पुरगी जैसी भाषाएं, पारंपरिक सामुदायिक संस्थाएं, धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत तथा स्थानीय जीवनशैली इस क्षेत्र की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि विकास की नीतियां स्थानीय परिस्थितियों और समुदायों की भागीदारी को पर्याप्त महत्व दिए बिना बनाई जाती हैं तो आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है।
यहीं असममित संघवाद की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। इसका मूल सिद्धांत यह है कि राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए हर क्षेत्र को एक जैसी संवैधानिक या प्रशासनिक व्यवस्था में बांधना अनिवार्य नहीं है। आवश्यकतानुसार अलग-अलग क्षेत्रों को विशिष्ट अधिकार और संस्थागत संरक्षण देकर लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाया जा सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371A नागालैंड की धार्मिक-सामाजिक परंपराओं, प्रथागत कानूनों और भूमि-संसाधनों से जुड़े कुछ विशेष संरक्षणों का उदाहरण है। इसी प्रकार छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला एवं क्षेत्रीय परिषदों की व्यवस्था करती है। हालांकि इन प्रावधानों की अपनी अलग संवैधानिक सीमाएं हैं, फिर भी वे बताते हैं कि भारत का संघवाद स्थानीय विविधताओं को स्वीकार करने की क्षमता रखता है।
लद्दाख के संदर्भ में छठी अनुसूची के अंतर्गत संरक्षण की मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्थानीय समुदायों को भूमि, संस्कृति और परंपरागत संस्थाओं से जुड़े विषयों पर अधिक प्रभावी भूमिका मिल सकती है। जनजातीय स्वायत्तता का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करना नहीं बल्कि समुदायों को अपने सामाजिक और आर्थिक भविष्य से संबंधित निर्णयों में भागीदार बनाना भी है।
स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप संस्थागत अधिकार मिलने से बाहरी दबावों के बीच पारंपरिक आजीविकाओं और सामुदायिक संसाधनों की रक्षा करने में सहायता मिल सकती है।
भूमि और रोजगार की सुरक्षा भी इस मांग का महत्वपूर्ण आधार है। लद्दाख में भूमि केवल आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि आजीविका, सांस्कृतिक निरंतरता और सामुदायिक अस्तित्व से जुड़ा विषय है। पर्यटन, आधारभूत संरचना, ऊर्जा परियोजनाओं और अन्य विकास गतिविधियों के विस्तार के बीच स्थानीय निवासियों की आशंकाओं को दूर करना आवश्यक है। संवैधानिक सुरक्षा और स्पष्ट कानूनी व्यवस्था स्थानीय भूमि अधिकारों की रक्षा कर सकती है तथा सरकारी रोजगार में स्थानीय युवाओं के अवसरों को मजबूत कर सकती है। इससे विकास के लाभों का अधिक न्यायसंगत वितरण संभव होगा।
लद्दाख की पारिस्थितिकी के संदर्भ में भी स्थानीय स्वायत्तता का विशेष महत्व है। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों का पिघलना, जल संकट, अनियमित वर्षा और पर्यावरणीय दबाव पहले से गंभीर चुनौतियां हैं। अनियंत्रित पर्यटन और अव्यवस्थित निर्माण इन समस्याओं को और बढ़ा सकते हैं। स्थानीय समुदायों को योजना निर्माण, जल प्रबंधन, चरागाहों के संरक्षण और पर्यावरणीय प्रभावों के आकलन में वास्तविक अधिकार दिए जाएं तो विकास की नीतियां अधिक टिकाऊ बन सकती हैं। इस दृष्टि से स्वायत्तता केवल राजनीतिक मांग नहीं बल्कि पर्यावरणीय न्याय और भावी पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न भी है।
हालांकि लद्दाख को अधिक स्वायत्तता प्रदान करने की राह चुनौतियों से मुक्त नहीं है। यह क्षेत्र चीन और पाकिस्तान से लगी संवेदनशील सीमाओं के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। रक्षा संबंधी आवश्यकताओं, सीमावर्ती आधारभूत संरचना और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए किसी भी व्यवस्था का निर्माण करना होगा। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों को परस्पर विरोधी मानना उचित नहीं है। स्थानीय आबादी का विश्वास, सहयोग और भागीदारी सीमावर्ती क्षेत्रों की स्थिरता को मजबूत कर सकते हैं।
संवैधानिक दृष्टि से भी सावधानी आवश्यक है। छठी अनुसूची वर्तमान में लद्दाख पर लागू नहीं होती इसलिए इसे लागू करने के लिए उपयुक्त संवैधानिक प्रक्रिया और स्पष्ट कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता होगी। अनुच्छेद 371 के अंतर्गत किसी विशेष प्रावधान की मांग पर भी संवैधानिक व्यवहार्यता, आवश्यक संशोधनों और संबंधित प्रावधानों की प्रकृति के आधार पर विचार करना होगा। केवल विशेष दर्जे की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी; उसके साथ स्पष्ट अधिकार, जवाबदेही, वित्तीय संसाधन और प्रभावी संस्थागत व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी।
इसके अतिरिक्त, लेह और कारगिल की सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं में अंतर समझना जरूरी है। किसी भी स्वायत्त व्यवस्था को दोनों क्षेत्रों के लिए न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहिए। यदि निर्णय लेने की प्रक्रिया में किसी एक क्षेत्र या समुदाय का प्रभाव अधिक हो जाता है तो स्वायत्तता का उद्देश्य ही कमजोर पड़ सकता है। इसी तरह, पर्याप्त वित्तीय संसाधनों और प्रशासनिक अधिकारों के अभाव में स्थानीय संस्थाएं केवल नाममात्र की स्वायत्तता तक सीमित रह सकती हैं।
समाधान का रास्ता संवाद और संवैधानिक सहमति से निकलना चाहिए। केंद्र सरकार को लेह एपेक्स बॉडी, कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस, स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों, जनजातीय संगठनों, युवाओं और नागरिक समाज के साथ नियमित एवं सार्थक बातचीत करनी चाहिए। राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची के संरक्षण अथवा किसी अन्य उपयुक्त संवैधानिक व्यवस्था से संबंधित मांगों का परीक्षण पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना चाहिए।
पर्वतीय विकास परिषदों को अधिक वित्तीय अधिकार, प्रशासनिक स्वतंत्रता और स्थानीय नियोजन की क्षमता प्रदान करना भी महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। साथ ही, भूमि, रोजगार, भाषा, संस्कृति और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान विकसित किए जाने चाहिए।
अंततः लद्दाख का प्रश्न भारतीय लोकतंत्र के सामने व्यापक चुनौती प्रस्तुत करता है। क्या राष्ट्रीय एकता का अर्थ सभी क्षेत्रों के लिए एक जैसी व्यवस्था है या विविधताओं का सम्मान करते हुए साझा संवैधानिक ढांचे को मजबूत करना? असममित संघवाद दूसरे विकल्प का समर्थन करता है। यह मानता है कि समानता का अर्थ हर क्षेत्र के साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार करना नहीं बल्कि उसकी विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप न्यायपूर्ण अवसर और अधिकार सुनिश्चित करना है। लद्दाख की आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। भारत की एकता उसकी विविधता को दबाने में नहीं बल्कि उसे संवैधानिक सम्मान देने में निहित है। लद्दाख के लिए प्रभावी स्वायत्तता इसी भावना की महत्वपूर्ण परीक्षा है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
-----------------------
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

