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केजरीवाल का कोर्ट बहिष्कार और गांधी का तरीका

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केजरीवाल का कोर्ट बहिष्कार और गांधी का तरीका


डॉ. प्रभात ओझा

दिल्ली उच्च न्यायालय की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के न्यायालय से खुद को न्याय मिलने की उम्मीद नहीं होने के तर्क पर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने उनके कोर्ट का बहिष्कार करने की घोषणा कर डाली। उन्हीं के रास्ते पर केजरीवाल मंत्रिपरिषद के सदस्य रहे मनीष सिसौदिया भी चल पड़े। दोनों अपनी सरकार के दौरान वर्ष 2021-22 के दौरान आबकारी नीति में हुई कथित अनियमितता मामले के आरोपित हैं। इस मामले को शराब घोटाला के रूप में भी पहचाना जाता है। इसके पहले दोनों नेताओं ने अपने खिलाफ जारी मुकदमा जस्टिस स्वर्णकांता की जगह किसी अन्य जज को देने की अपील की थी। यह अपील इस आधार पर खारिज कर दी गई कि इससे अन्य मामलों के आरोपितों में भी न्यायालयों के प्रति अविश्वास बढ़ेगा और कोर्ट बदलने का यह उदाहरण बन जायेगा। वैसे कोर्ट बदलने के मामले पहले भी हुए हैं। हालांकि ऐसा स्वयं न्यायाधीशों के यह अनुभव करने पर हुआ कि वे सम्बंधित मामले में किसी पक्ष से कहीं न कहीं जुड़े हैं अथवा पहले जुड़े रहे हैं। इस बार आरोपितों की ओर से ऐसी अपील के बाद विवाद बढ़ा है और कोर्ट के नहीं मानने पर बहिष्कार की बात कही गई है। इस मामले में चर्चा का सबसे बड़ा बिंदु अरविंद केजरीवाल का वह बयान है, जिसमें ऐसा निर्णय करने के पीछे वे प्रेरक के तौर पर महात्मा गांधी को रखते हैं।

केजरीवाल ने कहा “जस्टिस स्वर्णकान्ता शर्मा जी से न्याय मिलने की मेरी उम्मीद टूट चुकी है। अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनते हुए, गांधी जी के सिद्धांतो को मानते हुए और सत्याग्रह की भावना के साथ, मैंने फैसला किया है कि मैं इस केस में उनके सामने पेश नहीं हूंगा और कोई दलील भी नहीं रखूंगा।” याद करना होगा कि 2021-22 की दिल्ली आबकारी नीति में कथित अनियमितता और धन के लेनदेन के मामले में केजरीवाल और मनीष सिसौदिया भी आरोपित हैं। दिल्ली की राउज एवेन्यु कोर्ट ने प्रमाण के अभाव में मुकदमे को खारिज कर दिया था। उसके बाद यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा। जजेज के मुकदमे सुनने सम्बंधी रोस्टर के मुताबिक मामला जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की कोर्ट में है। केजरीवाल और मनीष सिसौदिया के आरोप हैं कि जज के बेटे-बेटी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के साथ प्रैक्टिस करते हैं और सरकार की ओर से उनके पास कई मुकदमे आते हैं। ऐसे में जज निष्पक्ष नहीं हो सकतीं।

जज ने इस मुकदमे से अलग होने का फैसला कर लिया होता, तो यह अशोभनीय स्थिति नहीं आती। ताजा विवाद से देश की न्यायिक प्रक्रिया, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और रूल ऑफ लॉ के सवाल खड़े होते हैं। यही कारण है कि विधि विशेषज्ञों के मध्य इस पर बहस जारी है। कई बड़े वकील केजरीवाल के तरीके को आत्म प्रचार का एक और हथियार मानते हैं। वहीं राजनीतिक रूप से केजरीवाल के विरोधी रहे प्रशांत भूषण कहते हैं कि केजरीवाल ने सही और उचित फैसला लिया है।

अंत में केजरीवाल के कोर्ट बहिष्कार के लिए गांधी के सत्याग्रह और असहयोग को हथियार बनाने की बात। इतिहास गवाह है कि 1922 में गांधी जी पर उनके लेखों के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (ए) के तहत राजद्रोह का आरोप लगा था। गांधी और ‘यंग इंडिया’ अखबार जिसमें लेख लिखने के कारण आरोप लगे थे, उसके प्रकाशक मिस्टर बैंकर ने मजिस्ट्रेट को बताया कि उन्हें कानूनी बचाव नहीं करना है। ‘गांधी पर महान मुकदमा’ नाम से प्रसिद्ध रेक्स इम्पेरेटर बनाम एम.के. गांधी मामले में गांधी जी को छह साल और बैंकर को एक साल की सजा हुई थी। पीठासीन न्यायाधीश रॉबर्ट ब्रूमफील्ड ने माना कि बड़ी संख्या में लोग गांधी को महान देशभक्त नेता मानते हैं। यहां तक ​​कि गांधी के विरोधी भी उन्हें उच्च आदर्शों वाला नेक तथा संत के रूप में देखते थे। लेकिन कानून का काम आरोपों पर विचार करना था। सजा सुनने के बाद गांधी जी हंसते हुए कोर्ट से बाहर निकले, पर सरकारी वकील स्ट्रैंगमैन ने लिखा, “उस दिन कई लोग रोए” और मैं स्वयं “माहौल से पूरी तरह अप्रभावित नहीं था।”

स्पष्ट है कि देश की आजादी के लिए गांधी जी ने अपने कृत्य को सही माना था। वहां आरोप स्पष्ट थे, पर आरोपित का मकसद महान। यहां आरोप निचली कोर्ट से खारिज है, पर हाई कोर्ट में विचाराधीन। पर एक सच्चाई यह भी कि गांधी जी कोर्ट में पेश हुए थे।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश