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हाईकोर्ट के न्यायाधीश की टिप्पणी के व्यापक अर्थ

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हाईकोर्ट के न्यायाधीश की टिप्पणी के व्यापक अर्थ


अरुण कुमार दीक्षित

पत्रकारिता का संबंध जन सरोकारों से है। पत्रकारिता लोकहित का माध्यम है। पत्रकारिता राष्ट्र के तीनों आयामों कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका को सत्य, न्याय और पारदर्शी बनाने की प्रमुख भूमिका में होती है। तभी इसे राष्ट्र का चौथा स्तम्भ माना गया है। निरंकुश राजनीति पर प्रहार करती है। मानवीय मूल्यों की तरफदारी करती है पत्रकारिता। समाज मेँ पत्रकारिता से नया वातावरण सृजित होता है। हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। पत्रकारिता जगत को आत्ममंथन करना चाहिए।

जुलाई माह में दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस गिरीश कठपालिया की टिप्पणी के गहन और व्यापक अर्थ हैं। न्यायाधीश ने कहा कि मोबाइल और माइक लेकर घूमने वाला प्रत्येक व्यक्ति खुद को पत्रकार बताने लगा है। प्रेस की स्वतंत्रता जरूरी है लेकिन गैरजिम्मेदार पत्रकारिता से डराना-धमकाना बर्दाश्त नहीं होगा। न्यायाधीश की यह चिंता सही है। मोबाइल के आने के बाद अच्छी-बुरी सूचनाओं का प्रचार-प्रसार बढ़ा है। अच्छी वे खबरें जो जन सरोकारों से जुड़ी हों। राष्ट्र समाज के संवर्धन की हों। राष्ट्र समाज प्रथम की कार्रवाई से जुड़ी हर खबर अच्छी मानी जाएगी। बुरी खबरें वे हैं जिससे समाज टूटता हो। समाज विघटित होता हो। राष्ट्र की कानून-व्यवस्था को खतरा हो।

डेढ़-दो दशक से करोड़ों सूचनाएं हैं। यह सूचनाएं व्यक्ति के मस्तिष्क को मथती हैं। व्यक्ति को तनाव में ले जाती हैं। हिंसक बनातीं हैं। हिंसा की ओर प्रेरित करने वाली होती हैं। कई बार लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं। शुभता वाली सूचनाओं का अभाव है। सनसनी फैलाती खबरें समाज के लिए लाभदायक नहीं होती। अशुभ सूचनाओं की लोकप्रियता है। समाचार माध्यमों और पत्रिकाओं को व्यक्ति के लिए परामर्श वाले लेख लिखने पड़ रहे हैं कि तनाव में न रहें लोग। हरियाली वाले क्षेत्रों में पार्कों में घूमने जाएं। संगीत का आनंद लें। स्वस्थ रहें, मस्त रहें। करें योग रहे निरोग का स्मरण भी कराना पड़ रहा है। वीडियो जारी करने पड़ते हैं कि अमुक कार्य करने से तनाव हटता-घटता है।

इसकी मुख्य वजह है बुरी सूचनाओं का आग की तरह भारी फैलाव। प्रत्यक्ष अपराध के मामलों की तरह अप्रत्यक्ष अपराध बढ़े हैं। हिंसा बढ़ी है। बैंकों में जमा धन खाताधारकों की बिना जानकारी के निकल जाता है। इसे साइबर क्राइम कहा गया है। इसको लेकर सरकार ने मोबाइल फोन के रिंगटोन में भी सतर्क रहने के संदेश डाले हैं। अज्ञात व्यक्तियों और मोबाइल नंबरों से दूरी बनाए रखने के भी संदेश हैं। मोबाइल के माध्यम से डिजिटल अरेस्ट जैसी घटनाएं आती हैं। समझना जरूरी है कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई घटना नहीं होती। दोनों पक्ष दूर होते हैं। अज्ञात होते हैं। स्त्री या किसी काल्पनिक अपराध में संलिप्त बताकर व्यक्ति को डरा-धमका कर बैंक खातों में धन हस्तांतरित करा लिया जाता है। अश्लीलता का सहारा लेकर अपराध बढ़े हैं। स्त्रियों के विरुद्ध और स्त्रियों के द्वारा भी अपराधों को किया जा रहा है। इस पूरे सिस्टम में वीडियो, ऑडियो, रिकार्डिंग को लेकर चित्रों तक से ब्लैकमेलिंग का जोरदार खेल चल रहा है। जब तक पीड़ितों की शिकायतें पुलिस तक जाती हैं तब तक देर हो चुकी होती है। तथाकथित पत्रकारों द्वारा खबर चलाने की धमकी दी जाती है, आंशिक खबरें डालकर बुलाया जाता है, पीछा किया जाता है। तथाकथित पत्रकारों द्वारा किसी अच्छे काम को पल भर में मिथ्या आरोपी अपराधी करार दिया जाता है। इस तरह पत्रकारिता का चेहरा वीभत्स बनाए जाने में बड़ी संख्या में तथाकथित मोबाइल, माइकधारी जुटे हैं।

हमें यह स्मरण रखना होगा कि भारत और भारत के बाहर भी हमारे पूर्वजों ने पत्रकारिता को गुलामी, शोषण, अत्याचार के विरुद्ध हथियार बनाया। सबसे बड़े पत्रकार महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध इंडियन ओपिनियन नामक समाचार पत्र निकाला था। बाद में यंग इंडिया, हरिजन, हरिजन सेवक , नवजीवन समाचार पत्रों ने गांधीजी को आकाश जैसी ऊंचाई दी। भारत में डॉ आंबेडकर ने मूकनायक, तिलक ने केसरी समाचार पत्र का संपादन किया था। पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 को कलकत्ता (कोलकाता) से हिंदी का पहला समाचार पत्र 'उदंत मार्तण्ड' शुरू किया था।प्रताप नारायण मिश्र ने ब्राह्मण 1883 कानपुर और गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप 1913 कानपुर समाचार पत्र निकाला था। नेहरु ने नेशनल हेराल्ड 1938 और जी एस अयंगर ने द हिंदू निकाला था। समाचार पत्रों पर अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगाए। संपादकों और पत्रकारों को जेल में डाला, भारी जुर्माना लगाया। अंग्रेजों के अत्याचार से हम सबके पूर्वज डरे नहीं। उनके अंतस में भारत को स्वाधीन करने का महान सपना था। राष्ट्र सर्वोपरि की लगन थी। वे लोग अपने सपने को पूर्ण करके ही माने।

प्रसिद्ध संचार शास्त्री मैकलुहान ने कहा था कि माध्यम ही संदेश है। रेडियो, प्रिंट, टेलीविजन और इंटरनेट जैसे पारम्परिक माध्यमों के साथ कृतिम मेधा हमारे बीच है। सबका उद्देश्य जनमानस का लोकहित ही है। आज स्थिति भयावह है। घर में, बस में, रेल में, होटल में, दफ्तर में कही जा रही बातों को मोबाइल से वीडियो बनाकर डाल देते हैं। रिकॉर्डिंग जारी कर देते हैं। प्रश्न है, इससे क्या लोकहित है। क्या स्वस्थ समाज बनाने का सपना है, नहीं। इसके कारण व्यक्ति की निजता घटी है। विश्वास का संकट बढ़ा है। अधिकारी, नेता, जनता सबका झूठ बोलना बढ़ा है। रिकार्डिंग भी कि आप कहीं यह न कहो कि हम नहीं बोले। प्रमाण है कि आप यह बोले थे। हम कह सकते हैं एक संदिग्धता भरा समाज बनने की ओर अग्रसर है भारत। लोग कह रहे हैं कि संचार से दूरी घटी है। हमारा मानना है कि व्यक्ति से व्यक्ति के बीच दूरी बढ़ी है। अविश्वास मजबूत हुआ। कारण सब जगह प्रमाण जुटाए जा रहे हैं और प्रमाण परिवारों को, समाज को तोड़ते हैं। समाज अलिखित संविधान से चलता है। संस्कारों से चलता है। राष्ट्र देश के संविधान से।

विश्व में मुश्किलों भरा संसार निर्मित हो रहा है। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आया (एआई) से आप कुछ भी कर सकते हैं। आप जैसे नहीं हैं, वैसा फोटो और विडियो बन जाता है। जैसा चाहते हैं वैसा भी बन जाता है। घर में पहाड़ का दृश्य बन जाता है। आपका आपत्तिजनक चित्र बन जाएगा। आप पुरुष हैं तो स्त्री और स्त्री हैं तो पुरुष के रूप में प्रकट किया जाने का विज्ञान है। दुरुपयोग से लोग हैरान हैं। परेशान हैं। पीड़ित हैं। कुंठित हैं। डरे-सहमे हैं। कई फिल्मी हस्तियों के चित्र आपत्तिजनक बनाए गए। अन्य लोगों के भी आपत्तिजनक कंटेंट डाले गए। दिखाए गए। कुछ वर्ष से नई मुसीबत है। कुछ के लिए सुखद भी है। वह प्रार्थना पत्र भी बना देगा कि मेरे क्षेत्र में स्थित अस्पताल में चिकित्सक नहीं है। वह मार्ग खराब के भी पत्र बना देता है। मगर मूल प्रश्न अनुरित है रहेगा कि एआई क्या भारत के सांस्कृतिक स्वभाव को समझ सकता है। उत्तर है-नहीं।

सरकारी खबरें हैं कि कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री आवास योजना का पात्र है। एआई उसे हटाकर अपात्र कर देता है। हमने कुछ पात्रों की सिफारिश की। अधिकारियों ने बताया हम आवास देना चाहते हैं। एआई काट देता है। हमने कहा उपाय क्या। बोले सरकार जाने। संविधान में अनुच्छेद 19(1) ए अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ को लेकर समाज तोड़क तत्व अपने मोबाइल से फेसबुक से व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, एक्स ए आई से भी कुछ भी लिख रहे हैं। गरिया रहे हैं एक-दूसरे को। वे डरते नहीं हैं। न सरकार से, न न्यायालय से। कोई व्यक्ति, दल, संस्था संविधान से सर्वोच्च नहीं है। इस मनमानी पर कड़े कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। न्यायाधीश की चिंता पर विचार होना चाहिए।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश