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जांच से संरक्षण और जांच एजेंसियों की स्वायत्तता के बीच संवैधानिक संतुलन

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जांच से संरक्षण और जांच एजेंसियों की स्वायत्तता के बीच संवैधानिक संतुलन


अभिषेक शुक्ल

विनीत नारायण से तेजाराम तक का सफर बताता है कि ईमानदार प्रशासनिक निर्णयों को संरक्षण देना जितना जरूरी है, भ्रष्टाचार की जांच को निर्बाध रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। धारा 17ए पर सर्वोच्च न्यायालय की ताजा व्याख्या ने इसी संवैधानिक बहस को नई दिशा दी है।

कल्पना कीजिए कि एक सरकारी अधिकारी किसी जनहितकारी योजना के क्रियान्वयन, किसी कर्मचारी की पदोन्नति अथवा किसी सार्वजनिक परियोजना के संबंध में निर्णय लेता है। निर्णय लेने के बाद उस पर भ्रष्टाचार का आरोप लग जाता है। यदि प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय के बाद अधिकारी को आपराधिक जांच का भय सताने लगे तो वह कठिन और महत्वपूर्ण फैसले लेने से बच सकता है। प्रशासन में निर्णयहीनता पैदा हो सकती है। तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। यदि किसी अधिकारी को केवल अपने सरकारी पद के कारण जांच से पहले विशेष अनुमति का कवच मिल जाए तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानून की प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है।

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के सामने यही दोहरी चुनौती है- ईमानदार अधिकारियों को अनावश्यक जांच और उत्पीड़न से बचाना तथा भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए इसी चुनौती के बीच खड़ी है। सर्वोच्च न्यायालय ने 16 अक्टूबर 2026 को तेजाराम बनाम राजस्थान राज्य में इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि प्रशासनिक निर्णयों को संरक्षण देने वाली यह व्यवस्था रिश्वतखोरी जैसे स्वतंत्र आपराधिक कृत्यों के लिए ढाल नहीं बन सकती।

इस बहस की जड़ें लगभग तीन दशक पुरानी हैं। वर्ष 1997 में विनीत नारायण बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को महत्वपूर्ण माना था। जैन हवाला प्रकरण की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने उस व्यवस्था को समाप्त किया, जिसके तहत कुछ वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध जांच शुरू करने से पहले सरकार की अनुमति आवश्यक थी। यह व्यवस्था ‘सिंगल डायरेक्टिव’ के नाम से जानी जाती थी।

इस निर्णय का व्यापक संदेश था कि भ्रष्टाचार की जांच में किसी अधिकारी का पद उसे विशेष छूट नहीं दे सकता। इसके बाद भी विधायी स्तर पर पूर्व अनुमति की व्यवस्था लौटती रही।

वर्ष 2003 में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम में धारा 6ए जोड़ी गई। इसके तहत संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के स्तर के अधिकारियों के विरुद्ध कुछ मामलों में जांच से पहले केंद्र सरकार की स्वीकृति आवश्यक कर दी गई।

वर्ष 2014 में सुब्रमण्यम स्वामी बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने इस प्रावधान को अनुच्छेद 14 के प्रतिकूल मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया। न्यायालय ने माना कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच में अधिकारियों के पद के आधार पर अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।

हालांकि, वर्ष 2018 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में धारा 17ए जोड़ी गई। इसके तहत किसी लोकसेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई संस्तुति अथवा निर्णय से संबंधित कथित अपराध की जांच या पूछताछ शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति आवश्यक कर दी गई। इसके पीछे तर्क था कि अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण शिकायतों और अनावश्यक जांच के भय से मुक्त रखा जाए, ताकि वे स्वतंत्र होकर प्रशासनिक निर्णय ले सकें।

लेकिन क्या यह प्रावधान जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता को सीमित करता है? क्या सरकार की पूर्व अनुमति की अनिवार्यता भ्रष्टाचार के मामलों में जांच शुरू होने से पहले ही एक अवरोध खड़ा कर सकती है? यही प्रश्न जनवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय के सामने पहुंचा।

सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन बनाम भारत संघ मामले में 13 जनवरी 2026 को न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन के बीच मतभेद के कारण विभाजित निर्णय आया। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने धारा 17ए को असंवैधानिक मानते हुए निरस्त किए जाने योग्य बताया। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने इसे सीमित अर्थ में बनाए रखने की राय दी और सरकार की अनुमति से पहले लोकपाल अथवा लोकायुक्त जैसी स्वतंत्र संस्था द्वारा परीक्षण की व्यवस्था पर बल दिया। दोनों न्यायाधीशों के अलग-अलग मत के कारण इस संवैधानिक प्रश्न को आगे विचार के लिए बड़ी पीठ के समक्ष भेजे जाने की प्रक्रिया निर्धारित हुई। इस प्रकार धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय का प्रश्न अभी अलग से विचाराधीन है।

इसी पृष्ठभूमि में तेजाराम बनाम राजस्थान राज्य का निर्णय महत्वपूर्ण हो जाता है। इस मामले में राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल पर आरोप था कि उसने पुलिस अधीक्षक के नाम पर डेढ़ लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी। आरोपी की ओर से दलील दी गई कि धारा 17ए के तहत पूर्व अनुमति के बिना जांच शुरू नहीं की जा सकती थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 17ए का लाभ पाने के लिए केवल लोकसेवक होना और उसके विरुद्ध भ्रष्टाचार का आरोप होना पर्याप्त नहीं है। कथित अपराध का संबंध उस लोकसेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई किसी संस्तुति अथवा निर्णय से होना चाहिए।

न्यायालय के सामने मूल प्रश्न यह था कि क्या रिश्वत की कथित मांग किसी आधिकारिक निर्णय या संस्तुति से जुड़ी हुई थी? न्यायालय ने पाया कि डेढ़ लाख रुपये की कथित मांग एक स्वतंत्र आपराधिक कृत्य थी, जिसका किसी प्रशासनिक निर्णय अथवा आधिकारिक संस्तुति से संबंध नहीं था। इसलिए धारा 17ए के तहत पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं थी।

यहां कानून का एक महत्वपूर्ण पहलू समझना जरूरी है। धारा 17ए का पहला परंतु ऐसी स्थिति में पूर्व अनुमति की आवश्यकता समाप्त करता है, जिसमें कोई व्यक्ति स्वयं अथवा किसी अन्य के लिए अनुचित लाभ स्वीकार करते या स्वीकार करने का प्रयास करते हुए मौके पर गिरफ्तार किया जाता है। लेकिन तेजाराम निर्णय का महत्व केवल इस अपवाद तक सीमित नहीं है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कथित रिश्वत की मांग किसी आधिकारिक निर्णय या संस्तुति से संबंधित ही नहीं है तो धारा 17ए की मूल शर्त पूरी नहीं होती।

इसका अर्थ यह है कि कानून लोकसेवक के पद को नहीं बल्कि उसके कथित कृत्य की प्रकृति को महत्व देता है। किसी अधिकारी का प्रशासनिक निर्णय गलत, विवादास्पद या किसी व्यक्ति के प्रतिकूल हो सकता है। केवल इस आधार पर उसे भ्रष्टाचार का अपराध नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में धारा 17ए का उद्देश्य अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण जांच से बचाना है। इसके विपरीत, निजी लाभ के लिए रिश्वत मांगना किसी प्रशासनिक निर्णय की वैधता का प्रश्न नहीं बल्कि अपने आप में आपराधिक आचरण है।

तेजाराम निर्णय प्रशासनिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच एक महत्वपूर्ण रेखा खींचता है। यदि धारा 17ए को प्रत्येक लोकसेवक के लिए जांच से बचने का सामान्य अधिकार मान लिया जाए तो यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानून के उद्देश्य को कमजोर कर सकती है। दूसरी ओर, यदि प्रशासनिक निर्णयों को बिना किसी प्रारंभिक परीक्षण के आपराधिक जांच का विषय बना दिया जाए तो ईमानदार अधिकारी निर्णय लेने से हिचकेंगे।

सर्वोच्च न्यायालय ने इसी अंतर को रेखांकित किया है। धारा 17ए का उद्देश्य प्रशासनिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता को सुरक्षित करना है न कि लोकसेवकों को दंडमुक्ति प्रदान करना। इस निर्णय में धारा 19 के अंतर्गत अभियोजन की स्वीकृति के प्रश्न पर भी विचार किया गया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभियोजन की स्वीकृति संज्ञान लेने के चरण से संबंधित है और उसमें विलंब मात्र से कार्यवाही स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। अपील खारिज करते हुए न्यायालय ने मामले को गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़ने दिया।

विनीत नारायण से तेजाराम तक की न्यायिक यात्रा एक मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत की ओर संकेत करती है- लोकसेवक को उसके ईमानदार प्रशासनिक निर्णयों के लिए अनावश्यक उत्पीड़न से बचाना आवश्यक है लेकिन सरकारी पद को भ्रष्टाचार की जांच से बचने का साधन नहीं बनने दिया जा सकता। धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर बड़ी पीठ का भावी निर्णय इस बहस को और स्पष्ट करेगा। फिलहाल तेजाराम निर्णय ने इतना अवश्य स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासनिक स्वतंत्रता का संरक्षण और भ्रष्टाचार के विरुद्ध जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। कानून का वास्तविक उद्देश्य दोनों को साथ लेकर चलना है।

(लेखक, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश